‘इलाज का सहारा या जेब पर डाका?’, प्राइवेट अस्पतालों की बिलिंग और मनमानी पर 68% मरीजों ने उठाए गंभीर सवाल; हिडन चार्ज, महंगे टेस्ट और डिस्चार्ज में देरी के खेल का पर्दाफाश

बीमारी कभी बताकर नहीं आती, लेकिन जब वह आती है तो किसी भी आम या मध्यमवर्गीय परिवार की जिंदगी भर की जमा-पूंजी को हिलाकर रख देती है। आधुनिक दौर में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, अत्याधुनिक मेडिकल टेक्नोलॉजी और त्वरित उपचार की उम्मीद में लोग सरकारी अस्पतालों की लंबी कतारों से बचकर निजी (प्राइवेट) अस्पतालों का रुख करते हैं। हालांकि, इलाज के बाद जब हाथ में अंतिम मेडिकल बिल थमाया जाता है, तो मरीज की बीमारी भले ही ठीक हो गई हो, लेकिन उस बिल का आंकड़ा देखकर पूरा परिवार गहरे सदमे में आ जाता है। हाल ही में देश भर के हजारों मरीजों और तीमारदारों के बीच किए गए एक राष्ट्रीय स्तर के उपभोक्ता सर्वेक्षण (कंज्यूमर सर्वे) ने निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, 68 प्रतिशत से अधिक लोगों का स्पष्ट मानना है कि प्राइवेट अस्पतालों में केवल इलाज ही महंगा नहीं है, बल्कि बिलिंग की प्रक्रिया में जानबूझकर ‘बड़ा खेल’ और हेराफेरी की जाती है।

सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े: 68% मरीजों का आरोप— बिल में होता है ‘बड़ा खेल’

स्वास्थ्य और उपभोक्ता अधिकारों पर काम करने वाले स्वतंत्र संगठनों द्वारा किए गए इस विस्तृत सर्वेक्षण में देश के विभिन्न टियर-1, टियर-2 और टियर-3 शहरों के नागरिकों से उनके हालिया अस्पताल अनुभवों के बारे में राय ली गई। नतीजों से पता चला कि लगभग 68% उत्तरदाताओं ने अनुभव किया कि उनके द्वारा चुकाए गए अंतिम बिल में ऐसे कई चार्ज और मदें जोड़ी गई थीं जिनका इलाज से कोई सीधा संबंध नहीं था या जिनकी दरें बाजार भाव से कई गुना अधिक थीं।

सर्वेक्षण में शामिल केवल 22% लोगों ने ही माना कि अस्पताल का बिल पारदर्शी और इलाज के वास्तविक स्तर के अनुरूप था, जबकि शेष 10% ने इस विषय पर स्पष्ट राय नहीं दी। सबसे ज्यादा असंतोष आईसीयू (ICU) के खर्च, डॉक्टर विजिट फीस, डिस्पोजेबल मेडिकल आइटम्स (कंज्यूमेबल्स), और अस्पताल से छुट्टी (डिस्चार्ज) के समय लगाए जाने वाले मनमाने सर्विस चार्जेस को लेकर सामने आया। यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि आम जनता और कॉर्पोरेट अस्पतालों के बीच भरोसे की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।

हिडन चार्जेस, महंगे टेस्ट और पैकेज का जाल: कैसे फूलता है अस्पताल का बिल?

अस्पतालों में बिलिंग किस तरह आसमान छूती है, इसका विश्लेषण करने पर कई हैरान करने वाले तरीके सामने आते हैं:

  • कंज्यूमेबल्स और ग्लव्स-सिरिंज का भारी बिल: अक्सर देखा गया है कि बिल में ग्लव्स, मास्क, कॉटन, सिरिंज, पीपीई किट और सैनिटाइजर जैसी बुनियादी चीजों के नाम पर हजारों रुपये जोड़ दिए जाते हैं। एक ही दिन में दर्जनों ग्लव्स के जोड़े मरीज के खाते में बिल कर दिए जाते हैं, जिनका वास्तविक उपयोग सत्यापित करना मरीज के परिजनों के लिए असंभव होता है।

  • अनावश्यक और बार-बार डायग्नोस्टिक टेस्ट: कई मामलों में मरीजों को भर्ती रखते हुए रोजाना रूटीन ब्लड टेस्ट, एमआरआई, सीटी स्कैन और एक्स-रे जैसी महंगी जांचें लिखी जाती हैं, भले ही मरीज की स्थिति स्थिर हो। इन जांचों का मुख्य उद्देश्य अस्पताल के डायग्नोस्टिक विंग का टर्नओवर बढ़ाना होता है।

  • डॉक्टर विजिट और नर्सिंग चार्ज का दोहरा खेल: एक दिन में एक ही डॉक्टर के दो से तीन बार चंद सेकंड के राउंड लगाने पर प्रत्येक विजिट की अलग और भारी फीस जोड़ दी जाती है। इसके साथ ही सामान्य कमरे के किराए के अलावा 24 घंटे के लिए अलग से भारी-भरकम ‘नर्सिंग केयर चार्ज’ और ‘आरएमओ (RMO) चार्ज’ बिल में चिपका दिया जाता है।

  • डिस्चार्ज में जानबूझकर देरी: मरीज के परिजनों की सबसे आम शिकायत यह होती है कि डॉक्टर द्वारा सुबह 10 बजे मरीज को फिट घोषित करने के बावजूद अंतिम बिलिंग और डिस्चार्ज समरी बनाने में शाम के 6 से 8 बज जाते हैं। इस अनावश्यक देरी के जरिए अस्पताल उस पूरे अतिरिक्त दिन का रूम रेंट और सर्विस चार्ज मरीज से वसूल लेता है।

इन-हाउस फार्मेसी का एकाधिकार: एमआरपी पर मनमानी वसूली

निजी अस्पतालों में बिलिंग के खेल का एक और बड़ा हथियार उनकी अपनी आंतरिक फार्मेसी (मेडिकल स्टोर) होती है। अधिकांश बड़े अस्पतालों में यह सख्त नियम बना दिया जाता है कि मरीज की दवाइयां और सर्जिकल सामान केवल अस्पताल की इन-हाउस दुकान से ही खरीदे जाएंगे, बाहर से किसी भी दवा की अनुमति नहीं होगी।

अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं, आईवी फ्लुइड्स, कैनुला और सर्जिकल उपकरणों पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) बहुत अधिक छपा होता है, जबकि थोक बाजार में उनकी वास्तविक लागत 70 से 80 प्रतिशत तक कम होती है। अस्पताल मरीज से पूरी एमआरपी वसूलते हैं, जिससे दवाओं और मेडिकल इम्प्लांट्स का बिल पूरे इलाज के कुल खर्च का 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) की जांच में भी यह बात कई बार साबित हो चुकी है कि अस्पतालों का सबसे बड़ा मुनाफा इन-हाउस फार्मेसी और कंज्यूमेबल्स से ही आता है।

इंश्योरेंस क्लेम और कैशलेस का खेल: ‘टीपीए’ और अस्पताल के बीच पिसता आम आदमी

आज के दौर में ज्यादातर मध्यमवर्गीय लोग इस भरोसे पर स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) लेते हैं कि आपातकाल में उन्हें जेब से पैसे नहीं देने पड़ेंगे। लेकिन जब मरीज कैशलेस सुविधा के तहत अस्पताल में भर्ती होता है, तो बिलिंग का खेल और भी जटिल हो जाता है।

अक्सर देखा गया है कि यदि मरीज के पास इंश्योरेंस पॉलिसी है, तो अस्पताल पैकेज और कमरों की दरें सामान्य से 30 से 50 प्रतिशत तक बढ़ा देते हैं। बाद में जब इंश्योरेंस कंपनी की थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (TPA) टीम बिल का ऑडिट करती है, तो वह ‘नॉन-पेयेबल आइटम्स’ (Non-Payable Items) और ‘रूम रेंट कैपिंग’ का हवाला देकर 20 से 30 हजार रुपये का क्लेम काट देती है। नतीजा यह होता है कि लाखों का इंश्योरेंस होने के बावजूद डिस्चार्ज के समय मरीज के परिवार को अपनी जेब से मोटी रकम नकद चुकानी पड़ती है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट का कड़ा संदेश

प्राइवेट अस्पतालों की इस बेलगाम मनमानी पर देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने भी कई बार कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि ‘क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट’ (Clinical Establishments Act) के तहत विभिन्न बीमारियों के इलाज, प्रक्रियाओं और कमरों की दरों का एक मानक दायरा (Standard Rate Range) तय किया जाए।

अदालत का मानना है कि स्वास्थ्य का अधिकार (Right to Health) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का एक अभिन्न हिस्सा है। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह अनियंत्रित बाजार और मुनाफाखोरी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार को सभी निजी अस्पतालों के रिसेप्शन और वेबसाइट्स पर सभी प्रमुख मेडिकल प्रोसीजर्स, सर्जरी और कमरों की दरों का रेट कार्ड सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना अनिवार्य करने के निर्देश दिए गए हैं।

मरीज और तीमारदार क्या करें? बिलिंग गड़बड़ी से बचने और शिकायत के कानूनी अधिकार

यदि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य किसी निजी अस्पताल में भर्ती है, तो अनावश्यक बिलिंग से बचने और अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए इन बातों का ध्यान रखें:

  • आइटमाइज्ड बिल की मांग करें: कभी भी केवल एक पन्ने का ‘समरी बिल’ स्वीकार न करें। अस्पताल से हर एक दवा, टेस्ट, ग्लव्स और डॉक्टर विजिट की तारीखवार विस्तृत सूची (Itemized Detailed Bill) मांगें।

  • दवाइयों की दरों की जांच: अस्पताल प्रबंधन से साफ कहें कि वे आवश्यक दवाइयों के लिए बाहर से दवा खरीदने का विकल्प दें या अस्पताल की फार्मेसी में उचित छूट (डिस्काउंट) प्रदान करें।

  • डिस्चार्ज का समय रिकॉर्ड रखें: डॉक्टर के डिस्चार्ज नोट का समय नोट करें और यदि बिलिंग विभाग जानबूझकर 4 घंटे से अधिक की देरी करता है, तो अतिरिक्त दिन का कमरा किराया देने से लिखित आपत्ति दर्ज कराएं।

  • उपभोक्ता फोरम और राष्ट्रीय हेल्पलाइन: यदि अस्पताल अत्यधिक बिल वसूलता है या शव/मरीज को बंधक बनाने जैसी गैरकानूनी हरकत करता है, तो तुरंत राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (National Consumer Helpline – 1915) पर कॉल करें या ‘ई-दाखिल’ (e-Daakhil) पोर्टल के माध्यम से उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दर्ज कराएं।

  • स्वास्थ्य महानिदेशालय में शिकायत: हर जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) और राज्य क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट अथॉरिटी के पास भी निजी अस्पतालों की मनमानी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का वैधानिक अधिकार है।

स्वास्थ्य सेवा या मुनाफाखोरी का व्यापार: सुधारों की सख्त दरकार

स्वास्थ्य सेवा केवल एक वाणिज्यिक व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदना और जीवन रक्षा से जुड़ा सबसे पावन पेशा है। 68% लोगों का यह असंतोष इस बात का स्पष्ट चेतावनी संकेत है कि देश में निजी स्वास्थ्य तंत्र के नियमन (Regulation) के लिए तत्काल कड़े नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है।

जब तक सरकार सभी निजी अस्पतालों के लिए पारदर्शी मूल्य निर्धारण, अनिवार्य ऑडिट और ओवरबिलिंग पर भारी जुर्माने का कड़ा कानूनी ढांचा जमीन पर सख्ती से लागू नहीं करती, तब तक आम नागरिक इलाज के खर्च और बिलिंग के इस दोहरे चक्रव्यूह में पिसता रहेगा। स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही ही समाज में डॉक्टरों और अस्पतालों के प्रति खोए हुए सम्मान व विश्वास को दोबारा बहाल कर सकती है।

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