जंतर-मंतर पर 19वें दिन भी अनशन जारी: सरकार की रहस्यमयी चुप्पी और विपक्ष की दूरी, आखिर क्या है इस आंदोलन का पूरा सच

नीट (NEET) पेपर लीक, देश की शिक्षा नीति में खामियों और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन अब बेहद संवेदनशील मोड़ पर आ गया है। भीषण उमस और खराब मौसम के बीच गुरुवार को सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और विभिन्न छात्र नेताओं के आमरण अनशन का 19वां दिन है।

लगातार गिरते स्वास्थ्य और गंभीर स्थिति के बावजूद न तो केंद्र सरकार की ओर से बातचीत की कोई पहल की गई है और न ही मुख्य विपक्षी दल प्रत्यक्ष रूप से इस मंच पर नजर आ रहे हैं। ‘डॉयचे वेले’ (DW) की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, इस आंदोलन के पीछे कई राजनीतिक समीकरण और अंदरूनी मतभेद काम कर रहे हैं।

एक ही मुद्दे पर अलग-अलग राहें: आंदोलन में बिखराव

जंतर-मंतर पर इस समय एक ही मांग को लेकर दो अलग-अलग धड़े प्रदर्शन कर रहे हैं:

  1. सोनम वांगचुक और सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी): यह धड़ा 28 जून से जंतर-मंतर के एक मंच से अनशन पर है।

  2. वामपंथी छात्र संगठन (AISA): ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा समेत पांच छात्र भी इसी मांग को लेकर समानांतर रूप से आमरण अनशन पर बैठे हैं, जिनमें से एक छात्र की हालत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है।

  3. कांग्रेस और उसके छात्र संगठन: कांग्रेस सीधे तौर पर जंतर-मंतर के मंच पर नहीं है, बल्कि वह देश भर में “छात्रों की गूंज” नाम से स्वतंत्र रूप से प्रदर्शन कर रही है।

क्या आंदोलन के पीछे कोई राजनीतिक एजेंडा है? विपक्ष की दूरी की वजह

सोनम वांगचुक ने हाल ही में राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे शीर्ष विपक्षी नेताओं से इस आंदोलन में शामिल होने का आग्रह किया था। इसके बावजूद विपक्ष द्वारा प्रत्यक्ष समर्थन न देने के पीछे राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार झा कई महत्वपूर्ण रणनीतिक वजहें बताते हैं:

  • बीजेपी समर्थित पृष्ठभूमि का संदेह: जानकारों का कहना है कि सोनम वांगचुक अतीत में कई मौकों पर सत्तापक्ष और भाजपा की नीतियों का समर्थन करते रहे हैं। ऐसे में विपक्ष को अंदेशा है कि कहीं यह आंदोलन नीट मुद्दे पर विपक्ष के मुख्य विरोध को भटकाने या भ्रम पैदा करने की कोई परोक्ष कोशिश तो नहीं है।

  • आम आदमी पार्टी (AAP) का कनेक्शन: इस आंदोलन के पीछे परोक्ष रूप से आम आदमी पार्टी की भूमिका को भी देखा जा रहा है, जिससे अन्य दल दूरी बनाए हुए हैं।

  • परमिशन पर सवाल: विपक्षी हलकों में यह चर्चा भी है कि जहां आम तौर पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों को जंतर-मंतर पर आसानी से जगह नहीं मिलती, वहीं इस संगठन को इतने लंबे समय से अनशन की अनुमति मिलना इस आंदोलन की नीयत पर सवाल खड़े करता है।

कांग्रेस का पक्ष: “हम सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं”

विपक्ष पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी इन मुद्दों को पूरा समर्थन दे रही है। राहुल गांधी के निर्देश पर पार्टी की युवा और छात्र इकाइयां देश भर में सड़कों पर उतरकर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांग रही हैं। उन्होंने तर्क दिया कि असली सवाल विपक्ष से नहीं, बल्कि सरकार से पूछा जाना चाहिए कि वे प्रदर्शनकारियों की सुध क्यों नहीं ले रहे हैं।

सरकार की चुप्पी का रणनीतिक कारण

19 दिन बीत जाने के बाद भी सरकार के किसी नुमाइंदे या भाजपा प्रवक्ता द्वारा इस पर कोई प्रतिक्रिया न देने के पीछे विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा सरकार किसी भी तरह के दबाव में न आने का संदेश देना चाहती है। प्रशासन यह जताना चाहता है कि वह प्रदर्शनों के दबाव में आकर नीतियां या फैसले नहीं बदलेगा।

फिलहाल जंतर-मंतर पर जारी यह गतिरोध सिर्फ शिक्षा प्रणाली या पेपर लीक का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसने देश की मौजूदा सत्ता और विपक्षी राजनीति के अंतर्विरोधों को भी सतह पर ला दिया है।

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