
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में लंबे समय से सुलग रहा जन-आक्रोश अब एक बड़े और खूनी जन-विद्रोह का रूप धारण करता नजर आ रहा है। रावलकोट में आयोजित होने वाले एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील ‘रावलकोट मिशन’ (Rawalakot Mission) से ठीक पहले क्षेत्र के प्रमुख और कद्दावर नेता मौलाना फारूक कश्मीरी ने अपने हजारों समर्थकों को संबोधित करते हुए एक ऐसा आक्रामक व विद्रोही संदेश दिया है जिसने इस्लामाबाद की सरकार और रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सैन्य मुख्यालय (GHQ) की नींद उड़ा दी है। मौलाना फारूक कश्मीरी ने बिना किसी हिचकिचाहट के सीधे और दो टूक शब्दों में कहा है कि इस बार अपने अधिकारों और अपनी सरजमीं की रक्षा के लिए लड़ाई से पीछे हटने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
अपने समर्थकों के भीतर जोश भरते हुए फारूक कश्मीरी ने कहा, “पीछे हटने का कोई सवाल नहीं है। हम मरेंगे, हमारी लाशें गिरेंगी, लेकिन हम अपनी जमीन और अपने लोगों की रक्षा हर हाल में करेंगे।” उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरे पीओके में पाकिस्तानी सेना के दमन, अत्यधिक करों, महंगाई और बुनियादी मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ जनता सड़कों पर है। इस बयान ने रावलकोट के आसपास के पूरे इलाके में भारी हलचल मचा दी है और स्थानीय प्रशासन व सुरक्षा बलों को हाई अलर्ट पर रहने के लिए मजबूर कर दिया है।
पाकिस्तानी सेना और हुकूमत के आगे घुटने टेकने का दावा
अपने ऐतिहासिक संबोधन के दौरान मौलाना फारूक कश्मीरी ने जनशक्ति यानी ‘पीपुल्स पावर’ की असीम ताकत को रेखांकित किया। उन्होंने समर्थकों से अपने विश्वास और संकल्प को अडिग रखने की अपील करते हुए कहा कि जब कोई समाज अपने अस्तित्व और स्वाभिमान की लड़ाई के लिए एक साथ सड़कों पर उतरता है, तो दुनिया की कोई भी दमनकारी सेना या संस्था उसके सामने नहीं टिक सकती। कश्मीरी ने विश्वास जताया कि जनता की यह एकजुटता रावलकोट के मैदान में एक नई तारीख लिखेगी और सभी विरोधी ताकतें घुटने टेकने और सिर झुकाने पर मजबूर हो जाएंगी।
अपने भाषण को और अधिक असरदार बनाने के लिए फारूक कश्मीरी ने अतीत में पीओके की जनता द्वारा दी गई कुर्बानियों का जिक्र किया। उन्होंने विशेष रूप से इम्तियाज शाह की शहादत को याद दिलाया। उन्होंने कहा कि जब इम्तियाज शाह का पार्थिव शरीर मुख्यमंत्री आवास के बाहर लाया गया था, तब लाखों की भीड़ ने दमन और पुलिस की लाठियों व गोलियों की परवाह किए बिना सड़कों पर डटकर मुकाबला किया था। फारूक कश्मीरी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो लोग यह समझते हैं कि वे लाठी, गोली या जेल के दम पर पीओके के निवासियों के हौसले को तोड़ सकते हैं, उन्हें इतिहास से सबक लेना चाहिए और हमारी कुर्बानियों की दास्तान को याद रखना चाहिए।
तुर्की के तख्तापलट का उदाहरण: जब सड़कों पर उतरी जनता के सामने झुकी सेना
पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान को जनशक्ति का अहसास कराने के लिए फारूक कश्मीरी ने अपने भाषण में 2016 के तुर्की (Türkiye) तख्तापलट के प्रयास का एक अत्यंत चर्चित अंतरराष्ट्रीय उदाहरण दिया। उन्होंने याद दिलाया कि जब 2016 में तुर्की की शक्तिशाली सेना ने टैंकों और फाइटर जेट्स के बल पर तत्कालीन चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करने की कोशिश की थी, तो राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के एक ही आह्वान पर देश की आम जनता निहत्थे ही टैंकों के सामने आकर खड़ी हो गई थी। जनता के उस अभूतपूर्व सैलाब के आगे आधुनिक हथियारों से लैस सेना को पीछे हटना पड़ा था और तख्तापलट का प्रयास पूरी तरह से विफल हो गया था।
कश्मीरी ने अपने समर्थकों को समझाते हुए कहा कि तुर्की की घटना यह साबित करती है कि जब आम नागरिक अपने अधिकारों के लिए निडर होकर सड़कों पर उतर आते हैं, तो बड़ी से बड़ी सैन्य ताकतें भी पंगु बन जाती हैं। उन्होंने कहा कि रावलकोट मिशन भी केवल एक साधारण राजनीतिक प्रदर्शन या रैली नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तानी हुकूमत की दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ पीओके के नागरिकों की अटूट इच्छाशक्ति और संकल्प की सबसे बड़ी परीक्षा है।
क्यों सुलग रहा है पीओके? महंगाई, आटा-बिजली संकट और पाकिस्तानी दमन की दास्तान
आखिर क्यों रावलकोट और पूरे पीओके के हालात इतने विस्फोटक बने हुए हैं? इसके पीछे दशकों से चला आ रहा पाकिस्तानी प्रशासन का सौतेला व्यवहार और शोषणकारी नीतियां हैं। पीओके में नीलम और झेलम नदियों पर बने जलविद्युत प्रोजेक्ट्स (Hydroelectric Projects) से पाकिस्तान ससते दामों पर बिजली पैदा करता है, जबकि स्थानीय निवासियों को अत्यधिक महंगे बिजली बिल थमाए जाते हैं। इसके अलावा आटा, गेहूं और जरूरी खाद्य पदार्थों की भारी किल्लत और उस पर लगाए गए भारी भरकम टैक्सों ने आम जनता का जीना मुहाल कर दिया है।
संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) और स्थानीय नागरिक संगठनों के बैनर तले पिछले कई महीनों से विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है। जब भी जनता अपने हक की मांग करती है, पाकिस्तानी पंजाब पुलिस और फ्रंटियर कोर (FC) के जवान उन पर लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले और सीधी फायरिंग करते हैं। दर्जनों निर्दोष युवाओं को उठाकर अनिश्चित काल के लिए गायब कर दिया गया है। यही कारण है कि अब फारूक कश्मीरी जैसे नेताओं की अगुवाई में लोग आर-पार के मूड में आ चुके हैं और पीछे हटने के बजाय शहादत देने को तैयार हैं।
रावलकोट में बनने जा रहा है इतिहास: क्या पाकिस्तान के हाथ से निकल रहा है पीओके?
रावलकोट (Rawalakot) ऐतिहासिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से पीओके का एक बेहद महत्वपूर्ण शहर माना जाता है। यहाँ से शुरू होने वाली किसी भी राजनीतिक या सामाजिक क्रांति की गूंज पूरे मुजफ्फराबाद, मीरपुर और कोटली तक पहुँचती है। फारूक कश्मीरी द्वारा रावलकोट मिशन के लिए की जा रही लामबंदी ने पाकिस्तान के हुक्मरानों के होश उड़ा दिए हैं। स्थानीय युवाओं, मजदूरों, व्यापारियों और छात्रों का एक विशाल हुजूम इस आंदोलन से जुड़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और वैश्विक मीडिया की नजरें भी इस समय पीओके के घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। भारत भी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान द्वारा पीओके में किए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघनों और अवैध कब्जे का मुद्दा प्रमुखता से उठाता रहा है। अब जबकि स्थानीय कश्मीरी नेतृत्व ने खुले तौर पर “लाशें गिरेंगी लेकिन पीछे नहीं हटेंगे” जैसे सख्त तेवर अपना लिए हैं, तो यह स्पष्ट हो गया है कि इस्लामाबाद के लिए इस बार इस जन-आंदोलन को दबा पाना कतई आसान नहीं होगा। रावलकोट की यह धरती आने वाले दिनों में पीओके के भविष्य और पाकिस्तानी नियंत्रण के अंत की एक नई कहानी लिखने के मुहाने पर खड़ी है।
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