
भारतीय क्रिकेट के महान सलामी बल्लेबाज और दिग्गज कमेंटेटर सुनील गावस्कर एक बार फिर अपने बेबाक अंदाज के लिए चर्चा में हैं। ऑस्ट्रेलिया के मैके में खेले गए मुकाबले की विवादित परिस्थितियों, गेंद बदलने के ड्रामे और पिच के असमान व्यवहार को लेकर गावस्कर ने ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट तंत्र और वहां के मीडिया के दोहरे चरित्र की जमकर धज्जियां उड़ाई हैं। गावस्कर ने दो टूक शब्दों में कहा कि जब एशियाई उपमहाद्वीप में गेंद पहले ही दिन से टर्न लेने लगती है, तो पश्चिमी देशों के पूर्व खिलाड़ी और मीडिया तुरंत पिचों को ‘खराब’, ‘अनफिट’ और ‘टेस्ट क्रिकेट के लिए खतरा’ करार देने लगते हैं। वहीं जब ऑस्ट्रेलियाई धरती पर गेंद अप्रत्याशित उछाल लेती है या बल्लेबाज चोटिल होते हैं, तो उसी पिच को ‘चुनौतीपूर्ण’ और ‘सच्चा टेस्ट क्रिकेट’ कहकर महिमामंडित किया जाता है। गावस्कर ने इस मानसिकता को पूरी तरह से ‘बेशर्म पाखंड’ करार दिया है।
मैके की पिच पर असमान उछाल और विवाद का केंद्र
मैके के मैदान पर खेले गए मुकाबले के दौरान पिच की परिस्थितियां लगातार चर्चा में रहीं। खेल के शुरुआती घंटों से ही पिच से तेज गेंदबाजों को जरूरत से ज्यादा सीम मूवमेंट और कई मौकों पर खतरनाक असमान उछाल देखने को मिला। कई गेंदें अप्रत्याशित रूप से नीची रहीं तो कुछ गेंदें अचानक छाती और हेलमेट की ऊंचाई तक उछलीं, जिसने बल्लेबाजों की तकनीक ही नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किए। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में पिच के व्यवहार पर कोई बड़ा विमर्श देखने को नहीं मिला। गावस्कर ने इसी बिंदु को रेखांकित करते हुए कहा कि यदि इसी तरह की पिच भारत के किसी घरेलू मैदान जैसे इंदौर, रांची या अहमदाबाद में देखने को मिलती, जहां पहले सत्र से ही परिणाम तय होने लगते, तो आईसीसी से लेकर वैश्विक मीडिया तक हायतौबा मच जाती और पिच को डिमेरिट अंक देने की मांग उठने लगती।
विदेशी मीडिया के नैरेटिव और पूर्व क्रिकेटरों की खामोशी पर सवाल
सुनील गावस्कर ने अपने लंबे अंतरराष्ट्रीय और कमेंट्री करियर के अनुभवों का हवाला देते हुए पश्चिमी क्रिकेट जगत के उस पुराने ढर्रे को उजागर किया, जो हमेशा से उपमहाद्वीप की क्रिकेट संस्कृति को नीचा दिखाने का प्रयास करता रहा है। जब भी ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड या दक्षिण अफ्रीका में कोई मुकाबला दो या तीन दिन के भीतर खत्म होता है, तो उसे बल्लेबाजों की खराब तकनीक या गेंदबाजों का शानदार स्पेल बताकर रफा-दफा कर दिया जाता है। इसके विपरीत, जब भारत में कोई टेस्ट मैच ढाई-तीन दिन में समाप्त होता है, तो खेल के बजाय पूरी चर्चा सिर्फ और सिर्फ ‘पिच डॉक्टरिंग’ और क्यूरेटर के इर्द-गिर्द सिमट जाती है। गावस्कर ने सवाल उठाया कि जब अपनी धरती पर परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर होती हैं, तब विदेशी विशेषज्ञ तकनीकी खामियों की बात क्यों नहीं करते और अपनी ही पिचों की निष्पक्ष समीक्षा करने से क्यों कतराते हैं।
गेंद विवाद और भारतीय टीम पर अनर्गल दबाव की रणनीति
मैके मुकाबले के दौरान केवल पिच ही नहीं, बल्कि गेंद बदलने को लेकर अंपायरों द्वारा भारतीय खिलाड़ियों पर बनाए गए अनुचित दबाव पर भी गावस्कर ने गहरी नाराजगी जताई। बिना किसी ठोस सुबूत के भारतीय टीम के व्यवहार पर सवाल खड़े करना और मैदान पर अनावश्यक विवाद पैदा करना ऑस्ट्रेलियाई टीमों की पुरानी रणनीति का हिस्सा रहा है। गावस्कर का मानना है कि जब भी ऑस्ट्रेलियाई टीम मैदान पर पिछड़ती नजर आती है या परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं होतीं, तो वे मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए ऐसे विवादों को हवा देते हैं। गावस्कर ने भारतीय दल के संयम की सराहना करते हुए स्पष्ट किया कि आज का भारतीय क्रिकेट किसी भी तरह के दबाव या पूर्वग्रह से ग्रसित बयानों के आगे झुकने वाला नहीं है।
आईसीसी की रेटिंग प्रणाली में निष्पक्षता की सख्त जरूरत
सुनील गावस्कर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) और मैच अधिकारियों के मूल्यांकन तंत्र पर भी निष्पक्ष आत्ममंथन की अपील की। पिच रेटिंग के मामले में वैश्विक संस्था को भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर एक समान नियम लागू करने चाहिए। यदि टर्निंग ट्रैक को ‘औसत से नीचे’ या ‘खराब’ श्रेणी में रखा जा सकता है, तो अत्यधिक हरी, खतरनाक उछाल वाली या दोहरी गति से खेलने वाली पिचों को भी उसी कड़े पैमाने पर आंका जाना चाहिए। गावस्कर का यह कड़ा बयान वैश्विक क्रिकेट जगत में पिचों को लेकर वर्षों से चले आ रहे एकतरफा विमर्श को सीधे चुनौती देता है और भारतीय क्रिकेट के आत्मसम्मान को मजबूती से सामने रखता है।
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