
नई दिल्ली: लद्दाख की मांगों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे प्रख्यात पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें सफदरजंग अस्पताल (Safdarjung Hospital) में भर्ती कराया गया है। 28 जून से अन्न त्याग चुके वांगचुक के अनशन का कल 20वां दिन था। मेडिकल बुलेटिन के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में उनका वजन 350 ग्राम और कम होकर 56.55 किलोग्राम रह गया है। यानी इस भूख हड़ताल के दौरान अब तक उनका कुल वजन करीब 9.5 किलोग्राम गिर चुका है।
सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा जारी लेटेस्ट हेल्थ रिपोर्ट (Health Report) के अनुसार, वर्तमान में उनका ब्लड प्रेशर 108/68 mm Hg, ब्लड शुगर 80 mg/dL, पल्स रेट 72 प्रति मिनट और ऑक्सीजन सैचुरेशन $96\%$ दर्ज किया गया है। हालांकि उनमें हल्के डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) के लक्षण हैं, लेकिन उनकी मानसिक स्थिति पूरी तरह सतर्क बनी हुई है। इस बीच, यह सवाल चर्चा में है कि आखिर अनशन के दौरान तेजी से वजन गिरना क्यों खतरनाक होता है और कितना वजन घटने पर इंसान की मौत हो सकती है?
लंबे समय तक भूखे रहने पर कैसे काम करता है शरीर?
मेडिकल साइंस और बीबीसी साइंस की रिपोर्ट के अनुसार, जब कोई व्यक्ति पूरी तरह से खाना छोड़ देता है, तो शरीर के भीतर ऊर्जा का मैनेजमेंट (Energy Management) इस प्रकार बदलता है:
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शुरुआती 48 घंटे: भोजन न मिलने पर पहले एक-दो दिनों में लिवर और मांसपेशियों में जमा ग्लाइकोजन (शर्करा का बैकअप) पूरी तरह खत्म हो जाता है।
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कीटोन फॉर्मेशन (Ketone Formation): इसके बाद शरीर ऊर्जा के लिए फैट (वसा) को तोड़ना शुरू करता है, जिससे केटोन बनते हैं।
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मांसपेशियों का नुकसान (Muscle Breakdown): सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इंसान का दिमाग और रेड ब्लड सेल्स (RBC) केवल केटोन के भरोसे काम नहीं कर सकतीं, उन्हें ग्लूकोज की जरूरत होती है। ग्लूकोज बनाने के लिए शरीर अपनी ही प्रोटीन युक्त मांसपेशियों को तोड़ना शुरू कर देता है।
जानलेवा पहलू: लंबे समय तक खाना न मिलने पर सिर्फ पेट की चर्बी ही नहीं गलती, बल्कि शरीर की अंदरूनी मांसपेशियां भी बेहद कमजोर हो जाती हैं। चूंकि दिल (Heart) भी एक मांसपेशी है, इसलिए कुपोषण या अनशन के चरम पर पहुंचने पर दिल की दीवारें पतली हो जाती हैं, जिससे अचानक कार्डिएक अरेस्ट (हार्ट फेलियर) का खतरा पैदा हो जाता है।
कितना वजन घटना माना जाता है जानलेवा? (Critical Weight Loss Boundary)
चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के अनुसार, वजन घटने की भी एक अंतिम शारीरिक सीमा होती है जिसके पार जाना मौत को दावत देना है:
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$40\%$ से $50\%$ की गिरावट: डॉक्टरों के मुताबिक, यदि किसी भी व्यक्ति के शरीर का कुल वजन $40\%$ से $50\%$ तक कम हो जाए, तो उसका जीवित बचना लगभग नामुमकिन हो जाता है, चाहे अनशन शुरू होने से पहले उसका मूल वजन कितना भी क्यों न रहा हो।
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8 से 12 सप्ताह की समयसीमा: यदि कोई व्यक्ति पानी के अलावा पूरी तरह से भोजन का एक भी दाना न ले, तो आमतौर पर 8 से 12 हफ्तों के भीतर शरीर के अंग काम करना बंद कर देते हैं और मौत तय हो जाती है। हालांकि, जिन लोगों के शरीर में फैट प्रचुर मात्रा में होता है या जिन्हें चिकित्सा सहायता के तहत थोड़ी कैलोरी व प्रोटीन मिलता रहता है, वे कुछ अधिक समय तक सर्वाइव कर सकते हैं।
मोटापे और हार्ट के मरीजों में अचानक वजन घटना/बढ़ना भी खतरनाक
तेजी से वजन का घटना सिर्फ अनशन करने वालों के लिए ही नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए भी खतरनाक है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (BMJ) ‘हार्ट’ में प्रकाशित एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी के एक हालिया शोध में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं:
| वजन में बदलाव (10 kg से अधिक) | सेहत पर असर / मौत का जोखिम |
| वजन में अत्यधिक बढ़ोतरी ($>10\text{ kg}$) | दिल से जुड़ी बीमारियों के कारण मौत का खतरा 3 गुना (300%) तक बढ़ जाता है। |
| वजन में अत्यधिक गिरावट ($>10\text{ kg}$) | बिना किसी योजना के या बीमारी के कारण अचानक वजन घटने से किसी भी वजह से होने वाली मौत का जोखिम $54\%$ तक बढ़ जाता है। |
यह अध्ययन लगभग 14 वर्षों तक 8,297 लोगों पर किया गया था। रिसर्च टीम के प्रमुख प्रोफेसर बारबरा पियर्सियोनेक, डॉ. रुडोल्फ शुट्टे और डॉ. जुफेन झांग ने निष्कर्ष निकाला कि विशेष रूप से दिल की बीमारी (Heart Disease) और मोटापे (Obesity) से पीड़ित मरीजों के लिए वजन को बार-बार घटाने-बढ़ाने (Yo-Yo Dieting) के बजाय उसे एक स्थिर (Stable) स्तर पर बनाए रखना सेहत के लिहाज से सबसे ज्यादा जरूरी है।
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