
सुप्रीम कोर्ट में एक वकील द्वारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अपमान का मुद्दा उठाते हुए सीधे ‘स्वतः संज्ञान’ (Suo Motu) लेने की अपील पर देश की शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ—जिसमें जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे—ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने सुनवाई के दौरान वकील को स्पष्ट हिदायत दी कि हर संवेदनशील या राजनीतिक बयानबाजी के मामले में सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान नहीं ले सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि किसी बयान या टिप्पणी से वकील या जनभावनाओं को आपत्ति है, तो इसके लिए उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए अलग से औपचारिक याचिका दाखिल की जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान जब वकील ने तर्क दिया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस देश के महान स्वतंत्रता सेनानी हैं और उनके खिलाफ राज्यसभा सांसद नागेंद्र राय उर्फ अनंत महाराज द्वारा दी गई टिप्पणियां बेहद गंभीर और अपमानजनक हैं, तो सीजेआई सूर्यकांत ने उन्हें टोकते हुए सवाल किया, “आप स्वतः संज्ञान क्यों चाहते हैं? आप खुद एक सक्षम वकील हैं, तो आप इस मामले में एक औपचारिक याचिका दाखिल क्यों नहीं करते?”
जब वकील ने अदालत के समक्ष यह तर्क देने का प्रयास किया कि न्यायपालिका के अपमान के मामलों में अदालत खुद आगे आकर स्वतः संज्ञान लेती है और यह मामला भी उतना ही गंभीर है, तो सीजेआई सूर्यकांत ने स्वतः संज्ञान के संवैधानिक सिद्धांतों को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा, “अदालत हर मामले में स्वतः संज्ञान नहीं ले सकती। स्वतः संज्ञान की कार्रवाई केवल वहीं की जाती है जहाँ कोई अत्यंत गंभीर सार्वजनिक विषय हो और पीड़ित पक्ष खुद अपनी आवाज उठाने में पूरी तरह असमर्थ हो। उदाहरण के तौर पर पर्यावरण या जंगलों के संरक्षण के मामले में जंगल खुद अदालत आकर अपनी बात नहीं कह सकते, इसलिए हमें ध्यान रखना पड़ता है और हम कार्रवाई करते हैं। इसी तरह समाज के गरीब, असहाय, वंचित और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोग जो अदालत का दरवाजा खटखटाने में असमर्थ हैं, उनके अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट आगे आता है।” सीजेआई ने नाराजगी जताते हुए आगे कहा, “लेकिन यहाँ तो एक सक्षम वकील खुद अदालत के सामने मौजूद हैं, जो सभी कानूनी प्रक्रियाओं को भली-भांति जानते हैं। फिर भी आप अदालत से स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह क्यों कर रहे हैं?”
‘स्वतंत्रता और हेट स्पीच के सिद्धांतों पर होगी जांच’: पीठ ने दी औपचारिक याचिका की सलाह
पीठ में शामिल जस्टिस जोयमाल्या बागची ने भी वकील को प्रक्रियागत तरीके से मामला लाने की सलाह दी। उन्होंने कहा, “चाहे स्वतः संज्ञान हो या याचिका, आपकी मुख्य चिंता यह है कि किसी जन प्रतिनिधि द्वारा दिया गया भाषण ‘हेट स्पीच’ की श्रेणी में आता है या इससे किसी महान हस्ती का अपमान हुआ है। लेकिन अदालत को किसी भी बयान की जांच संविधान के तहत मिलने वाली ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ (Freedom of Speech) और उस पर लागू होने वाले उचित प्रतिबंधों (Reasonable Restrictions) के स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आधार पर ही करनी होगी। इसलिए स्वतः संज्ञान के बजाय आप प्रॉपर रिसर्च और साक्ष्यों के साथ एक औपचारिक जनहित याचिका (PIL) दाखिल करें, जिस पर नियमानुसार सुनवाई की जा सके।”
उल्लेखनीय है कि यह पूरा विवाद पश्चिम बंगाल से बीजेपी के राज्यसभा सांसद नागेंद्र राय उर्फ ‘अनंत महाराज’ द्वारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज (INA) के योगदान पर दी गई कथित विवादित टिप्पणी से शुरू हुआ था। अनंत महाराज के बयान के बाद पश्चिम बंगाल समेत पूरे देश में तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिली थी और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग उठ रही थी।
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े फैसले के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि किसी भाषण या सार्वजनिक बयान के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट में मौखिक रूप से स्वतः संज्ञान की मांग करना न्यायिक स्थापित परंपराओं के अनुकूल नहीं है। शीर्ष अदालत के इस स्पष्ट संदेश के बाद अब याचिकाकर्ता या वकील को यदि इस मुद्दे को कानूनी रूप से आगे बढ़ाना है, तो उन्हें सभी जरूरी दस्तावेजों, साक्ष्यों और कानूनी तर्कों के साथ एक नई याचिका के जरिए अदालत का दरवाजा खटखटाना होगा।
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