गिरिडीह: रामनवमी के पावन अवसर पर जहां पूरा देश प्रभु राम के जन्मोत्सव की तैयारियों में डूबा है, वहीं झारखंड के गिरिडीह जिले से सांप्रदायिक सौहार्द की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो मजहब की दीवारों को तोड़ती है। यहां के भंडारीडीह इलाके में रहने वाले मो. इम्तियाज का परिवार पिछले कई दशकों से हिंदुओं की अटूट आस्था के प्रतीक ‘महावीरी झंडे’ (पताका) तैयार कर रहा है। यह परंपरा आज की नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों से चली आ रही है।
14 साल की उम्र से थामी सिलाई मशीन, 40 वर्षों का अटूट विश्वास
बड़ा चौक स्थित हनुमान मंदिर के ठीक पीछे इम्तियाज की छोटी सी दुकान है, जहां इन दिनों मशीनों की गड़गड़ाहट और केसरिया कपड़ों की चमक देखते ही बनती है। इम्तियाज बताते हैं:
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विरासत में मिला काम: उनके पिता भी महावीरी झंडे बनाने का काम करते थे। इम्तियाज ने महज 14 साल की उम्र में इस हुनर को सीखा था।
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शुद्धता का संकल्प: वे बताते हैं कि झंडा सिलने से पहले वे स्वच्छता और शुद्धता का पूरा ध्यान रखते हैं। साफ-सुथरे कपड़े पहनकर और पूरी निष्ठा के साथ इस काम को अंजाम दिया जाता है, क्योंकि यह लाखों लोगों की आस्था से जुड़ा है।
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संस्कृति की धरोहर: इम्तियाज के लिए यह सिर्फ एक व्यापार नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की वह धरोहर है जिसे वे सहेजने का प्रयास कर रहे हैं।
₹10 से लेकर ₹20,000 तक के झंडे: श्रद्धा के हर रंग मौजूद
रामनवमी से काफी पहले ही इम्तियाज के पास ऑर्डर्स की बाढ़ आ जाती है। लोग अपनी परंपरा और पसंद के अनुसार अलग-अलग आकार और डिजाइन के झंडे बनवाते हैं।
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कीमत: उनकी दुकान पर सबसे छोटा झंडा मात्र ₹10 में उपलब्ध है, जबकि सामान्य तौर पर यह ₹1000 तक जाता है।
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विशेष ऑर्डर: भव्य जुलूस और अखाड़ों के लिए विशेष ऑर्डर पर ₹20,000 तक के विशाल और कलात्मक झंडे भी तैयार किए जाते हैं।
आपसी सद्भाव का सशक्त उदाहरण
गिरिडीह का यह इलाका आज पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल बन गया है। एक तरफ जहां दुनिया में धर्म के नाम पर दूरियां बढ़ रही हैं, वहीं इम्तियाज जैसे लोग यह साबित कर रहे हैं कि कला और भक्ति की कोई सरहद नहीं होती। हनुमान मंदिर की छांव में बैठकर एक मुस्लिम कारीगर द्वारा महावीरी पताका का निर्माण करना असल भारत की वह तस्वीर है, जिसे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ कहा जाता है।
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