
सावन मास के शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा से ठीक पहले आने वाले शुक्रवार का सनातन परंपरा में विशेष आध्यात्मिक महत्व है। वर्ष 2026 में वरलक्ष्मी व्रत 21 अगस्त 2026, दिन शुक्रवार को पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। यह पावन पर्व धन, वैभव, संतति और अखंड सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी मां वरलक्ष्मी को समर्पित है। ‘वर’ शब्द का अर्थ है वरदान और ‘लक्ष्मी’ का अर्थ है समृद्धि, अर्थात् जो देवी अपने भक्तों को मनचाहा वरदान प्रदान करती हैं, वही मां वरलक्ष्मी हैं। मान्यता है कि इस दिन मां लक्ष्मी के वरलक्ष्मी स्वरूप की पूजा करने से अष्टलक्ष्मी (धन, धान्य, धैर्य, शौर्य, विद्या, कीर्ति, विजय और भाग्य) की पूजा के समान ही फल प्राप्त होता है।
दक्षिण भारत से शुरू हुई यह पावन परंपरा अब उत्तर भारत के प्रमुख राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली-एनसीआर, मध्य प्रदेश और राजस्थान के शहरों में भी अत्यंत लोकप्रिय हो चुकी है। उत्तर भारत के पारंपरिक क्षेत्रों में जहां सावन के सोमवार को भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है, वहीं सावन के अंतिम शुक्रवार को गृहिणियां परिवार में सुख-शांति और दीर्घायु के लिए वरलक्ष्मी का व्रत रखती हैं। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस बार वरलक्ष्मी व्रत पर कई दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहे हैं, जिससे इस दिन की गई पूजा का फल कई गुना बढ़ जाएगा।
वरलक्ष्मी व्रत 2026 शुभ मुहूर्त और चौघड़िया लग्न समय
शास्त्रों और वैदिक पंचांग के अनुसार वरलक्ष्मी पूजन के लिए लग्न मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। सामान्य पूजा की तुलना में यदि वरलक्ष्मी पूजन स्थिर लग्न (सिंह, वृश्चिक, कुंभ और वृषभ) में किया जाए, तो माता लक्ष्मी का वास घर में स्थायी रूप से बना रहता है। 21 अगस्त 2026 को पूजा के लिए निम्नलिखित चार प्रमुख स्थिर लग्न मुहूर्त प्राप्त हो रहे हैं:
1. सिंह लग्न (प्रातःकाल मुहूर्त):
प्रातः 06:15 बजे से प्रातः 08:30 बजे तक।
यह समय प्रातःकालीन पूजा, संकल्प और कलश स्थापना के लिए सर्वोत्कृष्ट माना गया है। गृहस्थ जीवन में सुख-समृद्धि के लिए इस समय पूजा आरंभ करना अत्यंत शुभ है।
2. वृश्चिक लग्न (अपराह्न मुहूर्त):
दोपहर 12:50 बजे से अपराह्न 03:08 बजे तक।
व्यापारियों, दुकानदारों और नए कार्य की शुरुआत करने वाले जातकों के लिए दोपहर का यह स्थिर लग्न अत्यंत फलदायी सिद्ध होता है।
3. कुंभ लग्न (सायंकाल मुहूर्त):
संध्या 06:55 बजे से रात्रि 08:25 बजे तक।
जो लोग कार्यस्थल पर व्यस्त रहते हैं, वे संध्याकाल के इस कुंभ लग्न में मां लक्ष्मी का विधिवत पूजन और आरती कर सकते हैं।
4. वृषभ लग्न (मध्यरात्रि मुहूर्त):
रात्रि 11:35 बजे से देर रात्रि 01:32 बजे (22 अगस्त) तक।
तंत्र साधना, विशेष लक्ष्मी साधना और महानिशा पूजा के लिए मध्यरात्रि का यह मुहूर्त अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है।
वरलक्ष्मी व्रत का पौराणिक महत्व और वरदान का रहस्य
स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से संसार के कल्याण और स्त्रियों के अखंड सौभाग्य के लिए एक ऐसे व्रत के बारे में पूछा, जिससे सभी प्रकार के सांसारिक दुखों का निवारण हो सके। तब भगवान शिव ने उन्हें ‘वरलक्ष्मी व्रत’ की कथा सुनाई थी। पौराणिक कथा के अनुसार, कुंडिनपुर नामक नगर में चारुमती नाम की एक परम पतिव्रता और संस्कारी स्त्री रहती थी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और सावन मास के पूर्णिमा से पूर्व आने वाले शुक्रवार को वरलक्ष्मी व्रत करने का निर्देश दिया।
चारुमती ने अन्य स्त्रियों के साथ मिलकर संपूर्ण विधि-विधान से यह व्रत संपन्न किया। पूजा समाप्त होते ही सभी स्त्रियों का घर धन-धान्य, स्वर्ण आभूषणों और पशु-धन से परिपूर्ण हो गया। तभी से यह विश्वास दृढ़ हुआ कि जो भी स्त्री या पुरुष पूरी निष्ठा से इस दिन वरलक्ष्मी का पूजन करता है, उसके जीवन से दरिद्रता, गृह क्लेश और बीमारियां सदा के लिए दूर हो जाती हैं।
संपूर्ण कलश स्थापना और पूजा विधि step-by-step
वरलक्ष्मी व्रत की पूजा में स्वच्छता और सात्विकता का सर्वोच्च स्थान है। पूजा की पूर्व संध्या से ही घर की अच्छी तरह सफाई कर लें। पूजा के दिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात व्रत का संकल्प लें।
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चौकी तैयार करना: पूजा स्थल पर एक स्वच्छ चौकी रखें और उस पर लाल या पीला रेशमी कपड़ा बिछाएं। चौकी पर थोड़े चावल (अक्षत) फैलाकर उस पर पीतल, तांबे या चांदी का कलश स्थापित करें।
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कलश की सजावट: कलश के अंदर शुद्ध जल, गंगाजल, चंदन, अक्षत, सिक्का, सुपारी और दुर्वा डालें। कलश के मुख पर आम या अशोक के पांच या सात पत्ते लगाएं।
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नारियल की स्थापना: एक पानी वाले नारियल पर रोली से स्वास्तिक बनाएं, उसे लाल चुनरी या वस्त्र में लपेटकर कलश के ऊपर स्थापित करें। कई स्थानों पर नारियल पर मां लक्ष्मी का चेहरा (अम्मान मुखौटा) बनाकर या स्थापित करके श्रृंगार किया जाता है।
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अष्टदल कमल व मूर्ति स्थापना: कलश के समीप मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। मां लक्ष्मी को नए वस्त्र, हल्दी, कुमकुम, सिंदूर, फूल, माला और विशेष रूप से कमल का फूल अर्पित करें।
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नैवेद्य और भोग: वरलक्ष्मी पूजन में चावल के आटे से बनी मिठाइयां, पोंगल, पंचामृत, फल, खीर और नारियल के लड्डू का भोग लगाया जाता है।
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डोर बांधने की परंपरा: पूजा के दौरान 9 गांठों वाला एक पवित्र डोरा (धागा) मां लक्ष्मी के चरणों में रखकर उसकी पूजा की जाती है और फिर उसे अपने दाहिने हाथ की कलाई पर बांधा जाता है। यह धागा मां लक्ष्मी की रक्षा और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक: स्थानीय व भौगोलिक रंग
वरलक्ष्मी व्रत भारत की भाषाई और क्षेत्रीय सीमाओं को लांघकर एक वैश्विक हिंदू पर्व बन चुका है। बंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और मैसूर जैसे दक्षिणी शहरों में जहां हर घर के द्वार पर आम के पत्तों का तोरण और मनमोहक रंगोली सजाई जाती है, वहीं लखनऊ, वाराणसी, कानपुर, दिल्ली, जयपुर और पटना जैसे उत्तर भारतीय शहरों के बाजारों में भी वरलक्ष्मी व्रत को लेकर भारी उत्साह देखा जाता है।
लखनऊ के ऐतिहासिक चौक और अमीनाबाद बाजारों से लेकर वाराणसी के दशाश्वमेध क्षेत्र तक, इस दिन विशेष पूजा सामग्री, पीतल के कलश, ताजे कमल के फूल और पूजा के फल-फूलों की बिक्री में जबरदस्त उछाल देखा जाता है। उत्तर भारत के मंदिरों में इस दिन विशेष लक्ष्मी-नारायण महायज्ञ और महाआरती के आयोजन किए जाते हैं।
वरलक्ष्मी व्रत में रखें इन बातों का विशेष ध्यान (नियम और सावधानियां)
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इस दिन प्रातःकाल से ही सात्विक विचार रखें और घर में शांति का माहौल बनाए रखें।
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वरलक्ष्मी का व्रत फलाहार या एक समय सात्विक भोजन करके रखा जा सकता है। गर्भवती महिलाओं और अस्वस्थ व्यक्तियों के लिए व्रत के नियमों में छूट रहती है, वे केवल पूजा करके आशीर्वाद ले सकते हैं।
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पूजा में काले या गहरे नीले रंग के वस्त्र पहनने से बचें। लाल, पीले, गुलाबी या हरे रंग के शुभ वस्त्र पहनना फलदायी होता है।
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इस दिन किसी को भी उधार धन या सिंदूर देने से बचें। शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर घी का दीपक अवश्य जलाएं।
वरलक्ष्मी सिद्ध मंत्र और महाआरती
पूजा के समय इस मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करने से आर्थिक बाधाएं तुरंत समाप्त होती हैं:
मंत्र:
पद्मासने पद्मकरे सर्वलोक हितैषिणि।
गौरिवर्णि महालक्ष्मि देवि मे वरदा भव॥
पूजा के अंत में वरलक्ष्मी व्रत कथा का पाठ करें अथवा सुनें और अंत में कर्पूर जलाकर मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की आरती उतारें। आरती के बाद परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद का वितरण करें।
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