
आधुनिक भारत में जहां महिलाएं अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर सेना के अग्रिम मोर्चों, कॉर्पोरेट जगत और लोकतांत्रिक राजनीति के शीर्ष पदों पर अपनी योग्यता का परचम लहरा रही हैं, वहीं धार्मिक मंचों से महिलाओं की भूमिका और उनकी स्वतंत्रता को लेकर आने वाली रूढ़िवादी टिप्पणियां अक्सर बड़े विवादों को जन्म देती हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक सभा के दौरान ग्रैंड मुफ्ती द्वारा महिलाओं की तुलना ‘सोने के बेशकीमती हार’ से करते हुए दिया गया बयान राष्ट्रीय स्तर पर तीव्र बहस और आक्रोश का केंद्र बन गया है। उन्होंने अपने संबोधन में तर्क दिया कि जिस तरह सोने के गहने तिजोरी में सुरक्षित और चमकीले रहते हैं, उसी तरह महिलाएं भी जब तक चारदीवारी और पर्दों के भीतर मर्यादित रहती हैं, तब तक उनकी सुंदरता और गरिमा बनी रहती है; यदि वे सड़कों पर उतरेंगी या सार्वजनिक प्रदर्शनों का हिस्सा बनेंगी, तो उनकी यह सुंदरता और सामाजिक आभा हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगी।
यह बयान सामने आते ही दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ, बेंगलुरु और श्रीनगर समेत देश के तमाम बौद्धिक व सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वीडियो क्लिप्स के वायरल होने के बाद से ही सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और जागरूक नागरिकों ने इसे 21वीं सदी के लोकतांत्रिक भारत में महिलाओं की स्वायत्तता और उनके बुनियादी मानवाधिकारों पर सीधा आघात करार दिया है।
‘सोने के हार और तिजोरी की उपमा’: मुफ्ती के विवादित तर्क का पूरा विश्लेषण
अपने संबोधन के दौरान ग्रैंड मुफ्ती ने परंपरा, धार्मिक मर्यादा और पारंपरिक पारिवारिक संरचना का हवाला देते हुए महिलाओं की सार्वजनिक गतिविधियों को सीमित करने की वकालत की। उन्होंने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि समाज में हर कीमती वस्तु को हिफाजत में रखा जाता है। कोई भी व्यक्ति अपने सोने के आभूषणों, हीरों और जवाहरात को सड़क पर नहीं छोड़ता, बल्कि उन्हें सुरक्षित लॉकर या अलमारी में सहेज कर रखता है ताकि उनकी चमक और सुरक्षा बरकरार रहे।
इसी उपमा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने महिलाओं को समाज का सबसे कीमती ‘सोना’ बताया और दावा किया कि उनका सार्वजनिक जीवन में, विशेष रूप से विरोध प्रदर्शनों, रैलियों या अनियंत्रित भीड़ का हिस्सा बनना उनकी प्राकृतिक शालीनता और सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ है। उनका मानना था कि महिलाओं की असली पहचान और गरिमा घर के भीतर, पारिवारिक दायित्वों को निभाने और पारंपरिक सीमाओं का पालन करने में ही निहित है। हालांकि, उनके इस बयान को संरक्षणवादी भाषा की आड़ में महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाए रखने और उनकी गतिशीलता पर पाबंदी लगाने का एक और रूढ़िवादी प्रयास माना जा रहा है।
महिला अधिकार संगठनों और नागरिक समाज का तीखा आक्रोश
ग्रैंड मुफ्ती के इस बयान पर महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों ने कड़ा रुख अपनाया है। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने संयुक्त रूप से बयान जारी करते हुए कहा कि महिलाओं को किसी जड़ वस्तु, सोने के हार या संपत्ति के समान देखना ही पितृसत्तात्मक मानसिकता की सबसे बड़ी जड़ है। महिलाएं स्वतंत्र चेतना, बौद्धिक क्षमता और संवैधानिक अधिकारों से लैस नागरिक हैं, न कि किसी की निजी मिल्कियत जिसे तिजोरियों में बंद करके रखा जाए।
महिला आयोगों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने रेखांकित किया कि इस प्रकार की बयानबाजी न केवल महिलाओं के संघर्ष और उनकी ऐतिहासिक उपलब्धियों को कमतर आंकती है, बल्कि रूढ़िवादी तत्वों को महिलाओं पर पाबंदियां थोपने का अनुचित हौसला भी देती है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सड़क, संसद, कार्यस्थल और सार्वजनिक मंच किसी एक वर्ग या लिंग की बपौती नहीं हैं; वे हर उस नागरिक के हैं जो राष्ट्र निर्माण और समाज के विकास में अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराना चाहता है।
भारतीय संविधान और समानता का अधिकार: वस्तु बनाम स्वतंत्र नागरिक
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है। इसके साथ ही अनुच्छेद 19 और 21 प्रत्येक भारतीय नागरिक को विचार अभिव्यक्ति, किसी भी पेशे को चुनने और गरिमापूर्ण जीवन जीने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करते हैं।
कानूनी जानकारों का स्पष्ट मत है कि किसी भी धार्मिक व्याख्या या पारंपरिक विचार को भारत के संवैधानिक मूल्यों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। जब देश की बेटियां लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, इसरो के उपग्रह अभियानों का नेतृत्व कर रही हैं, ओलंपिक पदकों से देश का नाम रोशन कर रही हैं और देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रही हैं, तब उन्हें सिर्फ ‘घर की सजावट’ या ‘तिजोरी की वस्तु’ के रूप में परिभाषित करना न केवल संवैधानिक आदर्शों के विपरीत है, बल्कि देश की प्रगतिशील सोच को भी पीछे धकेलने वाला कदम है।
धर्म, आधुनिकता और महिला स्वतंत्रता: समाज के सामने खड़े बुनियादी सवाल
यह विवाद एक बार फिर इस गंभीर प्रश्न को सतह पर लाता है कि क्या धार्मिक और पारंपरिक संस्थाएं आधुनिक युग की बदलती वास्तविकताओं और लैंगिक समानता के सिद्धांतों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। आज की मुस्लिम और भारतीय महिलाएं शिक्षा, उच्च पदों, उद्यमशीलता और सामाजिक नेतृत्व में अभूतपूर्व भूमिका निभा रही हैं। वे न केवल अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं, बल्कि वे समाज के भीतर मौजूद पितृसत्तात्मक नियमों को तार्किक रूप से चुनौती भी दे रही हैं।
कई प्रगतिशील मुस्लिम विचारकों और विद्वानों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि इस्लाम और अन्य धर्मों का मूल संदेश महिलाओं को न्याय, शिक्षा और सम्मान देना है, न कि उन्हें समाज से काट कर अलग-थलग करना। इतिहास गवाह है कि पैगंबर के दौर में भी महिलाएं व्यापार, ज्ञान, युद्ध के मैदानों और सामाजिक निर्णयों में सक्रिय रूप से भाग लेती थीं। ऐसे में ऐतिहासिक संदर्भों को नजरअंदाज कर संकीर्ण व्याख्याएं प्रस्तुत करना समाज के भीतर रूढ़िवादिता को बढ़ावा देता है।
सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की उपस्थिति उनकी गरिमा को कम नहीं करती, बल्कि वह किसी भी राष्ट्र के लोकतंत्र, न्याय और मानवीय विकास की सबसे सच्ची कसौटी होती है। कोई भी समाज तब तक प्रगति के शिखर पर नहीं पहुंच सकता जब तक उसकी आधी आबादी को केवल सजावट की वस्तु मानकर उसकी आकांक्षाओं को सीमित रखने की कोशिश की जाती रहेगी। देश का व्यापक जनमानस आज यह स्पष्ट संदेश दे रहा है कि 21वीं सदी की भारतीय महिला अपनी पहचान, स्वावलंबन और खुले आसमान में उड़ान भरने की आजादी से किसी भी कीमत पर समझौता करने को तैयार नहीं है।
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