
राजधानी लखनऊ के बहुचर्चित और रोंगटे खड़े कर देने वाले हत्याकांड में हर गुजरते दिन के साथ ऐसी परतें खुल रही हैं, जिसने पुलिस की शुरुआती थ्योरी को पूरी तरह हिला कर रख दिया है। मामले में पहले जहां इसे एकतरफा बदले, विवाद और उसके बाद उठाए गए आत्मघाती कदम के रूप में देखा जा रहा था, वहीं अब क्राइम सीन के वैज्ञानिक विश्लेषण और स्वतंत्र रूप से उठाए गए तार्किक सवालों ने जांच की दिशा बदल दी है। सबसे बड़ा और संवेदनशील सवाल यह उठ रहा है कि क्या दिव्या की हत्या के बाद मानस और उसकी बहन ने आत्महत्या की या फिर किसी तीसरे शातिर शख्स ने सुनियोजित तरीके से उन दोनों को भी ठिकाने लगाकर पूरे मामले को एक बंद केस (ओपन एंड शट मर्डर-सुसाइड) का रूप देने की कोशिश की है? वरिष्ठ पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा द्वारा उठाए गए बिंदु और जमीनी पड़ताल के तथ्य अब पुलिस अधिकारियों को भी इस एंगल पर गहराई से सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
क्राइम सीन और शवों की स्थिति पर उठते अनसुलझे तकनीकी सवाल
घटनास्थल की प्राथमिक जांच और वहां से मिले भौतिक साक्ष्यों में कई ऐसी विसंगतियां सामने आई हैं, जो किसी अकेले व्यक्ति द्वारा किए गए कृत्य के दावे से मेल नहीं खाती हैं। कमरे के भीतर बिखरे सामान, खून के छींटों के पैटर्न (ब्लड स्पैटर एनालिसिस) और शवों के पाए जाने की स्थिति यह स्पष्ट इशारा करती है कि वहां केवल एकतरफा हमला नहीं हुआ था, बल्कि एक से अधिक लोगों के बीच भीषण संघर्ष हुआ था।
यदि मानस ने दिव्या की हत्या के बाद अपनी बहन की जान ली और फिर खुद अपनी जान देने का फैसला किया, तो घटनास्थल पर संघर्ष के ऐसे निशान क्यों मिले जो किसी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश और हाथापाई की ओर संकेत करते हैं? जिस तरीके से शवों पर चोट के निशान पाए गए हैं, उनका एंगल और प्रहार की तीव्रता यह दर्शाती है कि हमलावर शारीरिक रूप से बेहद आक्रामक स्थिति में था और पीड़ित पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में थे। यह स्थिति सीधे तौर पर किसी तीसरे हमलावर की मौजूदगी की संभावना को बल देती है।
टाइम ऑफ डेथ का फासला: दिव्या और अन्य दो मौतों के बीच का रहस्य
फॉरेंसिक विशेषज्ञों और पोस्टमार्टम की प्राथमिक रिपोर्ट से जुड़े सूत्रों के अनुसार, तीनों मौतों के समय (Time of Death) में एक अजीबोगरीब अंतराल की आशंका जताई जा रही है। शुरुआती मेडिकल अनुमानों के आधार पर दिव्या की मौत का समय और मानस व उसकी बहन की मौत के समय में जो फासला नजर आ रहा है, वह सामान्य मर्डर-सुसाइड मामलों की टाइमलाइन में फिट नहीं बैठता।
सवाल यह उठता है कि यदि यह एक ही घटनाक्रम का हिस्सा था, तो क्या मानस दिव्या की हत्या के बाद घंटों तक शव के पास बैठा रहा, या उस दौरान घटनास्थल पर कोई और आया था जिसने स्थिति का फायदा उठाते हुए दोनों भाई-बहन को हमेशा के लिए खामोश कर दिया? इस टाइम गैप का सटीक उत्तर केवल विसरा रिपोर्ट, हिस्टोपैथोलॉजिकल परीक्षण और फोरेंसिक साइंस लैबोरेट्री (FSL) की अंतिम विस्तृत रिपोर्ट से ही मिल सकेगा, जिस पर अब पूरे राज्य की नजरें टिकी हुई हैं।
हथियार, फिंगरप्रिंट्स और डिलीटेड डिजिटल फुटप्रिंट्स की पहेली
घटनास्थल से बरामद हत्या में प्रयुक्त हथियार और वहां मौजूद वस्तुओं पर फिंगरप्रिंट्स के नमूने सबसे निर्णायक कड़ी माने जा रहे हैं। प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि मौके पर मिले कुछ औजारों और दरवाजों के हैंडल पर ऐसे उंगलियों के निशान भी मिले हैं, जिनका मिलान न तो मानस से हो रहा है और न ही परिवार के अन्य सदस्यों से।
इसके अलावा, मानस और उसकी बहन के मोबाइल फोन की डिजिटल फॉरेंसिक जांच में चौंकाने वाले तथ्य मिले हैं। घटना से ठीक पहले फोन से कई अहम व्हाट्सएप चैट्स, हालिया कॉल लॉग्स और मीडिया फाइल्स को डिलीट किया गया था। यदि कोई व्यक्ति आवेश में आकर ऐसा कदम उठाता है, तो उसके पास इतने व्यवस्थित तरीके से डेटा मिटाने और डिजिटल सबूत नष्ट करने की न तो फुर्सत होती है और न ही मानसिक स्थिति। इस तरह का पेशेवर आचरण आमतौर पर उन शातिर अपराधियों का होता है, जो क्राइम सीन को अपने अनुसार सजाकर (क्राइम सीन स्टेजिंग) जांच एजेंसियों को गुमराह करना चाहते हैं।
बंद दरवाजों, बालकनी और सीसीटीवी कैमरों का ब्लाइंड स्पॉट
घटनास्थल वाले मकान के प्रवेश और निकास द्वारों का सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर यह बात सामने आई है कि मुख्य दरवाजा जिस प्रकार से बंद पाया गया था, उसमें कुंडी के बाहर से या अंदर से लगाए जाने को लेकर भी तकनीकी संशय हैं। मकान की बालकनी और पीछे की संकरी गली में लगे सीसीटीवी कैमरों में घटना की रात कुछ अज्ञात चेहरों की संदिग्ध आवाजाही दर्ज हुई है।
आसपास के रिहायशी इलाके में लगे कैमरों के टाइम-स्टैम्प विश्लेषण से पता चला है कि देर रात करीब 1:30 से 3:00 बजे के बीच एक संदिग्ध वाहन गली के मोड़ पर रुका था और उसमें से उतरे लोग मकान के पिछले हिस्से की तरफ जाते दिखे थे। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि क्या कोई पिछले रास्ते या छत के सहारे मकान के भीतर दाखिल हुआ था और वारदात को अंजाम देने के बाद बड़े आराम से निकल गया।
बदले की भावना, आपसी रंजिश या किसी चौथे का छिपा हुआ राज?
इस हत्याकांड के पीछे केवल व्यक्तिगत प्रेम-प्रसंग या पारिवारिक विवाद ही एकमात्र पहलू नहीं हो सकता, बल्कि इसके तार किसी बड़ी रंजिश, आर्थिक लेन-देन या किसी ऐसे राज से भी जुड़े हो सकते हैं, जिसे दबाने के लिए तीनों को रास्ते से हटाना जरूरी समझा गया। प्रज्ञा मिश्रा द्वारा इस मामले में सार्वजनिक तौर पर उठाए गए सवालों का मूल आधार भी यही है कि क्या मानस को मुख्य खलनायक बनाकर असली साजिशकर्ता खुद पर्दे के पीछे सुरक्षित बच निकला है?
कानूनी और खोजी पत्रकारिता के दृष्टिकोण से यह सवाल बेहद गंभीर है कि क्या किसी प्रभावशाली सिंडिकेट या तीसरे पक्ष का ऐसा कोई रहस्य मानस या दिव्या के पास था, जिसके उजागर होने के डर से इस सामूहिक नरसंहार को अंजाम दिया गया? पुलिस अब मानस के पिछले छह महीनों के संपर्कों, उसके मिलने-जुलने वाले लोगों और वित्तीय लेन-देन का भी कच्चा-चिट्ठा तैयार कर रही है।
पुलिस कमिश्नरेट की एसआईटी द्वारा नए सिरों से तफ्तीश शुरू
मामले में उठ रहे गंभीर सवालों और जनभावनाओं के दबाव को देखते हुए पुलिस कमिश्नरेट ने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) को निर्देश दिए हैं कि वे केवल पूर्व-निर्धारित थ्योरी पर टिके रहने के बजाय हर संभव कोण की खुली जांच करें। एसआईटी की तीन अलग-अलग टीमें अब मृतक मानस के करीबी दोस्तों, पड़ोसियों और उस रात इलाके के मोबाइल टावर डंप डेटा की स्क्रूटनी कर रही हैं।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि किसी भी बिंदु को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। यदि वैज्ञानिक साक्ष्य यह साबित करते हैं कि मौके पर कोई तीसरा या चौथा व्यक्ति मौजूद था, तो अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या की अतिरिक्त धाराएं जोड़कर गैर-इरादतन के बजाय इसे एक बड़े सुनियोजित षड्यंत्र के तहत देखा जाएगा। राजधानी लखनऊ का यह सनसनीखेज मामला अब उस मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां आने वाले फोरेंसिक नतीजे यह तय करेंगे कि यह केस बंद होगा या फिर किसी बड़े आपराधिक चेहरे का पर्दाफाश होगा।
The News 11 – Hindustan Newspaper, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया