
हिंदू पंचांग और सनातन संस्कृति में सावन के महीने का विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व माना जाता है। देवों के देव महादेव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित यह पावन मास हर एक शिवभक्त के लिए बेहद खास होता है। सावन के इन दिनों में शिवालयों में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है और चारों तरफ ‘ॐ नमः शिवाय’ के जयकारे गूंजते रहते हैं। भगवान शिव की कृपा पाने के लिए इस महीने में विधि-विधान से पूजा-अर्चना, जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और मंत्र जाप करने का विधान है। इन सभी धार्मिक अनुष्ठानों के बीच शिव तांडव स्त्रोत का पाठ करना अत्यंत प्रभावशाली और फलदायी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिव्य स्त्रोत का पाठ करने से महादेव अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों के सभी संकटों को दूर कर देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस शिव तांडव स्त्रोत के आज करोड़ों दीवाने हैं और जो साधकों के बीच ऊर्जा का संचार करता है, उसकी रचना किसने और किस परिस्थिति में की थी? आइए जानते हैं इसके पीछे की एक बेहद रोचक और पौराणिक कथा।
सावन का पवित्र महीना और भगवान शिव की आराधना का महात्म्य
सावन का महीना केवल एक ऋतु परिवर्तन का काल नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के आंतरिक और आध्यात्मिक उत्थान का समय है। इस मास में प्रकृति हरी-भरी हो जाती है और चारों तरफ सकारात्मकता फैल जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सावन के महीने में ही माता पार्वती ने महादेव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उनकी मनोकामना पूर्ण की थी। यही कारण है कि इस महीने में कुंवारी कन्याएं और सुहागिनें अच्छे वर की प्राप्ति और अखंड सौभाग्य के लिए व्रत रखती हैं, वहीं पुरुष और युवा भगवान शिव की विशेष कृपा पाने के लिए उपवास और साधना करते हैं। इस पूरे मास में रुद्राष्टक, महामृत्युंजय मंत्र और शिव तांडव स्त्रोत का पाठ करना साधਕ को मानसिक शांति और अपार ऊर्जा प्रदान करता है।
जब लंकापति रावण के घमंड को चूर करने के लिए महादेव ने उठाया था यह कदम
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार लंकापति रावण अपने पुष्पक विमान पर सवार होकर ब्रह्मांड के भ्रमण पर निकला हुआ था। भ्रमण करते-करते वह एक घने वन क्षेत्र से गुजरा, जिसके मध्य में कैलाश पर्वत स्थित था। उस दिव्य पहाड़ी पर जगत के पालनहार भगवान शिव अपने ध्यान में मगन बैठे थे। जब रावण का विमान उस क्षेत्र के पास से गुजरने लगा, तब भगवान शिव के गणों ने रावण को रोकते हुए विनम्रतापूर्वक यह सूचित किया कि इस मार्ग से आगे जाना निषेध है, क्योंकि महादेव इस समय अपनी योग साधना और तप में लीन हैं। रावण, जो अपनी अपार शक्ति, धन और विद्या के अहंकार में चूर था, उसे गणों की यह बात जरा भी रास नहीं आई। उसे लगा कि कोई सामान्य तपस्वी उसके रास्ते में रुकावट बन रहा है। क्रोध में आकर रावण ने अपना पुष्पक विमान नीचे उतारा और भगवान शिव के प्रिय वाहन तथा परम भक्त नंदी का अपमान किया। नंदी का अपमान करने के बाद रावण का अहंकार और अधिक बढ़ गया और उसने अपनी अंहकारी बुद्धि के बल पर उस पूरे कैलाश पर्वत को ही अपने हाथों से उठाकर लंका ले जाने का दुस्साहस करना शुरू कर दिया।
कैलाश पर्वत पर कैसे फंसा रावण और क्या थी नंदी की सलाह
रावण की इस नीच मंशा और घमंड को भांपते हुए कैलाश पर्वत पर विराजमान भगवान शिव ने अपनी योग माया से केवल अपने पैर के अंगूठे के हल्के से दबाव से उस विशाल पर्वत को वहीं पर पूरी तरह स्थिर कर दिया। महादेव के पैर के अंगूठे के नीचे आते ही कैलाश पर्वत का वजन कई गुना बढ़ गया, और उसी पर्वत के नीचे रावण की भुजाएं भी बुरी तरह दब गईं। अपनी अत्यधिक शक्ति का दावा करने वाला रावण उस भारी भरकम पर्वत के नीचे दबकर दर्द से बुरी तरह बिलबिला उठा। उसकी सारी ताकत और अहंकार एक ही पल में काफूर हो गया। रावण अपनी हथेली और हाथों को उस भारी दबाव से बाहर निकालने के लिए हरसंभव प्रयास करने लगा, लेकिन वह पूरी तरह असफल रहा। रावण का वह दर्दनाक और दयनीय हाल देखकर भगवान शिव के परम भक्त नंदी को उस पर दया आ गई। अंत में नंदी ने ही रावण को यह अमूल्य सुझाव दिया कि यदि वह इस संकट से मुक्त होना चाहता है, तो उसे अपनी पीड़ा भूलकर भगवान शिव की स्तुति करनी होगी और उन्हें प्रसन्न करना होगा।
शिव तांडव स्त्रोत की अद्भुत रचना: जब रावण ने गाए महादेव के गुणगान
नंदी के सुझाव को मानते हुए रावण ने दर्द से छटपटाते हुए अपनी बुद्धि और संगीत कला का इस्तेमाल किया। उसने संस्कृत भाषा में अत्यंत लयबद्ध, ओजस्वी और शक्तिशाली शब्दों के जरिए भगवान शिव के रौद्र रूप, उनके प्रचंड तांडव नृत्य और संपूर्ण ब्रह्मांडीय शक्ति का अद्भुत वर्णन करना शुरू किया। रावण ने अपनी उस असीम वेदना को भक्ति में बदलते हुए जो श्लोक रचे, उन्हें ही आज ‘शिव तांडव स्त्रोत’ के नाम से जाना जाता है। रावण द्वारा रचित इस अलौकिक स्त्रोत की लयात्मकता, इसके शब्द और इसका उच्चारण इतना शक्तिशाली था कि उसे सुनकर देवों के देव महादेव अत्यंत प्रसन्न हो गए। रावण के समर्पण और उसकी उत्कृष्ट रचना से संतुष्ट होकर भगवान शिव ने कैलाश पर्वत से अपना पैर हटा लिया, जिससे रावण का हाथ तुरंत बाहर निकल गया और उसे उस भयंकर दर्द से मुक्ति मिल गई। उसी क्षण से रावण को अपनी भूल का अहसास हुआ और वह महादेव का अनन्य भक्त बन गया।
संस्कृत में रचित शिव तांडव स्त्रोत की विशेषताएं और इसका स्वरूप
संस्कृत साहित्य में शिव तांडव स्त्रोत अपनी अनूठी लयात्मकता, गति और वर्णनात्मक शक्ति के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस स्त्रोत के प्रत्येक श्लोक में भगवान शिव के महाकाल स्वरूप, उनकी जटाओं से बहती पवित्र गंगा, उनके गले में लिपटे नाग देवता, उनके ललाट की अग्नि और उनके ब्रह्मांडीय तांडव नृत्य का सजीव चित्रण किया गया है। रावण ने इसमें भगवान शिव की महिमा का ऐसा गुणगान किया है, जो पढ़ने और सुनने वाले दोनों के भीतर एक अजीब सी आध्यात्मिक ऊर्जा और उत्साह भर देता है। इस स्त्रोत की रचना शैली इतनी द्रुत और मर्मस्पर्शी है कि इसके पाठ मात्र से ही व्यक्ति का चित्त शांत होने लगता है और नकारात्मक विचार दूर भागने लगते हैं।
शिव तांडव स्त्रोत का नियमित पाठ करने के चमत्कारी और दिव्य लाभ
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई जातक सावन के महीने में या अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में नियमित रूप से शिव तांडव स्त्रोत का पाठ करता है, तो उसके जीवन में चमत्कारी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं। इस स्त्रोत का पाठ करने से मनुष्य के अंदर आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि होती है, और वह किसी भी कठिन परिस्थिति का सामना आसानी से कर लेता है। इसके अलावा, इसके नियमित जप से आर्थिक स्थिति में सुधार होता है, अटके हुए धन की प्राप्ति होती है और कर्ज के बोझ से मुक्ति मिलती है। जो लोग अपनी वाणी को प्रभावशाली बनाना चाहते हैं या जिन्हें भाषण कला, संगीत या लेखन के क्षेत्र में आगे बढ़ना है, उन्हें वाणी सिद्धि की प्राप्ति के लिए इस स्त्रोत का पाठ अवश्य करना चाहिए।
शिव तांडव स्त्रोत का पाठ करने का सबसे सही समय और जरूरी नियम
शिव तांडव स्त्रोत का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए इसे सही समय और विधि के साथ पढ़ना बेहद आवश्यक माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिव्य स्त्रोत का पाठ सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर शुद्ध मन से करना अत्यंत शुभ होता है। इसके अलावा, शाम के समय प्रदोष काल में भी भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग के सामने बैठकर इसका पाठ किया जा सकता है। पाठ करते समय अपने सामने एक दीपक प्रज्वलित करें और महादेव को बेलपत्र व पुष्प अर्पित करें। सावन के इस पावन महीने में रावण द्वारा रची गई इस कथा और शिव तांडव स्त्रोत के महत्व को अपने जीवन में उतारकर भगवान शिव की असीम अनुकंपा प्राप्त करें और अपने सभी कष्टों से मुक्ति पाएं।
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