
महाराष्ट्र की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में एक बड़ा और ऐतिहासिक नीतिगत बदलाव सामने आया है, जिसने राज्य सरकार के भीतर सत्ता संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर 51 साल पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए ‘महाराष्ट्र शासन कार्यपद्धति नियम, 2026’ (Maharashtra Government Rules of Business, 2026) को आधिकारिक तौर पर अधिसूचित कर दिया है। साल 1975 से चले आ रहे पुराने नियमों की जगह लेने वाली इस नई नियमावली के तहत मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को असाधारण प्रशासनिक शक्तियां और एक तरह का ‘वीटो पावर’ (Veto Power) मिल गया है। अब मुख्यमंत्री को यह कानूनी अधिकार होगा कि वे न्यायिक मामलों को छोड़कर, जनहित का हवाला देकर अपने किसी भी कैबिनेट या राज्य मंत्री के फैसले की समीक्षा कर सकते हैं, उसमें बदलाव कर सकते हैं या उसे पूरी तरह रद्द कर सकते हैं। इस नए बदलाव के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है कि क्या देवेंद्र फडणवीस राज्य में ‘सुपर सीएम’ की भूमिका में आ गए हैं।
बॉम्बे हाई कोर्ट का वो फैसला, जिसकी वजह से बदलना पड़ा 51 साल पुराना नियम
इस बड़े प्रशासनिक फेरबदल की जड़ें करीब तीन साल पुराने एक कानूनी और राजनीतिक विवाद से जुड़ी हैं:
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चंद्रपुर सहकारी बैंक विवाद: नवंबर 2022 में तत्कालीन भाजपा सहकारिता मंत्री अतुल सावे ने चंद्रपुर जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक में भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी थी।
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सीएम का रोक लगाना और अदालती झटका: इसके कुछ ही दिनों बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इस भर्ती प्रक्रिया पर स्थगन (Stay) लगा दिया था। यह मामला जब अदालत पहुंचा, तो 3 मार्च 2023 को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने सीएम शिंदे के रोक आदेश को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि 1975 के पुराने रूल्स ऑफ बिजनेस के तहत मुख्यमंत्री के पास विभागीय मंत्री के स्वतंत्र फैसले को सीधे बदलने या उस पर रोक लगाने का कोई स्पष्ट कानूनी अधिकार नहीं है।
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कानूनी खामी को दूर करने का कदम: अदालत के इसी फैसले के बाद सरकार ने नियमों में संशोधन की तैयारी शुरू की और अब संविधान के अनुच्छेद 166(2) और 166(3) के तहत 2026 की नई कार्य नियमावली लागू कर मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप को कानूनी मान्यता दे दी गई है।
क्या-क्या बदल गया है प्रशासनिक व्यवस्था में? जानिए सीएम की नई शक्तियां
2026 के नए नियमों के लागू होने के बाद राज्य के प्रशासनिक ढांचे में कई बड़े बदलाव किए गए हैं:
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मंत्रियों के फैसले पलटने का वीटो अधिकार: मुख्यमंत्री जनहित का हवाला देकर किसी भी मंत्री के आदेश को संशोधित या निरस्त कर सकते हैं, हालांकि इसके लिए उन्हें लिखित में कारण दर्ज करने होंगे।
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सीधे फाइलें मंगाने की शक्ति: मुख्यमंत्री अब किसी भी विभाग के सचिव या मंत्री से सीधे फाइलें, दस्तावेज और रिकॉर्ड्स तलब कर सकते हैं, जिन्हें उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा।
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सर्कुलेशन के जरिए फैसले: कैबिनेट की औपचारिक बैठक बुलाए बिना भी मंत्रियों को फाइलें भेजकर ‘सर्कुलेशन’ के जरिए महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिए जा सकेंगे।
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मुख्य सचिव और वित्त विभाग का मजबूत रोल: मुख्य सचिव को यह अधिकार दिया गया है कि यदि कोई फैसला कानून या नीति के खिलाफ है, तो वे सीधे मुख्यमंत्री को सलाह दे सकते हैं। साथ ही वित्तीय खर्च, जमीन आवंटन या रियायतों से जुड़े किसी भी फैसले के लिए वित्त विभाग की पूर्व मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है।
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राज्यपाल के लिए 22 संवेदनशील श्रेणियां: कानून-व्यवस्था, केंद्र-राज्य संबंध, अध्यादेश और एससी/एसटी/ओबीसी व अल्पसंख्यकों से जुड़े 22 मामलों को अंतिम आदेश से पहले राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजना तय किया गया है।
प्रशासनिक स्तर पर हुए इस बदलाव के तकनीकी पहलुओं का विस्तृत ब्योरा द क्विंट की रिपोर्ट में भी विस्तार से देखा जा सकता है।
महायुति गठबंधन में क्यों छिड़ी अंदरूनी खींचतान?
प्रशासनिक दृष्टिकोण से सरकार का तर्क है कि इससे विभागों के बीच टकराव खत्म होगा, फाइलों का तेजी से निपटारा होगा और नीतिगत एकरूपता आएगी। लेकिन गठबंधन की राजनीति के लिहाज से इसे लेकर सत्ताधारी ‘महायुति’ गठबंधन के भीतर सुगबुगाहट तेज हो गई है:
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मंत्रियों की स्वायत्तता पर सवाल: गठबंधन में शामिल सहयोगी दलों (शिवसेना-शिंदे गुट और एनसीपी-अजित पवार गुट) के मंत्रियों को यह महसूस हो सकता है कि उनके विभागों पर मुख्यमंत्री की सीधी निगरानी से उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक स्वतंत्रता सीमित हो रही है।
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2023 बनाम 2026 का सियासी समीकरण: जिस अदालती फैसले (शिंदे बनाम सहकारिता मंत्री) के चलते यह नियम बदला गया, उसमें 2023 में एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री थे। आज बदले हुए सियासी परिदृश्य में एकनाथ शिंदे उपमुख्यमंत्री हैं और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं। ऐसे में यह नया नियम सत्ता की धुरी को पूरी तरह मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के पक्ष में केंद्रित करता है।
हालांकि मुख्यमंत्री कार्यालय और भाजपा खेमे का कहना है कि यह कोई राजनीतिक कदम नहीं बल्कि बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्देशानुसार कानूनी कमियों को दूर करने और सुशासन स्थापित करने के लिए किया गया सामान्य प्रशासनिक सुधार है। बहरहाल, इस नए वीटो पावर ने महाराष्ट्र की सत्ता में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की स्थिति को सबसे शक्तिशाली और निर्णायक बना दिया है।
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