
भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद सऊदी अरब के साथ आनन-फानन में रक्षा समझौता (Defense Pact) करने वाला पाकिस्तान अब पश्चिम एशिया के महायुद्ध में बुरी तरह फंसता हुआ महसूस कर रहा है। इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि इस समझौते के बदले रियाद से उसे भारी-भरकम वित्तीय मदद (पैसे) मिलेगी, लेकिन शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को इस बात का अंदाजा नहीं था कि इस समझौते की अग्निपरीक्षा इतनी जल्दी शुरू हो जाएगी।
ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच अब यमन के हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) ने ईरान के समर्थन में सऊदी अरब पर सीधे हमले शुरू कर दिए हैं, जिसने पाकिस्तान के हुक्मरानों की चिंताएं चरम पर पहुंचा दी हैं।
“सऊदी पर हमला, पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा” – इस्लामाबाद की रेड लाइन
रॉयटर्स (Reuters) की एक खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी नेतृत्व के भीतर इस बात को लेकर गहरा खौफ है कि उसे न चाहते हुए भी पश्चिम एशिया के इस विनाशकारी क्षेत्रीय संघर्ष में कूदना पड़ सकता है।
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अधिकारियों का दावा: सऊदी अरब में तैनात एक उच्च पदस्थ पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी ने पुष्टि की है कि इस्लामाबाद से शीर्ष अधिकारियों ने संदेश भेजा है कि यदि सऊदी अरब की मुख्य भूमि पर बड़ा हमला होता है, तो इसे पाकिस्तान अपनी ‘रेड लाइन’ (Red Line) मानेगा और इसे पाकिस्तान पर हमला मानकर जवाबी कार्रवाई की जाएगी।
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पहले बच गया था पाकिस्तान: इससे पहले 28 फरवरी 2026 को जब ईरान ने हमला किया था, तब पाकिस्तान ने कूटनीतिक चतुराई दिखाते हुए खुद को अलग रखा था और सऊदी अरब ने भी तब समझौते की शर्तों को जबरन लागू नहीं किया था। लेकिन अब यमन सीमा पर हूतियों के हमलों ने समीकरण बदल दिए हैं।
क्यों बढ़ी है पाकिस्तान की चिंता? विशेषज्ञों का विश्लेषण
सुरक्षा और मध्य पूर्व मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ मुहम्मद आमिर राणा के अनुसार, पाकिस्तान के रणनीतिकारों को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि खाड़ी का तनाव इतनी भयावह तेजी से बढ़ जाएगा।
पाकिस्तान के सामने मुख्य रूप से 2 बड़े खतरे हैं:
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सीमा पर तैनात सैनिकों को खतरा: सऊदी-यमन सीमा (Saudi-Yemen Border) की सुरक्षा में पहले से ही बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक तैनात हैं। हूतियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों से इन सैनिकों की जान को सीधा खतरा पैदा हो गया है।
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रियाद का सैन्य दबाव: यदि सऊदी अरब के तेल कुओं या शहरों पर हूती हमला तेज करते हैं, तो रियाद रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान पर अपनी थल सेना और वायुसेना को युद्ध के मैदान में उतारने का भारी दबाव बनाएगा।
पाकिस्तान के रिटायर्ड जनरल गुलाम मुस्तफा का कहना है कि देश का वर्तमान नेतृत्व “अभी भी सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे” की तर्ज पर सभी पक्षों (ईरान, सऊदी और अमेरिका) को खुश रखने की नाकाम कोशिश में लगा हुआ है।
कूटनीति का ढोंग और पर्दे के पीछे शांति की भीख
लगातार बढ़ते दबाव के बीच पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनकर शांति समझौते की वकालत कर रहा है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने बयान जारी कर कहा, “पाकिस्तानी नेतृत्व ने सभी पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के जरिए समाधान निकालने का अनुरोध किया है।”
युद्ध की वर्तमान स्थिति:
भले ही पाकिस्तान कूटनीति की दुहाई दे रहा हो, लेकिन पश्चिम एशिया में हालात बेकाबू हैं। अमेरिका ने लगातार 5वें और 6ठें दिन ईरान के चाबहार पोर्ट और अन्य ठिकानों पर भीषण मिसाइलें बरसाई हैं, जिसके जवाब में ईरान ने जॉर्डन, कुवैत और बहरीन में स्थित अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाया है। इस युद्ध में अब तक दर्जनों लोग मारे जा चुके हैं।
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