दिल्ली के इस ऐतिहासिक स्टेशन से कभी दौड़ती थी लाहौर के लिए ट्रेन: 1947 के बंटवारे, खून से सनी पटरियों और अपनों के बिछड़ने की वो खौफनाक दास्तान, जिसे सुनकर आज भी कांप उठती है रूह

देश की राजधानी दिल्ली का दिल कहे जाने वाले चांदनी चौक के समीप स्थित पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन (दिल्ली जंक्शन) आज रोजाना लाखों मुसाफिरों की चहल-पहल, कुली की आवाजों और ट्रेनों के हॉर्न से गूंजता रहता है। लाल ईंटों से बनी किलेनुमा इमारत वाला यह स्टेशन देखने में भले ही एक सामान्य ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन लगता हो, लेकिन इसकी पटरियों और विशालकाय मेहराबों के पीछे एक ऐसा खौफनाक और दिल दहला देने वाला इतिहास दफन है, जिसे याद करके आज भी आंखें नम हो जाती हैं। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में बना यह वही स्टेशन है, जहां से कभी बिना किसी पासपोर्ट और वीजा के सीधे लाहौर, रावलपिंडी और पेशावर के लिए सीधी ट्रेनें सीटी बजाते हुए निकला करती थीं।

साल 1864 में शुरू हुआ और 1903 में अपने मौजूदा भव्य रूप में तैयार हुआ पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन केवल एक परिवहन केंद्र नहीं था, बल्कि यह संयुक्त भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक ताने-बाने की धड़कन हुआ करता था। लेकिन साल 1947 में जब देश के सीने पर विभाजन की खूनी लकीर खींची गई, तो यही स्टेशन इंसानी इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन, बेपनाह नफरत, आंसुओं और कत्लेआम का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।

जब लाहौर के लिए बजती थी सीटी: आजादी से पहले की बेरोकटोक यात्राएं

विभाजन से पहले दिल्ली और लाहौर का रिश्ता दो सगे भाइयों जैसा था। पुरानी दिल्ली के व्यापारियों का माल लाहौर के अनारकली बाजार में बिकता था और लाहौर के छात्र, शायर, संगीतकार और व्यवसायी रात की ट्रेन पकड़कर सुबह पुरानी दिल्ली स्टेशन पर उतरा करते थे। उस समय फ्रंटियर मेल और लाहौर एक्सप्रेस जैसी प्रसिद्ध ट्रेनें इसी स्टेशन से रवाना होती थीं। लोग शाम को दिल्ली से बैठते थे और अगली सुबह लाहौर के रेलवे स्टेशन पर चाय की चुस्कियां ले रहे होते थे।

दोनों शहरों के बीच आवाजाही इतनी सहज और सामान्य थी कि किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन यह खूबसूरत रेल मार्ग इंसानों के खून से लाल हो जाएगा। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और सीमा पार के इलाकों में रहने वाले परिवारों के रिश्तेदार दोनों तरफ फैले हुए थे। शादियों की बारातें और त्योहारों की खुशियां इसी रेल मार्ग के जरिए एक शहर से दूसरे शहर पहुंचती थीं। स्टेशन का प्लेटफार्म नंबर एक और दो उस दौर में उम्मीदों और नए सफर के उल्लास का प्रतीक माना जाता था।

अगस्त 1947 का वो काला मंजर: जब पटरियों पर आने लगीं लाशों से भरी ‘भूतिया ट्रेनें’

14 और 15 अगस्त 1947 को जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, उसी वक्त पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन एक अंतहीन त्रासदी के साए में घिर चुका था। अंग्रेजों द्वारा खींची गई सीमा रेखा (रेडक्लिफ लाइन) ने करोड़ों लोगों को रातों-रात अपनी ही मिट्टी में बेगाना और शरणार्थी बना दिया। अचानक पुरानी दिल्ली स्टेशन पर उन लाखों मुसलमानों की भीड़ जमा होने लगी जो अपनी जान बचाकर पाकिस्तान जाने वाली ट्रेनों में चढ़ने के लिए बेताब थे। दूसरी तरफ, पश्चिमी पंजाब (लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान) से हिंदू और सिख शरणार्थियों को लेकर आने वाली ट्रेनें जब दिल्ली जंक्शन पर रुकती थीं, तो पूरा स्टेशन चीख-पुकार और मातम में डूब जाता था।

इतिहास की किताबों और उस दौर के चश्मदीदों के संस्मरणों के अनुसार, विभाजन के उस दौर में चलने वाली ट्रेनों को ‘भूतिया ट्रेनें’ (Ghost Trains या Blood Trains) कहा जाने लगा था। कई बार लाहौर से चलकर दिल्ली पहुंचने वाली पूरी की पूरी ट्रेन में एक भी जिंदा इंसान नहीं बचता था। रास्ते में दंगाई ट्रेनों को रोककर नरसंहार करते थे और ट्रेन जब पुरानी दिल्ली स्टेशन के प्लेटफार्म पर आकर रुकती थी, तो उसके डिब्बों से खून बहकर पटरियों पर गिर रहा होता था। प्लेटफार्म पर अपनों का इंतजार कर रहे लोगों को केवल अपने परिजनों के क्षत-विक्षत शव मिलते थे।

आंसुओं, चीखों और बिछड़ने की दास्तान: प्लेटफार्म पर शरणार्थियों का महासागर

अगस्त और सितंबर 1947 के महीनों में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के अंदर पैर रखने की भी जगह नहीं थी। प्लेटफार्म, प्रतीक्षालय, सीढ़ियां और यहां तक कि रेल की पटरियों के किनारे लाखों लोग खुले आसमान के नीचे पड़े हुए थे। न पीने का साफ पानी था, न खाने के लिए रोटी। भूख, हैजा और बीमारियों से तड़पते बच्चों और बुजुर्गों की लाशें स्टेशन के कोनों में पड़ी रहती थीं। स्टेशन के आसपास का पूरा इलाका—चांदनी चौक, कश्मीरी गेट और लाल किला मैदान—शरणार्थी शिविरों में तब्दील हो चुका था।

इस स्टेशन ने ऐसे अनगिनत दर्दनाक दृश्य देखे जहां भीड़ में हाथ छूट जाने से मां अपने बच्चे से हमेशा के लिए अलग हो गई, कोई पति अपनी पत्नी को ढूंढते-ढूंढते पागल हो गया, तो कई नौजवान अपने पूरे परिवार को दंगों में खोकर अकेले खाली आंखों से स्टेशन के खंभों को ताकते रहे। लोग केवल एक उम्मीद में पटरियों पर बैठे रहते थे कि शायद आने वाली अगली ट्रेन में उनका कोई बिछड़ा हुआ अपना जिंदा लौट आए। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का वह दौर मानवीय संवेदनाओं के पूरी तरह बिखर जाने का सबसे बड़ा गवाह बना।

समझौता एक्सप्रेस से कटी हुई पटरियों तक: सरहद और यादों की कड़वी दास्तान

बंटवारे के खूनी दौर के बाद दिल्ली और लाहौर के बीच चलने वाली नियमित ट्रेन सेवाएं हमेशा के लिए बंद हो गईं। दोनों देशों के बीच बने नए नियमों, कंटीले तारों और सरहदों ने उस सदियों पुराने रास्ते को काट दिया। हालांकि, दशकों बाद दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने और बिछड़े परिवारों को मिलाने के उद्देश्य से साल 1976 में ‘समझौता एक्सप्रेस’ की शुरुआत की गई, जो पुरानी दिल्ली/अटारी से लाहौर के बीच चलती थी।

लेकिन यह रेल मार्ग भी राजनीति, तनाव और आतंकी हमलों की भेंट चढ़ता रहा। साल 2007 में जब दिल्ली से अटारी जा रही समझौता एक्सप्रेस में बम धमाके हुए, तो एक बार फिर उस ऐतिहासिक मार्ग पर दर्जनों बेगुनाह जिंदगियां खत्म हो गईं। आखिरकार बढ़ते तनाव और कूटनीतिक गतिरोध के चलते इस ट्रेन सेवा को भी पूरी तरह स्थगित कर दिया गया।

आज जब कोई यात्री पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़ा होकर चाय पीता है या अपनी ट्रेन का इंतजार करता है, तो उसे शायद ही अहसास होता हो कि जिस जमीन पर वह खड़ा है, वह कभी इतिहास के सबसे बड़े आंसुओं और दर्दों से भीगी थी। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की लाल दीवारें आज भी खामोशी से उस दौर की गवाही देती हैं जब राजनीति की खींची लकीरों ने एक ही धड़कन वाले दो शहरों को हमेशा के लिए जुदा कर दिया और पटरियों पर केवल दर्दनाक यादों का अंतहीन सफर छोड़ दिया।

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