परंदूर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट पर थलपति विजय का बड़ा प्रहार: टीवीके सरकार बनते ही रद्द होगा 20 हजार करोड़ का ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के पास प्रस्तावित 20,000 करोड़ रुपये के महत्वाकांक्षी परंदूर ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (Parandur Greenfield Airport) परियोजना को लेकर राज्य की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। अभिनेता से राजनेता बने और ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ (TVK) के प्रमुख थलपति विजय ने सत्ताधारी एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके सरकार की इस प्रमुख परियोजना के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है। टीवीके की कोर कमेटी और पार्टी सम्मेलनों में पारित नीतिगत प्रस्तावों में विजय ने स्पष्ट ऐलान किया है कि उनकी पार्टी विकास के नाम पर किसानों को उजाड़ने और प्राकृतिक जलस्रोतों को नष्ट करने वाली किसी भी जबरन योजना को बर्दाश्त नहीं करेगी। यदि राज्य में टीवीके की सरकार बनती है, तो परंदूर में प्रस्तावित इस एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया जाएगा। इस कड़े राजनीतिक रुख ने न केवल कांचीपुरम के आंदोलनकारी किसानों को नया संबल दिया है, बल्कि स्टालिन सरकार की औद्योगिक विस्तार नीतियों के सामने भी भारी प्रशासनिक व चुनावी चुनौती खड़ी कर दी है।

क्या है परंदूर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट और स्टालिन सरकार की महत्वाकांक्षी योजना?

चेन्नई के मौजूदा मीनांबक्कम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर लगातार बढ़ते हवाई यातायात और भविष्य में यात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए तमिलनाडु औद्योगिक विकास निगम (TIDCO) और राज्य सरकार ने एक दूसरे विशाल ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट की योजना तैयार की थी। लगभग 20,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाले इस प्रोजेक्ट के लिए कांचीपुरम जिले के परंदूर और उसके आसपास के 13 गांवों की लगभग 4,500 से 5,000 एकड़ से अधिक जमीन के अधिग्रहण का प्रस्ताव रखा गया है।

प्रशासन का तर्क है कि चेन्नई को एक वैश्विक विमानन हब बनाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और राज्य की अर्थव्यवस्था को 1 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए इस आधुनिक 4-रनवे वाले एयरपोर्ट का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। सरकार ने प्रभावित जमीन मालिकों को बाजार मूल्य से 3.5 गुना अधिक मुआवजा और वैकल्पिक आवास देने का आश्वासन भी दिया था, लेकिन स्थानीय ग्रामीण और पर्यावरणविद शुरुआत से ही इस परियोजना को सिरे से खारिज करते आ रहे हैं।

900 दिनों से अधिक का जमीनी संग्राम: क्यों सड़कों पर उतरे हैं 13 गांवों के किसान?

परंदूर एयरपोर्ट के खिलाफ स्थानीय आबादी का विरोध कोई तात्कालिक घटना नहीं है, बल्कि यह पिछले ढाई वर्षों से चल रहा एक ऐतिहासिक और शांतिपूर्ण जन-आंदोलन है। एकनापुरम (Ekanapuram), नागनमगलम, मेलेरी और अन्य 12 से अधिक प्रभावित गांवों के ग्रामीण पिछले 900 से अधिक दिनों से लगातार हर शाम सामूहिक विरोध प्रदर्शन और कैंडल मार्च निकाल रहे हैं।

किसानों का कहना है कि प्रस्तावित एयरपोर्ट की जमीन में 3,000 एकड़ से अधिक उपजाऊ कृषि भूमि, धान के लहलहाते खेत और पारंपरिक सिंचाई तंत्र शामिल हैं। ग्रामीणों का तर्क है कि पीढ़ियों से चली आ रही उनकी आजीविका केवल खेती और पशुपालन पर टिकी है। किसी भी प्रकार का आर्थिक मुआवजा उनकी उपजाऊ जमीन, पैतृक घरों और सांस्कृतिक पहचान की भरपाई नहीं कर सकता। ग्राम पंचायतों ने कई बार सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर सरकार से साफ कहा है कि वे अपनी जान दे देंगे लेकिन एक इंच कृषि भूमि एयरपोर्ट के लिए नहीं सौंपेंगे।

जलस्रोतों का विनाश और पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव की चेतावनी

परंदूर एयरपोर्ट के विरोध का दूसरा और सबसे गंभीर आधार पर्यावरणीय व पारिस्थितिक (Ecological) असंतुलन है। स्वतंत्र पर्यावरण वैज्ञानिकों, जल विशेषज्ञों और आईआईटी मद्रास के पूर्व शोधकर्ताओं की रिपोर्ट के अनुसार, परंदूर और आसपास का इलाका एक विशाल ‘वेटलैंड और वाटर कैचमेंट बेसिन’ (Wetland Ecosystem) है।

इस क्षेत्र में कंबन नहर (Kamban Canal), श्रीपेरुंबुदूर झील से जुड़े प्राकृतिक जलमार्ग और 20 से अधिक विशाल तालाब और वेटलैंड्स फैले हुए हैं। यदि इन जलस्रोतों को पाटकर कंक्रीट के रनवे और विशाल टर्मिनल भवन खड़े कर दिए गए, तो बारिश के मौसम में पानी की प्राकृतिक निकासी पूरी तरह अवरुद्ध हो जाएगी। इसके परिणामस्वरूप चेन्नई, कांचीपुरम और तिरुवल्लूर जिलों में 2015 जैसी विनाशकारी बाढ़ की पुनरावृत्ति हो सकती है। इसके साथ ही, भूमिगत जल स्तर में भारी गिरावट और खारेपन का खतरा भी समूचे क्षेत्र के पर्यावरण को तबाह कर सकता है।

थलपति विजय का कड़ा प्रहार: ‘किसानों के आंसुओं पर नहीं बन सकता विकास का महल’

थलपति विजय ने किसानों के इस लंबे संघर्ष को टीवीके के मूल राजनीतिक सिद्धांतों से जोड़ते हुए स्टालिन सरकार पर तीखे हमले किए हैं। विजय ने कहा कि एक लोकतांत्रिक सरकार का प्राथमिक कर्तव्य अपने अन्नदाताओं के मौलिक अधिकारों और जीवन की रक्षा करना है, न कि कॉरपोरेट मुनाफे के लिए जनता पर पुलिसिया दबाव बनाना।

विजय ने अपने सार्वजनिक वक्तव्यों में रेखांकित किया कि टीवीके विकास विरोधी नहीं है, लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो विनाश की कीमत पर न आए। विजय ने मांग उठाई है कि यदि चेन्नई को सचमुच एक अतिरिक्त एयरपोर्ट की दरकार है, तो उपजाऊ कृषि भूमि और प्राकृतिक झीलों को नष्ट करने के बजाय राज्य में पहले से मौजूद बंजर, अनुपयोगी अथवा गैर-कृषि भूमि की तलाश की जानी चाहिए, या फिर मौजूदा हवाई अड्डों और एयरस्ट्रिप्स का चरणबद्ध विस्तार किया जाना चाहिए।

तमिलनाडु की चुनावी राजनीति पर परंदूर विवाद का गहरा प्रभाव

परंदूर एयरपोर्ट विवाद अब केवल एक क्षेत्रीय भूमि विवाद नहीं रहा, बल्कि यह राज्य के आगामी विधानसभा चुनावों का एक प्रमुख भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। उत्तरी तमिलनाडु का यह बेल्ट राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और निर्णायक माना जाता है।

जहां एक तरफ सत्ताधारी डीएमके विकास और वैश्विक निवेश का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ एआईएडीएमके, पीएमके, नाम तमिलर कच्ची (NTK) और अब थलपति विजय की टीवीके ने इस मुद्दे पर किसानों का खुला समर्थन कर सत्ता पक्ष को पूरी तरह बैकफुट पर धकेल दिया है। थलपति विजय की युवा और ग्रामीण वोट बैंक में गहरी पैठ को देखते हुए उनका यह स्टैंड कांचीपुरम, चेंगलपट्टू और वेल्लोर जिलों के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखता है।

प्रशासनिक गतिरोध और आगे का भविष्य: क्या रद्द होगा प्रोजेक्ट?

स्थानीय विरोध, कानूनी मुकदमों और अब थलपति विजय के खुले राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद जिला प्रशासन और राज्य सरकार के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना बेहद जटिल हो गया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और उच्च न्यायालय में भी कई याचिकाएं लंबित हैं।

यदि जनविरोध और राजनीतिक दबाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो राज्य सरकार को या तो परियोजना के स्थान में भारी बदलाव करना होगा या फिर इसे ठंडे बस्ते में डालने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। थलपति विजय का यह साहसिक कदम यह साबित करता है कि वे तमिलनाडु की राजनीति में केवल पारंपरिक भाषणों तक सीमित रहने नहीं आए हैं, बल्कि जनता से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्ट और निर्णायक स्टैंड लेकर एक वैकल्पिक नेतृत्व प्रस्तुत कर रहे हैं।

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