चेन्नई: तमिलनाडु की सत्ता का सिंहासन किसके पास जाएगा, इसे लेकर सस्पेंस कम होने का नाम नहीं ले रहा है। थलपति विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) 108 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में तो उभरी, लेकिन अब खबर आ रही है कि विजय की एक ‘तकनीकी गलती’ उनकी ताजपोशी के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन गई है।
क्या थी वो गलती, जो विजय पर पड़ी भारी?
6 मई को विजय ने राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश किया था। ‘इंडिया टुडे’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, विजय ने राज्यपाल को जो पत्र सौंपा, उसमें रणनीति की भारी कमी दिखी। विजय ने खुद को ‘सबसे बड़ी पार्टी’ के रूप में पेश करने के बजाय, गठबंधन सरकार का दावा ठोक दिया।
उन्होंने जो लिस्ट सौंपी, उसमें टीवीके के विधायकों के साथ-साथ कांग्रेस के 5 विधायकों के भी हस्ताक्षर थे। चूंकि दोनों को मिलाकर भी संख्या 113 ही हो रही थी (बहुमत के लिए 118 चाहिए), राज्यपाल को यह कहने का मौका मिल गया कि “चूंकि आप गठबंधन का दावा कर रहे हैं, इसलिए पहले पूरे 118 विधायकों का समर्थन पत्र लाएं।”
दिग्गज नेता की सलाह को किया अनसुना
हैरानी की बात यह है कि विजय को इस संभावित खतरे के बारे में पहले ही आगाह किया गया था। एआईएमडीएमके से टीवीके में आए अनुभवी नेता और 9 बार के विधायक के.ए. सेंगोत्तैयन ने सलाह दी थी कि विजय को केवल अपनी पार्टी के 108 विधायकों की सूची लेकर जाना चाहिए।
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सेंगोत्तैयन की रणनीति: यदि विजय केवल सबसे बड़े दल के रूप में दावा पेश करते, तो राज्यपाल को परंपरा के अनुसार उन्हें पहले मौका देना पड़ सकता था।
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हकीकत: कांग्रेस के नामों को शामिल करते ही यह तकनीकी रूप से ‘त्रिशंकु स्थिति’ में गठबंधन का दावा बन गया, जहां राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियां बढ़ गईं।
अब क्या हैं विजय के पास विकल्प?
फिलहाल विजय और उनके सिपहसालार उन 6 गायब विधायकों की तलाश में हैं जो बहुमत के आंकड़े को पूरा कर सकें। सबकी नजरें VCK और वामपंथी दलों पर टिकी हैं, जो आज फैसला ले सकते हैं कि वे विजय के पाले में जाएंगे या नहीं। यदि ये दल साथ आते हैं, तो विजय के पास बहुमत का आंकड़ा (118) पूरा हो जाएगा।
परदे के पीछे ‘द्रविड़ महामिलन’ की सुगबुगाहट
इस बीच, तमिलनाडु की राजनीति में एक और चौंकाने वाली चर्चा है। सूत्रों के मुताबिक, DMK सत्ता से बाहर रहने के बावजूद AIADMK को बाहर से समर्थन देने पर विचार कर रही है। मकसद साफ है—किसी भी कीमत पर विजय को सत्ता से दूर रखना। द्रविड़ राजनीति के ये दो धुर विरोधी एक ‘साझा दुश्मन’ के खिलाफ हाथ मिला सकते हैं, जो तमिलनाडु के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना होगी।
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