
भारतीय सिनेमा में ‘थलाइवा’ के नाम से मशहूर सुपरस्टार रजनीकांत की लोकप्रियता का कोई मुकाबला नहीं है। परदे पर चश्मा घुमाने से लेकर सिगरेट उछालने और संवाद अदायगी का उनका जो अनोखा अंदाज (Swag) दुनिया भर के दर्शकों को दीवाना बनाता है, उसकी शुरुआत किसी फिल्म सेट या एक्टिंग स्कूल में नहीं हुई थी। यह जादू आज से दशकों पहले बेंगलुरु की सड़कों पर दौड़ती बीटीएस (Bangalore Transport Service) की हरी बसों के भीतर जन्म ले चुका था।
फ़िल्मों में आने से पहले रजनीकांत का असली नाम शिवाजी राव गायकवाड़ था और वे बेंगलुरु में बस कंडक्टर की नौकरी किया करते थे। उस दौर में भी उनके भीतर का ‘सुपरस्टार’ पूरी शिद्दत से जिंदा था। बस में सवारियों से डील करने का उनका तरीका इतना नाटकीय और मनोरंजक होता था कि यात्री केवल उनका स्टाइल देखने के लिए सफर किया करते थे।
टिकट काटने का अंदाज और सीटी का सुर: जब कंडक्टर शिवाजी के फैन हो गए थे बेंगलुरु के यात्री
बेंगलुरु के मैजेस्टिक से श्रीनगर (रूट नंबर 10A) के बीच चलने वाली बस में जब कंडक्टर के रूप में शिवाजी राव गायकवाड़ की ड्यूटी होती थी, तो उस रूट का नजारा ही बदल जाता था। अमूमन लोग बस स्टैंड पर जो भी बस पहले आए, उसमें चढ़ जाते हैं, लेकिन शिवाजी की बस के मामले में ऐसा नहीं था। यात्री पहली या दूसरी बस को निकल जाने देते थे और सिर्फ उसी बस का इंतजार करते थे जिसमें शिवाजी राव कंडक्टर हुआ करते थे।
उनकी सबसे बड़ी खासियत थी उनकी बिजली जैसी फुर्ती और अनोखा स्वैग:
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सिक्के उछालकर खुले पैसे देना: जब कोई यात्री उन्हें बड़ा नोट देता था, तो वे बाकी के सिक्के अपनी जेब से निकालकर हवा में हल्की सी कलाबाजी देकर यात्री की हथेली पर थमाते थे।
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टिकट पंच करने की रफ्तार: चुटकी बजाते ही टिकट की गड्डी से पर्ची फाड़ना और एक खास लय में टिकट पांच करना उनका ट्रेडमार्क बन गया था।
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म्यूजिकल सीटी और सिग्नेचर एंट्री: बस को रोकने या चलाने के लिए वे सीटी को साधारण तरीके से नहीं बजाते थे, बल्कि उसमें एक संगीतमय धुन होती थी। चलती बस में चढ़ने और उतरने का उनका अंदाज इतना तेज होता था कि लोग बस एकटक देखते रह जाते थे।
ड्राइवर दोस्त ने पहचाना हुनर और बदल गई किस्मत
इसी बस में उनके साथ ड्राइवर के रूप में राज बहादुर काम करते थे, जो रजनीकांत के सबसे करीबी दोस्त बने। राज बहादुर ने देखा कि शिवाजी ना केवल बस में लोगों का मनोरंजन करते हैं, बल्कि वे नाटकों में भी जबरदस्त अभिनय और संवाद अदायगी करते हैं। राज बहादुर ने ही शिवाजी को अपनी जमापूंजी से आर्थिक मदद दी और मद्रास (चेन्नई) जाकर ‘मद्रास फिल्म इंस्टीट्यूट’ में दाखिला लेने के लिए प्रेरित किया।
बाकी इतिहास हम सब जानते हैं। जब दिग्गज निर्देशक के. बालचंदर ने शिवाजी राव को देखा, तो उन्होंने उनका नाम बदलकर ‘रजनीकांत’ रखा और साल 1975 में फिल्म ‘अपूर्वा रागंगल’ से उन्हें ब्रेक दिया। रजनीकांत ने भले ही बस कंडक्टर से लेकर एशिया के सबसे महंगे और लोकप्रिय अभिनेताओं में से एक बनने का सफर तय कर लिया हो, लेकिन उनका वह शुरुआती स्वैग आज भी उनकी हर फिल्म और उनके हर फैन के दिल में जिंदा है।
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