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‘नो लिमिट’ दोस्ती से बदल रही दुनिया की ताकत का संतुलन: रूस-चीन की बढ़ती सैन्य नजदीकियां भारत-अमेरिका के लिए क्यों बनी बड़ी चुनौती?

केनबरा/मॉस्को/बीजिंग/नई दिल्ली। वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच चीन और रूस की ‘नो लिमिट’ साझेदारी अब नए खतरे का संकेत दे रही है। खासकर भारत और अमेरिका जैसे देशों के लिए यह गठजोड़ रणनीतिक चिंता का कारण बनता जा रहा है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग अपने चरम पर पहुंच चुका है और इसका असर हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा पर साफ दिखाई देने लगा है।

‘नो लिमिट’ दोस्ती: यूक्रेन युद्ध के बाद बदले समीकरण

Australian Strategic Policy Institute की रिपोर्ट के मुताबिक यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और चीन के रिश्तों में अभूतपूर्व मजबूती आई है। वर्ष 2022 में व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद ‘नो लिमिट’ साझेदारी का ऐलान हुआ, जिसने वैश्विक शक्ति संतुलन को नई दिशा दे दी।

रिपोर्ट बताती है कि दोनों देश अब खुद को पश्चिमी ताकतों के विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि पश्चिमी देश लगातार रूस की सैन्य कार्रवाइयों और चीन की आक्रामक रणनीतियों का विरोध कर रहे हैं।

रूस की मजबूरी, चीन की रणनीति

पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस को चीन का आर्थिक सहारा मिला, जिससे वह वैश्विक दबाव से काफी हद तक बच सका। वहीं चीन ने इस स्थिति का फायदा उठाते हुए रूस से उन्नत सैन्य तकनीक हासिल करनी शुरू कर दी।

विश्लेषकों का मानना है कि चीन को डर है—अगर रूस यूक्रेन में कमजोर पड़ता है, तो अमेरिका का पूरा ध्यान हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी ओर मुड़ सकता है। यही कारण है कि बीजिंग मॉस्को के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत कर रहा है।

सैन्य अभ्यास और अनुभव: चीन की बड़ी जरूरत

रिपोर्ट के अनुसार चीन के पास आधुनिक सैन्य बजट तो है, लेकिन हालिया युद्ध का अनुभव नहीं। 1979 में वियतनाम के साथ संघर्ष के बाद उसने कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा। इसके विपरीत रूस के पास दशकों का युद्ध अनुभव है।

यही वजह है कि चीन रूस से न केवल हथियार तकनीक ले रहा है, बल्कि उसके युद्ध कौशल और रणनीतियों को भी समझने की कोशिश कर रहा है। साल 2024 में दोनों देशों ने 14 संयुक्त सैन्य अभ्यास किए, जो इस बढ़ती साझेदारी का संकेत हैं।

समुद्र से आसमान तक बढ़ता सहयोग

रूस और चीन की नौसेनाएं अब दक्षिण चीन सागर, बाल्टिक सागर, पूर्वी चीन सागर, जापान सागर और अलास्का तट तक संयुक्त अभ्यास कर रही हैं। यह विस्तार दर्शाता है कि दोनों देश वैश्विक स्तर पर अपनी सैन्य उपस्थिति मजबूत करना चाहते हैं।

हथियार व्यापार: पुराना रिश्ता, नया रूप

1989 में बर्लिन दीवार गिरने के बाद से ही रूस-चीन रक्षा व्यापार बढ़ने लगा था। रूस ने चीन को सुखोई-27 जैसे फाइटर जेट दिए, जिन्हें बाद में चीन ने अपने J-11 में विकसित कर लिया।

शुरुआत में चीन ने पूरे हथियार सिस्टम खरीदे, लेकिन बाद में वह केवल जरूरी तकनीक और पुर्जों—जैसे टर्बोफैन इंजन—तक सीमित हो गया। इससे साफ है कि चीन आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।

भारत को हथियार देने पर चीन की नाराजगी

दिलचस्प बात यह है कि एक समय चीन ने रूस से नाराजगी जताई थी कि वह भारत को अत्याधुनिक हथियार क्यों दे रहा है। बीजिंग भारत को अपना रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता है।

हालांकि रूस ने लंबे समय तक चीन को संवेदनशील तकनीक देने में सावधानी बरती, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि चीन ने कई बार रूसी तकनीक की नकल कर अपने सिस्टम विकसित किए।

क्या भारत के लिए बढ़ रहा खतरा?

विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-चीन की यह नजदीकी भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौतियां खड़ी कर सकती है। खासकर तब, जब चीन पहले से ही सीमा और समुद्री क्षेत्रों में अपनी आक्रामकता बढ़ा रहा है।

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