कुलदीप यादव की गुत्थी: पहले आराम, फिर बीमारी और अंत में प्लेइंग 11 से बाहर; क्या टीम इंडिया में मैच विनर गेंदबाज होना ही बन गया सबसे बड़ा गुनाह?

भारतीय क्रिकेट के आधुनिक इतिहास में अगर किसी एक खिलाड़ी के साथ चयन के सबसे अजीबोगरीब और हैरान करने वाले फैसले हुए हैं, तो वह नाम निस्संदेह कुलदीप यादव का है। उत्तर प्रदेश के कानपुर की गलियों से निकलकर दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाजों को अपनी जादुई फिरकी पर नचाने वाले इस रिस्ट स्पिनर की तकदीर का फैसला मैदान पर उनके प्रदर्शन से कम और ड्रेसिंग रूम के बंद कमरों में ‘कॉम्बिनेशन’ की थ्योरी से ज्यादा तय होता दिख रहा है। पिछले कुछ समय से कुलदीप यादव के करियर में एक तयशुदा पैटर्न देखने को मिल रहा है—पहले वे अपनी गेंदबाजी से मैच जिताते हैं, फिर उन्हें अचानक ‘वर्कलोड मैनेजमेंट’ के नाम पर आराम दे दिया जाता है, इसके बाद किसी अहम सीरीज के दौरान उनके बीमार या अनफिट होने की खबरें आती हैं और अंततः जब मुख्य मुकाबले की प्लेइंग 11 चुनी जाती है, तो वे बेंच पर ड्रिंक्स पिलाते नजर आते हैं। यह स्थिति न केवल क्रिकेट प्रशंसकों को बेचैन कर रही है, बल्कि दुनिया भर के खेल पंडित भी यह सवाल पूछने को मजबूर हैं कि आखिर भारतीय टीम में कुलदीप यादव की इस रहस्यमयी गुत्थी को कौन सुलझाएगा?

मैन ऑफ द मैच बनने के बाद भी बाहर: कुलदीप के साथ बार-बार दोहराया जाने वाला चक्रव्यूह

कुलदीप यादव के साथ होने वाले इस रवैये की सबसे दुखद मिसाल साल 2022 के चटगांव टेस्ट में देखने को मिली थी। बांग्लादेश के खिलाफ उस मुकाबले में कुलदीप ने गेंद से कहर बरपाते हुए 8 विकेट चटकाए थे और बल्ले से भी बहुमूल्य 40 रन बनाए थे। उन्हें शानदार प्रदर्शन के लिए ‘मैन ऑफ द मैच’ चुना गया। लेकिन अगले ही टेस्ट मैच में जब टीम घोषित हुई, तो सभी को स्तब्ध करते हुए उन्हें प्लेइंग 11 से बाहर कर दिया गया।

यह कोई इकलौती घटना नहीं थी। सीमित ओवरों के क्रिकेट में जब भी कुलदीप ने 4 या 5 विकेट लिए, उसके तुरंत बाद होने वाले अगले बड़े मैच में पिच की कंडीशन या अतिरिक्त बल्लेबाज खिलाने की रणनीति के तहत उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। टी20 विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट्स में भी ग्रुप स्टेज के कई मैचों में कुलदीप को बाहर बैठाया गया और जब कैरेबियाई पिचों पर उनकी सख्त जरूरत पड़ी, तभी उन्हें मैदान में उतारा गया। यह निरंतरता का अभाव किसी भी शीर्ष गेंदबाज के मानसिक मनोबल को तोड़ने के लिए काफी है।

‘बैटिंग डेप्थ’ की अंधी दौड़ और विशुद्ध विकेट-टेकर की अनदेखी

कुलदीप यादव को टीम से बाहर रखने के पीछे टीम मैनेजमेंट द्वारा सबसे बड़ा तर्क ‘बैटिंग डेप्थ’ (बल्लेबाजी की गहराई) का दिया जाता है। आधुनिक क्रिकेट में भारतीय थिंक-टैंक नंबर 8 और नंबर 9 तक ऐसे खिलाड़ियों को तरजीह देना चाहता है जो थोड़ी बहुत बल्लेबाजी कर सकें। इसी सोच के चलते अक्षर पटेल, वाशिंगटन सुंदर और रविचंद्रन अश्विन जैसे ऑलराउंडर गेंदबाजों को कुलदीप पर प्राथमिकता दी जाती है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या टेस्ट और वनडे क्रिकेट में 20 विकेट चटकाने की क्षमता रखने वाले एक विशेषज्ञ अटैकिंग स्पिनर की जगह केवल इसलिए छीनी जानी चाहिए क्योंकि वह 20-30 रन नहीं बना सकता? क्रिकेट इतिहास गवाह है कि टेस्ट मैच हमेशा गेंदबाज जिताते हैं, बल्लेबाज केवल मैच बचा सकते हैं। जब आप एक ऐसे गेंदबाज को बाहर बैठाते हैं जो सपाट पिचों पर भी दोनों तरफ गेंद टर्न करा सकता है, तो आप वास्तव में अपनी गेंदबाजी आक्रमण की मारक क्षमता से समझौता कर रहे होते हैं।

कुलदीप 2.0 का कायापलट: रफ्तार बढ़ाई, एक्शन सुधारा, फिर भी भरोसा अधूरा

घुटने की गंभीर सर्जरी और करियर के सबसे मुश्किल दौर के बाद कुलदीप यादव ने जिस तरह अपनी गेंदबाजी का कायापलट किया, वह किसी भी खिलाड़ी के लिए प्रेरणादायी है। उन्होंने अपनी आर्म स्पीड बढ़ाई, रन-अप को सीधा और तेज किया, और अपनी गेंदबाजी की गति में 5 से 8 किलोमीटर प्रति घंटे का इजाफा किया ताकि बल्लेबाज उन्हें बैकफुट पर जाकर आसानी से न खेल सकें।

इस तकनीकी सुधार (कुलदीप 2.0) का नतीजा यह रहा कि वे वनडे में भारत के सबसे तेज 150 विकेट लेने वाले स्पिनर बने और एशिया कप व आईसीसी टूर्नामेंट्स में भारत की जीत के प्रमुख सूत्रधार रहे। इसके बावजूद, जब भी कोई बहुप्रतीक्षित टेस्ट सीरीज या विदेशी दौरा आता है, तो मैनेजमेंट फिर से रक्षात्मक मानसिकता में लौट जाता है और कुलदीप के बजाय उंगलियों के स्पिनरों (फिंगर स्पिनर्स) को प्राथमिकता देने लगता है।

आराम या बीमारी: क्या परदे के पीछे कुछ और चल रहा है?

हाल के महीनों में जब भी घरेलू सीरीज या बड़े टूर्नामेंट्स का आयोजन हुआ, तो कुलदीप की अनुपस्थिति को लेकर अक्सर यह बताया गया कि वे हल्के बुखार, वायरल संक्रमण या मांसपेशियों में खिंचाव के चलते अनुपलब्ध हैं। कई बार यह भी कहा गया कि आगामी विदेशी दौरों को देखते हुए उन्हें रोटेशन पॉलिसी के तहत फ्रेश रखा जा रहा है।

लेकिन अंदरूनी सूत्रों और क्रिकेट जानकारों की मानें तो यह ‘आराम’ अक्सर खिलाड़ी की मर्जी से नहीं, बल्कि टीम संयोजन को संतुलित करने की मजबूरी के तहत दिया जाता है। जब किसी इन-फॉर्म खिलाड़ी को बार-बार यह कहकर बाहर बैठाया जाए कि उसे आराम दिया जा रहा है, तो इससे उसकी मैच-फिटनेस और लय दोनों प्रभावित होती हैं। रिस्ट स्पिन एक ऐसी कला है जिसे लगातार मैच खेलकर ही तराशा जा सकता है; नेट्स में घंटों पसीना बहाकर भी मैच जैसी धार हासिल नहीं की जा सकती।

क्रिकेट दिग्गजों के तीखे सवाल: मैच विनर को बाहर रखकर कैसे जीतेंगे बड़े खिताब?

सुनील गावस्कर, हरभजन सिंह, अनिल कुंबले और वसीम अकरम जैसे पूर्व महान क्रिकेटरों ने बार-बार कुलदीप के चयन पर सार्वजनिक रूप से आश्चर्य व्यक्त किया है। पूर्व दिग्गज स्पिनर हरभजन सिंह का मानना है कि कुलदीप यादव जैसे कलाई के स्पिनर हर पीढ़ी में पैदा नहीं होते। वे किसी भी परिस्थिति में, किसी भी पिच पर और किसी भी टीम के खिलाफ विकेट निकालने की कुव्वत रखते हैं।

दिग्गजों का कहना है कि जब ऑस्ट्रेलिया के पास शेन वॉर्न या पाकिस्तान के पास अब्दुल कादिर थे, तो उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि उनका लेग स्पिनर 50 रन बनाएगा या नहीं। वे उन्हें सिर्फ इसलिए खिलाते थे क्योंकि वे विपक्षी टीम के 5-6 विकेट उखाड़ सकते थे। भारतीय टीम को भी अपनी इस रक्षात्मक मानसिकता से बाहर निकलना होगा और कुलदीप को यह भरोसा देना होगा कि उनका स्थान टीम में सुरक्षित है।

गौतम गंभीर और रोहित शर्मा के दौर में क्या बदलेगी कुलदीप की किस्मत?

हेड कोच गौतम गंभीर अपनी आक्रामक और स्पष्ट रणनीति के लिए जाने जाते हैं। गंभीर ने हमेशा इस बात की वकालत की है कि टीम में विकेट लेने वाले गेंदबाजों को सुरक्षा और निरंतर मौके मिलने चाहिए। वहीं कप्तान रोहित शर्मा ने भी सफेद गेंद क्रिकेट में कुलदीप की उपयोगिता को कई बार सराहा है।

आने वाले समय में आईसीसी विश्व टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) के फाइनल की दौड़ और बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी जैसे बेहद कड़े मुकाबलों को देखते हुए कुलदीप यादव की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होने वाली है। यदि भारत को सेना (SENA – साउथ अफ्रीका, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया) देशों में और घरेलू मैदानों पर अपनी बादशाहत कायम रखनी है, तो मैनेजमेंट को कुलदीप के इर्द-गिर्द अपनी स्पिन रणनीति बुननी होगी। उन्हें ‘ऑप्शनल प्लेयर’ के बजाय ‘प्राइम मैच विनर’ का दर्जा देना ही भारतीय क्रिकेट के हित में होगा।

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