हिंदू धर्म में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) के रूप में मनाया जाता है, जिसे साल की सभी 24 एकादशियों में सबसे महत्वपूर्ण और फलदायी माना गया है। आज 25 जून 2026, गुरुवार को यह महापर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। गुरुवार का दिन होने के कारण इस व्रत का महत्व भगवान विष्णु के भक्तों के लिए कई गुना बढ़ गया है।
यदि आप भी आज का व्रत रख रहे हैं या इस दिन पूजा-पाठ कर रहे हैं, तो आपके लिए इससे जुड़ी ये 10 बड़ी और महत्वपूर्ण बातें जानना बेहद आवश्यक है:
1. अद्भुत और दुर्लभ शुभ संयोग
इस साल निर्जला एकादशी पर रवि योग, शिव योग और सिद्धि योग का एक साथ बेहद दुर्लभ त्रिकोणीय संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इन शुभ योगों के दौरान भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना, मंत्र जाप और दान करने से जातक को मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।
2. शुभ योगों का समय (Timing of Yogas)
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रवि योग: 25 जून को सुबह 05:25 बजे से शाम 04:29 बजे तक।
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शिव योग: 24 जून सुबह 10:24 बजे से शुरू होकर 25 जून सुबह 10:45 बजे तक।
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सिद्धि योग: 25 जून सुबह 10:55 बजे से शुरू होकर अगले दिन 26 जून सुबह 11:39 बजे तक।
3. भद्रा का साया (Bhadra Kaal)
आज एकादशी के दिन भद्रा का साया भी रहने वाला है। पंचांग के अनुसार भद्रा सुबह 05:48 बजे से शुरू होकर शाम 04:39 बजे तक रहेगी। ज्योतिष में भद्रा काल को शुभ नहीं माना जाता है, इसलिए इस दौरान किसी भी नए या मांगलिक कार्य की शुरुआत करने से बचना चाहिए। हालांकि, पहले से तय नियमित एकादशी पूजा की जा सकती है।
4. पूजन के सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त (Puja Shubh Muhurat)
अक्षय पुण्य की प्राप्ति के लिए आज इन तीन मुख्य मुहूर्तों में भगवान श्रीहरि की आराधना करें:
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ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:46 बजे से सुबह 05:17 बजे तक।
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अभिजित मुहूर्त: दोपहर 01:21 बजे से दोपहर 02:26 बजे तक।
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विजय मुहूर्त: शाम 04:35 बजे से शाम 05:40 बजे तक।
5. क्या दान करना होता है महाकल्याणकारी?
निर्जला एकादशी पर भीषण गर्मी के मौसम को देखते हुए ठंडी चीजों और जीवनोपयोगी वस्तुओं का दान सबसे उत्तम माना गया है। इस दिन मीठा जल (शरबत), अन्न, वस्त्र, छाता, नए जूते-चप्पल और मौसमी फल (जैसे आम, तरबूज, खरबूजा) का दान जरूरतमंदों को करना चाहिए। इससे समस्त पापों का नाश होता है।
6. इस कठिन व्रत का पौराणिक फल
शास्त्रों के अनुसार, यह व्रत बिना अन्न और जल ग्रहण किए पूरी तरह निराहार रहकर किया जाता है। इसके प्रभाव से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के सभी संचित पाप नष्ट हो जाते हैं, मृत्यु के बाद यमदूतों का भय समाप्त होता है और जीव सीधे विष्णु लोक (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
7. इसे ‘भीमसेनी एकादशी’ क्यों कहते हैं?
महाभारत काल में पांडवों में से केवल भीमसेन (भीम) अपनी अत्यधिक भूख के कारण हर महीने आने वाले एकादशी व्रतों को रख पाने में असमर्थ थे। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें सलाह दी कि वे साल में केवल एक बार आने वाली इस ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का निर्जल व्रत रख लें, जिससे उन्हें साल भर की सभी एकादशियों का पुण्य अकेले मिल जाएगा। भीम ने ऐसा ही किया, जिसके बाद से इसे ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ भी कहा जाने लगा।
8. व्रत पारण का शुभ समय (Paran Muhurat)
आज का व्रत रखने के बाद अगले दिन यानी 26 जून 2026, शुक्रवार को व्रत खोला जाएगा।
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पारण का समय: शुक्रवार सुबह 05:49 बजे से सुबह 09:03 बजे के बीच रहेगा।
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द्वादशी समाप्ति: शुक्रवार शाम 06:52 बजे द्वादशी तिथि समाप्त होगी, लेकिन पारण सुबह के तय समय में करना ही सर्वश्रेष्ठ है।
9. व्रत में पानी कब पीना चाहिए?
धार्मिक नियमों के अनुसार, निर्जला एकादशी व्रत की अवधि (सूर्योदय से अगले दिन के सूर्योदय तक) में जल की एक बूंद भी ग्रहण करने से व्रत खंडित माना जाता है। इस व्रत में जल ग्रहण करने का सही और शास्त्रीय समय अगले दिन (द्वादशी को) शुभ पारण मुहूर्त में पूजा करने के बाद ही होता है। सबसे पहले तुलसी पत्र और चरणामृत या सादा जल पीकर ही व्रत खोलना चाहिए।
10. क्या इस दिन से शुरू कर सकते हैं एकादशी व्रत?
यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में हर महीने आने वाले नियमित एकादशी व्रतों की शुरुआत (संकल्प) करना चाहता है, तो ज्योतिर्विदों के अनुसार निर्जला एकादशी से व्रतों की शुरुआत करना बेहद शुभ और मंगलकारी माना जाता है। इसके अलावा वर्ष की शुरुआत में आने वाली ‘उत्पन्ना एकादशी’ से भी नए व्रतों का आरंभ किया जा सकता है।
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