ईरान के आगे झुका अमेरिका का प्रमुख सहयोगी UAE! 2 टन सोना और 3 बिलियन डॉलर की संपत्ति की रिलीज, 15 यात्री विमान बेचने को भी दी मंजूरी; जानिए खाड़ी में हमले के खौफ से क्यों बदला अबू धाबी का रुख

पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में अमेरिका और ईरान के बीच गहराते सैन्य तनाव और संभावित युद्ध के बादलों ने खाड़ी देशों की सुरक्षा रणनीतियों में बड़ा भूचाल ला दिया है। दशकों से अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य छतरी पर निर्भर रहने वाले खाड़ी के संपन्न देश अब वाशिंगटन और तेहरान के बीच पिसने से बचने के लिए स्वतंत्र कूटनीतिक रास्ते तलाशने लगे हैं। इस कड़ी में अमेरिका के सबसे भरोसेमंद और करीबी सहयोगियों में गिने जाने वाले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने एक अभूतपूर्व और चौंकाने वाला रणनीतिक कदम उठाया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और खुफिया सूत्रों के अनुसार, यूएई ने अपने बैंकों में वर्षों से फ्रीज (जब्त) पड़ी ईरान की संपत्तियों को तेजी से रिलीज करना शुरू कर दिया है। इस समझौते के तहत न केवल 3 बिलियन डॉलर (लगभग 25 हजार करोड़ रुपये) से अधिक की नकद संपत्ति और करीब 283 मिलियन डॉलर मूल्य का 2 टन शुद्ध सोना तेहरान भेजा जा रहा है, बल्कि ईरानी एयरलाइंस को प्रतिबंधों के बावजूद 15 कमर्शियल यात्री विमान बेचने की औपचारिक अनुमति भी दे दी गई है।

2 टन सोना और 3 बिलियन डॉलर: अबू धाबी से तेहरान पहुंची भारी संपत्ति

खुफिया और उड्डयन सूत्रों से सामने आई जानकारी के मुताबिक, यूएई से ईरान के लिए संपत्तियों के हस्तांतरण का यह गुप्त और संवेदनशील अभियान 11 और 12 अगस्त को शुरू हुआ था। अबू धाबी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से विशेष कार्गो विमानों ने उड़ान भरकर सीधे तेहरान के मेहराबाद एयरपोर्ट और कराज के पयाम एयरपोर्ट पर लैंडिंग की। इन विमानों ने कई फेरे लगाए, जिनके जरिए यूएई के बैंकों में सुरक्षित रखा गया लगभग 2 टन (2000 किलोग्राम) सोना वापस ईरान की सरकारी तिजोरियों में पहुंचा दिया गया।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस 2 टन सोने की अनुमानित कीमत लगभग 283 मिलियन डॉलर (करीब 2,400 करोड़ रुपये) आंकी गई है। यह सोना दोनों देशों के बीच पूर्व में हुए व्यापारिक समझौतों के तहत यूएई के वित्तीय संस्थानों में जमा था, जिसे अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में फ्रीज कर दिया गया था।

इसके अलावा, यूएई ने ईरान के 3 अरब डॉलर के लिक्विड फंड्स को भी चरणबद्ध तरीके से रिलीज करने की सहमति दी है। यह पहली बार नहीं है जब यूएई ने तनाव घटाने के लिए ऐसा वित्तीय रास्ता अपनाया है; इससे पहले जून महीने में भी संयुक्त अरब अमीरात ने तेहरान को 3 बिलियन डॉलर की राशि ट्रांसफर करने की हरी झंडी दी थी।

15 कमर्शियल यात्री विमानों की बिक्री: ईरानी एविएशन सेक्टर को बड़ी राहत

वित्तीय और सोने के ट्रांसफर के साथ-साथ इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा तकनीकी और रणनीतिक पहलू ईरान को यात्री विमानों की बिक्री से जुड़ा है। वर्षों से कड़े पश्चिमी और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान का नागरिक उड्डयन क्षेत्र (Civil Aviation) नए विमानों और उनके स्पेयर पार्ट्स की भारी किल्लत से जूझ रहा है।

यूएई सरकार ने अपने यहां पंजीकृत निजी एविएशन कंपनियों को 15 पुराने लेकिन चालू हालत के यात्री विमान ईरानी एयरलाइंस को बेचने की विशेष अनुमति प्रदान की है।

इस गुप्त सौदे के तहत यूएई स्थित ‘ईसीटी एविएशन सपोर्ट’ (ECT Aviation Support) ने सऊदी एयरलाइंस के पूर्व बोइंग 777-268ER लंबी दूरी के विमानों को ईरान को ट्रांसफर किया है।

इसके अलावा अमीराती कंपनियों ‘एयरोविज़न एफजेड’ (AeroVision FZ) और ‘स्काईसोर्स एफजेड’ (SkySource FZ) ने ईरानी एयरलाइंस को तीन बोइंग 737-300/500 विमान और दो पूर्व-कोंडोर एयरबस A320-212 विमान बेचे हैं। इनमें से दो एयरबस A320 विमान पहले ही अबू धाबी से उड़ान भरकर तेहरान पहुंच चुके हैं, जबकि शेष 13 विमानों को भी आने वाले हफ्तों में ईरानी बेड़े में शामिल किए जाने की तैयारी है।

युद्ध की आग से खुद को बचाने की कवायद: क्यों ईरान से सीधा टकराव नहीं चाहता UAE?

इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक वाशिंगटन, अबू धाबी या तेहरान की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है, लेकिन सामरिक विश्लेषकों का मानना है कि यूएई का यह कदम किसी राजनीतिक कमजोरी के बजाय अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता को बचाने की सोची-समझी नीति है।

संयुक्त अरब अमीरात खाड़ी क्षेत्र का सबसे बड़ा वैश्विक व्यापारिक, वित्तीय और पर्यटन केंद्र (Global Business Hub) है। दुबई और अबू धाबी की पूरी अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय निवेश, विदेशी कंपनियों के मुख्यालयों, गगनचुंबी इमारतों और सुरक्षित पर्यटन पर टिकी है।

यदि अमेरिका और ईरान के बीच पूर्ण युद्ध भड़कता है, तो ईरान सबसे पहले जवाबी कार्रवाई के रूप में उन खाड़ी देशों के तेल शोधक कारखानों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अल-धफरा जैसे सैन्य अड्डों को अपनी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों और सुसाइड ड्रोन्स से निशाना बना सकता है। पूर्व में हूती विद्रोहियों और ईरानी प्रॉक्सी समूहों द्वारा यूएई के तेल डिपो पर किए गए हमलों ने अमीराती नेतृत्व को यह कड़ा सबक सिखाया है कि एक भी मिसाइल हमला पूरे देश के पर्यटन और निवेश मॉडल को तहस-नहस कर सकता है। इसलिए यूएई तेहरान को उसकी जब्त संपत्तियां लौटाकर एक ‘अघोषित नॉन-अग्रेशन पैक्ट’ (हमला न करने की समझ) बना रहा है।

अमेरिकी सैन्य ठिकानों का बोझ और खाड़ी देशों की बदलती सुरक्षा नीति

खाड़ी के देशों के लिए सबसे बड़ी कूटनीतिक दुविधा यह बन चुकी है कि उनकी जमीन पर अमेरिका के बड़े-बड़े सैन्य और वायुसेना बेस मौजूद हैं। कतर में अल-उदैद एयरबेस, बहरीन में अमेरिकी नौसेना का 5वां बेड़ा और यूएई में अल-धफरा एयरबेस अमेरिकी सैन्य ताकत के मुख्य गढ़ हैं।

जब अमेरिका ईरान के खिलाफ कोई आक्रामक सैन्य कदम उठाता है, तो ईरान खुलेआम यह चेतावनी देता है कि हमले के लिए जिस भी देश की धरती या हवाई क्षेत्र का उपयोग होगा, वह देश ईरान का सीधा दुश्मन माना जाएगा।

इस खतरे को देखते हुए खाड़ी देशों ने अपनी रणनीति बदल दी है। जहां एक तरफ सऊदी अरब ने तुर्किए और पाकिस्तान के साथ नए रक्षा गठबंधनों की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, वहीं यूएई ने सीधी कूटनीति और वित्तीय लेन-देन के जरिए ईरान के साथ तनाव को शून्य करने का दांव चला है। खाड़ी देश अब यह साफ संदेश दे रहे हैं कि वे अमेरिका की किसी भी क्षेत्रीय जंग में खुद को बलि का बकरा नहीं बनने देंगे।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर: कूटनीतिक नया समीकरण

यूएई और ईरान के बीच का यह समझौता केवल इन दोनों देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) के सुरक्षा परिदृश्य पर भी पड़ेगा। दुनिया के कुल समुद्री कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।

होर्मुज के उत्तरी हिस्से पर पूरी तरह ईरान का नियंत्रण है। यदि ईरान होर्मुज को बंद करने या तेल टैंकरों पर मिसाइल दागने का फैसला करता है, तो यूएई और सऊदी अरब का तेल निर्यात पूरी तरह ठप हो जाएगा। ऐसे में तेहरान के साथ दोस्ताना और आर्थिक संबंध बनाकर यूएई यह सुनिश्चित करना चाहता है कि तनाव के सबसे बुरे दौर में भी उसके जहाजों और ऊर्जा आपूर्ति को निशाना न बनाया जाए।

यूएई का यह रणनीतिक कदम दर्शाता है कि आज की 2026 की भू-राजनीति में कोई भी देश किसी एक महाशक्ति के अंधानुकरण के भरोसे नहीं बैठ सकता। अपनी घरेलू सुरक्षा, अरबों डॉलर के बुनियादी ढांचे और आर्थिक स्थिरता को बचाने के लिए अमेरिका का यह करीबी सहयोगी अपने सबसे बड़े विरोधी के साथ भी हाथ मिलाने और समझौते करने से नहीं हिचकिचा रहा है। यह बदलाव आने वाले दिनों में मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन के एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत है।

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