कोलकाता में बनेगा आधुनिक युद्धपोतों का नया गढ़: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 3,500 करोड़ के मेगा शिपबिल्डिंग प्रोजेक्ट का किया शिलान्यास; समंदर में बढ़ेगी भारत की ताकत, चीन-पाक की उड़ी नींद

भारतीय समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और नौसेना की आक्रामक क्षमता को अभूतपूर्व मजबूती देने की दिशा में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कोलकाता स्थित प्रतिष्ठित रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम ‘गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स’ (GRSE) के 3,500 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले अत्याधुनिक शिपबिल्डिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेडेशन प्रोजेक्ट का भव्य शिलान्यास किया। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का मुख्य उद्देश्य भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल के लिए नेक्स्ट-जनरेशन स्टील्थ फ्रिगेट्स, गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर्स, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर कॉर्वेट्स और आधुनिक अनुसंधान पोतों के निर्माण की गति को दोगुना करना है। रक्षा मंत्री ने इस अवसर पर स्पष्ट किया कि भारत अब केवल अपनी समुद्री सीमाओं की रक्षा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंद महासागर और हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखने में ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ की भूमिका निभा रहा है।

3,500 करोड़ का मेगा प्रोजेक्ट: कोलकाता में तैयार होगा अत्याधुनिक वॉरशिप निर्माण हब

हुगली नदी के तट पर स्थित जीआरएसई का यह नया विस्तार प्रोजेक्ट आधुनिक समुद्री इंजीनियरिंग का नायाब नमूना होगा। 3,500 करोड़ रुपये के इस भारी निवेश के तहत अत्याधुनिक ड्राई डॉक्स (Dry Docks), भारी क्षमता वाले शिप लिफ्ट सिस्टम, ऑटोमेटेड सीएनसी कटिंग यूनिट्स, रोबोटिक वेल्डिंग शॉप्स और 25,000 टन से अधिक वजनी जहाजों को असेंबल करने वाले अत्याधुनिक मॉड्यूलर इंटीग्रेटेड ब्लॉक फैसिलिटी का निर्माण किया जाएगा।

इस आधुनिक तकनीक के आने से किसी भी विशालकाय युद्धपोत के निर्माण चक्र (Build Period) में 30 से 40 प्रतिशत तक की कमी आएगी। जो फ्रिगेट या कॉर्वेट पहले तैयार होने में पांच से छह साल का समय लेते थे, वे अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप मात्र तीन से चार वर्षों में बनकर नौसेना के बेड़े में शामिल होने के लिए तैयार हो सकेंगे। इस सुविधा के पूरी तरह चालू होने के बाद कोलकाता शिपयार्ड एक साथ 12 से 15 बड़े और मध्यम श्रेणी के युद्धपोतों का समानांतर निर्माण करने में सक्षम हो जाएगा।

आत्मनिर्भर भारत और भारतीय नौसेना की मारक क्षमता में ऐतिहासिक उछाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ विजन को रेखांकित करते हुए इस परियोजना को भारतीय रक्षा क्षेत्र का मील का पत्थर माना जा रहा है। भारतीय नौसेना वर्तमान में दुनिया की उन चुनिंदा नौसेनाओं में शामिल है जो अपने 100 प्रतिशत युद्धपोत और पनडुब्बियां स्वदेशी शिपयार्डों में डिजाइन और निर्मित करवा रही हैं।

जीआरएसई ने पूर्व में प्रोजेक्ट 17A के तहत ‘आईएनएस हिमगिरि’ जैसे उन्नत स्टील्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट्स, कमोर्ता क्लास एंटी-सबमरीन वॉरफेयर कॉर्वेट्स और अत्याधुनिक सर्वे वेसल्स का सफल निर्माण कर अपनी तकनीकी दक्षता साबित की है। नई 3,500 करोड़ की परियोजना के तहत भारतीय नौसेना के आगामी ‘नेक्स्ट जेनरेशन कॉर्वेट्स’ (NGC) और नेक्स्ट-जेन फ्रिगेट्स के निर्माण का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा। इन जहाजों में 80 से 85 प्रतिशत तक स्वदेशी कलपुर्जे, स्वदेशी मिसाइल प्रणालियां, कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम और सोनार उपकरण लगाए जाएंगे।

हिंद-प्रशांत और बंगाल की खाड़ी में चीन की बढ़ती चुनौतियों का कड़ा जवाब

रणनीतिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से कोलकाता में शिपबिल्डिंग क्षमता का यह विस्तार बेहद संवेदनशील और निर्णायक समय पर हुआ है। बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के प्रवेश द्वार के समीप होने के कारण कोलकाता का जीआरएसई भारतीय नौसेना की ईस्टर्न नेवल कमांड के लिए रीढ़ की हड्डी माना जाता है।

हाल के वर्षों में हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में चीनी नौसेना (PLAN) के जासूसी जहाजों, पनडुब्बियों और युद्धपोतों की बढ़ती संदिग्ध गतिविधियों पर भारत पैनी नजर रख रहा है। इस नए इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए भारत अपनी पूर्वी समुद्री सीमाओं पर त्वरित युद्धपोत निर्माण और आपातकालीन रिपेयरिंग की ऐसी मजबूत क्षमता हासिल कर लेगा, जिससे किसी भी आपात स्थिति में दुश्मन को पलक झपकते ही करारा जवाब दिया जा सके।

बंगाल के युवाओं के लिए रोजगार और स्थानीय एमएसएमई को बड़ा बूस्ट

यह 3,500 करोड़ रुपये का निवेश केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिहाज से भी एक गेम-चेंजर साबित होने जा रहा है। इस विशाल परियोजना से कोलकाता, हावड़ा, हुगली, उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिलों के हजारों कुशल इंजीनियरों, वेल्डर्स, मरीन डिजाइनर्स, फिटर और तकनीकी कामगारों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा।

इसके साथ ही, अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिम बंगाल और आसपास के राज्यों की 800 से अधिक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) और वेंडर इकोसिस्टम को भारी भरकम वर्क ऑर्डर मिलेंगे। मरीन ग्रेड स्टील, केबल्स, वॉल्व्स, पाइप्स, इलेक्ट्रॉनिक पैनल्स और नेविगेशन इक्विपमेंट्स बनाने वाली स्थानीय फैक्ट्रियों को इस प्रोजेक्ट से नई ऊर्जा मिलेगी, जिससे समूचे पूर्वी भारत के औद्योगिक पुनरुत्थान को गति मिलेगी।

राजनाथ सिंह का दो टूक संदेश: ‘अब आयातक नहीं, रक्षा निर्यातक बना भारत’

शिलान्यास समारोह को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत की बदलती रक्षा क्षमता और वैश्विक छवि का गर्व से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक दशक पहले तक भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातक देशों की सूची में शीर्ष पर रहता था, लेकिन आज भारत 100 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण, ब्रह्मोस मिसाइलें, गश्ती पोत और अत्याधुनिक राडार निर्यात कर रहा है।

राजनाथ सिंह ने कहा, “हमारा लक्ष्य केवल भारत की रक्षा जरूरतों को पूरा करना नहीं है, बल्कि भारत को दुनिया का प्रमुख शिपबिल्डिंग और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है। कोलकाता की धरती ने हमेशा से देश के औद्योगिक और सांस्कृतिक जागरण में नेतृत्व किया है, और आज यह आधुनिक युद्धपोत निर्माण के क्षेत्र में वैश्विक पटल पर एक नई पहचान दर्ज कर रही है। जो देश अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं, वे कभी संप्रभु शक्ति नहीं बन सकते।”

भविष्य के ग्रीन वॉरशिप और आधुनिक स्टेल्थ टेक्नोलॉजी

नए शिपयार्ड इंफ्रास्ट्रक्चर में केवल पारंपरिक युद्धपोत ही नहीं बनेंगे, बल्कि यह भविष्य के ‘ग्रीन और स्मार्ट वॉरशिप्स’ का भी उद्गम स्थल बनेगा। आने वाली पीढ़ियों के युद्धपोतों में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड प्रोपल्शन सिस्टम, साइलेंट प्रोपेलर टेक्नोलॉजी (ताकि दुश्मन की पनडुब्बियां आवाज न पकड़ सकें) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित ऑटोमेटेड डैमेज कंट्रोल सिस्टम लगाए जाएंगे।

इन जहाजों का राडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) इतना सूक्ष्म रखा जाएगा कि समुद्र में तैरते समय ये दुश्मन के राडार पर एक छोटी मछली पकड़ने वाली नाव जैसे नजर आएंगे। यह उन्नत स्टेल्थ तकनीक भारतीय नौसेना को गहरे समुद्र में दुश्मन की नजरों से बचकर पहले प्रहार करने की अद्वितीय क्षमता प्रदान करेगी।

भारतीय नौसेना के 200 युद्धपोतों के बेड़े का रोडमैप

भारतीय नौसेना ने वर्ष 2035 तक अपने बेड़े में 175 से 200 आधुनिक युद्धपोत, पनडुब्बियां और सहायक पोत शामिल करने का एक महत्वाकांक्षी विजन प्लान तैयार किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए माझगांव डॉक (MDL), कोचीन शिपयार्ड (CSL) और गोवा शिपयार्ड (GSL) के साथ-साथ कोलकाता के जीआरएसई पर सबसे बड़ा दारोमदार है।

कोलकाता में 3,500 करोड़ के इस नए प्रोजेक्ट के मूर्त रूप लेते ही भारत की वार्षिक युद्धपोत निर्माण क्षमता में भारी इजाफा होगा। यह परियोजना साबित करती है कि भारत अब समुद्र की अनंत लहरों पर अपनी आत्मनिर्भरता, सामरिक संप्रभुता और तकनीकी शक्ति का परचम पूरी शान से लहराने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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