पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) में बिखराव का सिलसिला लगातार जारी है। गुरुवार को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को उस समय एक और करारा झटका लगा, जब पार्टी की राज्यसभा सांसद और जानी-मानी अभिनेत्री कोयल मलिक ने अपने पद से आधिकारिक तौर पर इस्तीफा दे दिया।
चंद महीनों में ही छोड़ दिया साथ
ममता बनर्जी ने कोयल मलिक को इसी साल अप्रैल 2026 में राज्यसभा भेजा था। लेकिन महज कुछ ही महीनों के भीतर उन्होंने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, कोयल ने करीब एक महीने पहले ही अपने इस फैसले का ऐलान कर दिया था, जिसे आज उन्होंने आधिकारिक रूप दे दिया। कोयल से पहले टीएमसी के कई अन्य बड़े नेता जैसे सुष्मिता देव और शुखेंदु शेखर भी राज्यसभा से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो चुके हैं और दोबारा उच्च सदन जाने की तैयारी में हैं।
मदन मित्रा भी हुए बागी, कहा— ‘मैंने कमरा बदला है, मकान नहीं’
कोयल मलिक के इस्तीफे के ठीक एक दिन पहले, बुधवार को ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाने वाले कामरहाटी के विधायक मदन मित्रा ने भी बगावत का बिगुल फूंक दिया। मित्रा ने विधानसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक (Chief Whip) पद के साथ-साथ टीएमसी की सभी राष्ट्रीय और संगठनात्मक समितियों से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया।
इस्तीफे के बाद मदन मित्रा ने नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले बागी गुट का दामन थाम लिया। हालांकि, उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया है। पत्रकारों से बात करते हुए मित्रा ने अपने इस कदम पर दिलचस्प टिप्पणी की और कहा, “मैंने केवल अपना कमरा बदला है, मकान नहीं। मैं अभी भी तृणमूल कांग्रेस का ही हिस्सा हूँ। शायद उस कमरे में आरामदायक बिस्तर था, जबकि इस बागी गुट वाले कमरे में केवल एक चारपाई है, और मैंने चारपाई को चुना है।”
अभूतपूर्व संकट से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस
विधानसभा चुनाव के बाद से ममता बनर्जी का गुट अब तक के सबसे बड़े आंतरिक संकट और बगावत के दौर से गुजर रहा है। पार्टी के कई सांसद और विधायक एक के बाद एक साथ छोड़ते जा रहे हैं।
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लोकसभा में 20 से ज्यादा सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले गुट के साथ राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी (NCPI) में विलय कर चुके हैं।
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राज्य विधानसभा में भी 60 से ज्यादा विधायक अब तक ममता बनर्जी का साथ छोड़कर बागी गुटों या अन्य दलों में शामिल हो चुके हैं, जिससे पश्चिम बंगाल की सियासत में टीएमसी का वर्चस्व खतरे में नजर आ रहा है।
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