आज 17 जुलाई को दुनिया भर में ‘विश्व इमोजी दिवस’ (World Emoji Day) मनाया जा रहा है। डिजिटल दौर में दुख, गुस्सा, प्यार और हर भावना को व्यक्त करने के लिए इमोजी हमारी चैटिंग का अहम हिस्सा बन चुके हैं। कई बार एक छोटा सा इमोजी लंबी बातों से ज्यादा असरदार होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इनका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल अब ‘इमोजी स्ट्रेस’ (Emoji Stress) यानी मानसिक तनाव की वजह बन रहा है?
बॉडी लैंग्वेज से डिजिटल बॉडी लैंग्वेज तक का सफर
आज की युवा पीढ़ी (Gen Z) के लिए इमोजी अब एक ‘डिजिटल बॉडी लैंग्वेज’ बन चुके हैं। आमने-सामने की बातचीत में जो काम चेहरे के हाव-भाव करते हैं, वही काम चैट बॉक्स में इमोजी करते हैं। आजकल युवाओं को बिना इमोजी के लिखे गए टेक्स्ट संदेश रूखे, औपचारिक या गुस्से वाले लगते हैं। यही वजह है कि शब्दों में टोन जोड़ने के लिए इनका इस्तेमाल दिन-रात किया जा रहा है।
एक इमोजी, अलग-अलग मतलब और बढ़ती गलतफहमियां
विशेषज्ञों के अनुसार, इमोजी खुद तनाव की वजह नहीं हैं, बल्कि उनके अर्थ को लेकर होने वाली गलतफहमियां मानसिक दबाव बढ़ाती हैं।
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अलग समझ: उदाहरण के लिए, हलकी मुस्कान वाला इमोजी 🙂 किसी के लिए सामान्य बात हो सकता है, तो दूसरा व्यक्ति इसे रूखा या बनावटी जवाब मान सकता है।
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भावनाएं छिपाना: कई बार लोग अपनी असल उदासी या परेशानी को छिपाने के लिए चैटिंग में जबरन हंसने वाले इमोजी (😂, 😊) भेजते हैं, जो अंदरूनी तनाव को बढ़ाता है।
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अकेलापन: बिना शब्दों के सिर्फ थम्स-अप (👍) जैसे इमोजी भेजकर चैट खत्म करने से बातचीत की गहराई खत्म होती है, जिससे सामने वाले को एकतरफा संवाद और अकेलेपन का अहसास होने लगता है।
सिर्फ इमोजी पर निर्भरता है खतरनाक, एक्सपर्ट्स ने दी सलाह
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हर बात को सिर्फ इमोजी के जरिए कहना पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण और संवेदनशील बातचीत में हमेशा साफ शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि गलतफहमी की गुंजाइश न रहे। दिन-भर सिर्फ चैट और स्क्रीन पर निर्भर रहने से आमने-सामने का मानवीय संवाद कम हो रहा है। इसलिए एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि समय-समय पर दोस्तों और परिवार से फोन पर या सीधे मिलकर बात करें, क्योंकि असली भावनाएं डिजिटल आइकॉन में नहीं, इंसानी आवाज और स्पर्श में व्यक्त होती हैं।
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