‘वंदे मातरम’ नहीं, सबसे पहले बजेगा ‘तमिल थाई वाझथु’! अभिनेता से नेता बने विजय थलपति के फैसले पर तमिलनाडु से दिल्ली तक राजनीति गर्माई

दक्षिण भारत और विशेषकर तमिलनाडु के राजनीतिक पटल पर अपनी नई पार्टी ‘तमिझगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के जरिए धमाकेदार एंट्री करने वाले तमिल फिल्मों के सुपरस्टार विजय थलपति अपने एक बड़े फैसले को लेकर सुर्खियों और राजनीतिक विवादों के केंद्र में आ गए हैं। अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी ने निर्णय लिया है कि उनके सभी आधिकारिक और राजनीतिक कार्यक्रमों की शुरुआत में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के बजाय तमिलनाडु के राज्य गीत ‘तमिल थाई वाझथु’ (Tamil Thai Vaazhthu) को पहली और प्राथमिक प्राथमिकता दी जाएगी। इस फैसले के सार्वजनिक होते ही तमिलनाडु के स्थानीय राजनीतिक गलियारों से लेकर दिल्ली के राष्ट्रीय राजनीति के मंचों तक तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

विपक्ष और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर राजनीति करने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों ने विजय के इस कदम को राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति अनादर और तमिल अस्मिता के नाम पर ‘क्षेत्रीय धुव्रीकरण’ की कोशिश करार दिया है। वहीं दूसरी तरफ, टीवीके पार्टी के समर्थकों और तमिल सांस्कृतिक संगठनों ने इसे राज्य की अपनी भाषा और अनूठी सांस्कृतिक पहचान का सम्मान बताया है।

क्या है ‘तमिल थाई वाझथु’ और क्यों है तमिलनाडु में इसका खास महत्व?

विवाद के मूल को समझने के लिए ‘तमिल थाई वाझथु’ के महत्व को जानना आवश्यक है। ‘तमिल थाई वाझथु’ तमिलनाडु का आधिकारिक राज्य गान (State Anthem) है, जिसे प्रसिद्ध तमिल कवि मनोनमनियम सुंदरम पिल्लई द्वारा लिखा गया था। यह गीत ‘तमिल मां’ (Tamil Mother) की वंदना करता है और तमिल भाषा की समृद्धि, प्राचीनता और महानता का गुणगान करता है।

तमिलनाडु सरकार ने साल 2021 में आधिकारिक आदेश जारी करके ‘तमिल थाई वाझथु’ को राज्य गीत का दर्जा दिया था और सभी सरकारी कार्यक्रमों, शैक्षणिक संस्थानों तथा सार्वजनिक आयोजनों की शुरुआत में इसे अनिवार्य रूप से गाना तय किया था। तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा से ‘तमिल भाषा और द्रविड़ पहचान’ की रक्षा एक प्रमुख वैचारिक मुद्दा रही है। ऐसे में थलपति विजय द्वारा अपनी पार्टी के कार्यक्रमों में इसे राष्ट्रगीत से पहले रखने का फैसला राज्य की द्रविड़ राजनीति की स्थापित परंपरा का ही एक हिस्सा माना जा रहा है।

थलपति विजय की राजनीतिक रणनीति: द्रमुक (DMK) के वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि थलपति विजय का यह फैसला कोई अचानक लिया गया भावुक कदम नहीं, बल्कि 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर तैयार की गई एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है। तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और विपक्षी AIADMK दोनों ही दल लंबे समय से तमिल भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता को अपनी राजनीति का मुख्य आधार बनाते रहे हैं।

विजय थलपति की पार्टी टीवीके (TVK) का लक्ष्य राज्य के युवाओं और उन मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करना है जो पारंपरिक द्रविड़ पार्टियों के विकल्प की तलाश कर रहे हैं। ‘तमिल थाई वाझथु’ को प्राथमिकता देकर विजय यह स्पष्ट संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी पार्टी तमिलनाडु के सांस्कृतिक गौरव और तमिल अधिकारों से कोई समझौता नहीं करेगी। वे द्रमुक के पारंपरिक द्रविड़ियन और तमिल-राष्ट्रवादी वोट बैंक में सीधे सेंध लगाने की पुरजोर कोशिश में हैं।

राष्ट्रीय दलों का विरोध और क्षेत्रीय राजनीति बनाम राष्ट्रवाद की बहस

विजय थलपति के इस फैसले पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कई अन्य राष्ट्रीय समर्थक संगठनों ने कड़ा ऐतराज जताया है। बीजेपी नेताओं का तर्क है कि राज्य गीत का अपना एक सम्मान है, लेकिन ‘वंदे मातरम’ या ‘राष्ट्रगान’ (जन गण मन) जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों को दरकिनार करना या उन्हें द्वितीय श्रेणी में रखना भारत की एकता और अखंडता की भावना के विपरीत है। आलोचकों का कहना है कि राजनीति में शुरुआत करते ही विजय थलपति तुष्टिकरण और क्षेत्रीय विभाजन की राह पकड़ रहे हैं।

वहीं, टीवीके पार्टी के प्रवक्ताओं और शीर्ष नेताओं ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि वे किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक का अनादर नहीं कर रहे हैं, बल्कि तमिलनाडु की धरती पर तमिल भाषा को सर्वोपरि स्थान दे रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी के कार्यक्रमों का समापन राष्ट्रीय सम्मान के साथ ही होगा, लेकिन शुरुआत हमेशा राज्य की मातृभाषा की वंदना से ही की जाएगी।

2026 चुनाव से पहले तमिलनाडु में गरमाएगा मुद्दा

दक्षिण भारत की राजनीति में सिनेमा और स्टारडम का राजनीति से बेहद गहरा और पुराना नाता रहा है—चाहे वह एमजीआर (MGR), जे. जयललिता हों या एम. करुणानिधि। अब विजय थलपति के रूप में एक और बड़ा सिने स्टार राजनीति के अखाड़े में अपनी किस्मत आजमाने उतरा है। ‘तमिल थाई वाझथु’ से जुड़ा यह विवाद यह साफ संकेत दे रहा है कि आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में भाषा, क्षेत्रीय स्वायत्तता और राष्ट्रीय पहचान जैसे मुद्दे एक बार फिर केंद्र में रहने वाले हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि विजय का यह ‘तमिल अस्मिता कार्ड’ राज्य की जनता के बीच कितना असर दिखाता है।

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