‘आमिर खान बन गए असली गजनी!’ सोनम वांगचुक ने ‘3 इडियट्स’ के दौरान पहचान न होने वाले दावे पर कसा तीखा तंज, खोल दी पुरानी मुलाकातों की पूरी पोल

भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई फिल्म ‘3 इडियट्स’ और उसके मुख्य किरदार ‘फुंसुख वांगडू’ की चर्चा आज भी देश-दुनिया में होती है। लद्दाख के जाने-माने शिक्षा सुधारक, पर्यावरणविद् और वैज्ञानिक सोनम वांगचुक को हमेशा से इस किरदार की असली प्रेरणा माना गया। हालांकि, हाल के समय में अभिनेता आमिर खान और फिल्म निर्माताओं द्वारा यह कहे जाने पर कि फिल्म बनाते वक्त वे सोनम वांगचुक को नहीं जानते थे, अब वांगचुक ने बेहद रोचक और करारा जवाब दिया है। सोनम वांगचुक ने चुटकी लेते हुए आमिर खान को उनके ही मशहूर फिल्मी किरदार ‘गजनी’ की याद दिला दी और कहा कि लगता है आमिर खान को पुरानी बातें याद नहीं रहतीं।

वांगचुक का यह बयान सोशल मीडिया और सिनेमा प्रेमियों के बीच तेजी से चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच पर इस तरह की बात कहता है, तो यह केवल विस्मृति का ही मामला हो सकता है, क्योंकि फिल्म बनने से पहले और उसके दौरान कई स्तरों पर उनके काम और नवाचारों पर विस्तार से बातचीत हुई थी।

‘3 इडियट्स’ और फुंसुख वांगडू का वास्तविक किरदार

साल 2009 में रिलीज हुई निर्देशक राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘3 इडियट्स’ ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की खामियों को बड़े पर्दे पर उजागर किया था। फिल्म में आमिर खान द्वारा निभाया गया रैंचो यानी फुंसुख वांगडू का किरदार सीधे तौर पर लद्दाख में वैकल्पिक शिक्षा मॉडल विकसित करने वाले सोनम वांगचुक के जीवन और उनके अनूठे प्रयोगों से प्रेरित था।

वांगचुक ने लद्दाख में ‘एसईसीएमओएल’ (SECMOL) स्कूल की स्थापना की थी, जहां उन छात्रों को पढ़ाया जाता था जो पारंपरिक परीक्षा प्रणाली में फेल हो जाते थे। यहां बच्चों को रटने की जगह व्यावहारिक ज्ञान, सौर ऊर्जा के उपयोग, बिल्डिंग निर्माण और जीवनोपयोगी हुनर सिखाए जाते थे। फिल्म में भी फुंसुख वांगडू का स्कूल लद्दाख में बिल्कुल इसी तर्ज पर दिखाया गया था, जहां बच्चे उड़ने वाले ड्रोन, साइकिल से चलने वाली चक्कियां और देसी आविष्कार करते नजर आए थे। इसी वजह से जनता और मीडिया ने हमेशा सोनम वांगचुक को असली रैंचो का दर्जा दिया।

गजनी का ताना: पुरानी मुलाकातों और दावों की खुली पोल

सोनम वांगचुक ने एक हालिया बातचीत में आमिर खान के बयानों का जिक्र करते हुए कहा कि आमिर खान का यह कहना कि वे ‘3 इडियट्स’ के समय उनसे वाकिफ नहीं थे, पूरी तरह हास्यास्पद है। वांगचुक ने मुस्कुराते हुए कहा कि आमिर खान ने शायद ‘गजनी’ फिल्म में काम करने के बाद अपनी याददाश्त खोने वाली बीमारी को असल जिंदगी में भी अपना लिया है।

वांगचुक के अनुसार, फिल्म निर्माण की प्रक्रिया के दौरान टीम उनके नवाचारों, शिक्षण विधियों और लद्दाख के स्कूल के कामकाज से पूरी तरह परिचित थी। कई शोधकर्ताओं और टीम के सदस्यों ने लद्दाख के उस शिक्षा मॉडल का गहराई से अध्ययन किया था। इसके बावजूद अगर कोई बड़ा अभिनेता यह दावा करता है कि वह वास्तविक किरदार की पहचान से अनजान था, तो यह या तो क्रेडिट देने से बचने की कोशिश है या फिर सचमुच की ‘गजनी’ जैसी शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस की समस्या है।

लद्दाख से बॉलीवुड तक: विचार और श्रेय की जंग

बॉलीवुड में अक्सर वास्तविक जीवन के नायकों की कहानियों को परदे पर उतारते समय उनके आधिकारिक क्रेडिट को लेकर विवाद खड़े होते रहे हैं। हालांकि सोनम वांगचुक ने कभी भी फिल्म से आर्थिक लाभ या औपचारिक श्रेय की मांग को लेकर कोई कानूनी लड़ाई नहीं लड़ी। वांगचुक का मानना रहा है कि उनका मुख्य ध्येय समाज में सुधार लाना और लद्दाख के नाजुक पर्यावरण को बचाना है, न कि फिल्मी चमक-दमक का हिस्सा बनना।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘3 इडियट्स’ की अपार सफलता के पीछे सबसे बड़ी ताकत उसकी मौलिकता और जमीनी हकीकत थी। लद्दाख के दुर्गम पहाड़ों में बर्फ के स्तूप (आइस स्तूपा) बनाने से लेकर सौर ऊर्जा से चलने वाले टेंट डिजाइन करने वाले वैज्ञानिक के जीवन को परदे पर भुनाया गया, लेकिन जब बात उस महान व्यक्ति को सार्वभौमिक सम्मान और खुला श्रेय देने की आई, तो बॉलीवुड के दिग्गजों ने अक्सर गोलमोल रवैया अपनाया। वांगचुक का हालिया बयान इसी दोमुंहेपन पर एक शालीन लेकिन सटीक चोट है।

सोनम वांगचुक की नई लड़ाई और मौजूदा चुनौतियां

आज सोनम वांगचुक केवल एक शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि लद्दाख के पर्यावरण, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों के सबसे बड़े पैरोकार बन चुके हैं। वे लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और वहां के संवेदनशील ग्लेशियरों को औद्योगिक दोहन से बचाने के लिए लगातार शांतिपूर्ण अनशन और मार्च कर रहे हैं। शून्य से नीचे के तापमान में खुले आसमान के नीचे ‘क्लाइमेट फास्ट’ करके उन्होंने पूरे देश का ध्यान लद्दाख की समस्याओं की ओर खींचा है।

वांगचुक का यह बेबाक अंदाज दिखाता है कि वे परदे के काल्पनिक किरदारों से कहीं अधिक मजबूत और प्रेरणादायी इंसान हैं। फिल्मी दुनिया भले ही अपने प्रचार के लिए वास्तविक जीवन की कहानियों को इस्तेमाल करे और फिर भूल जाए, लेकिन सोनम वांगचुक का काम और उनकी निष्ठा इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगी। उनका यह कटाक्ष न सिर्फ आमिर खान के लिए एक आईना है, बल्कि उस पूरी इंडस्ट्री के लिए भी सबक है जो वास्तविक नायकों के संघर्ष की बदौलत करोड़ों की कमाई तो करती है, लेकिन उन्हें उचित सम्मान देने में कंजूसी बरतती है।

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