पुरी/उड़ीसा: 16 जुलाई 2026 से आस्था का महाकुंभ ‘विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा’ शुरू हो चुकी है। महाप्रभु जगन्नाथ पूरे ब्रह्मांड में इकलौते ऐसे देव हैं, जो स्वयं अपने गर्भगृह से निकलकर भक्तों को दर्शन देने रथ पर सवार होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पुरी मंदिर में स्थापित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की यह काष्ठ (लकड़ी) की अनूठी मूर्तियां किसने और कैसे बनवाईं? पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, इन पवित्र प्रतिमाओं के निर्माण के पीछे परम विष्णु भक्त राजा इन्द्रद्युम्न और देवशिल्पी विश्वकर्मा से जुड़ी एक बेहद विस्मयकारी कथा है।
कौन थे राजा इन्द्रद्युम्न और क्या था उनका दिव्य स्वप्न?
शास्त्रों के अनुसार, प्राचीन काल में मालवा प्रांत के राजा इन्द्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम उपासक थे। एक रात श्रीहरि के साक्षात दर्शन की व्याकुलता में राजा कुशा (घास) के आसन पर सो गए। तभी उनके स्वप्न में शंख, चक्र, गदा और धनुष-बाण धारण किए, गरुड़ पर सवार नील पुखराज की आभा वाले साक्षात भगवान वासुदेव प्रकट हुए।
प्रभु ने राजा की भक्ति से प्रसन्न होकर कहा— “हे राजन! मैं तुम्हारे क्षेत्र में ही समुद्र तट के निकट निवास करूंगा। तुम मेरी एक भव्य प्रतिमा का निर्माण कराओ। इसके लिए तुम कल सुबह समुद्र तट पर जाना, वहां तुम्हें एक विशाल दिव्य वृक्ष दिखाई देगा, जिसका आधा हिस्सा पानी में और आधा जमीन पर होगा। तुम कुल्हाड़ी लेकर जाना और उस महावृक्ष को काटना, उसमें तुम्हें एक अलौकिक प्रकाश पुंज दिखाई देगा, जिससे मेरी प्रतिमा तैयार होगी।”
समुद्र तट पर मिला महावृक्ष और देवशिल्पी विश्वकर्मा का आगमन
अगली सुबह जब राजा इन्द्रद्युम्न पुरी के समुद्र तट पर पहुंचे, तो उन्हें ठीक वैसा ही चमत्कारी वृक्ष मिला। राजा ने जैसे ही उस पर कुल्हाड़ी से प्रहार किया, उसमें से एक अद्भुत प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। इसके बाद, स्वयं देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध मूर्तिकार के रूप में राजा के दरबार में आए। उन्होंने शर्त रखी कि वे बंद कमरे में 21 दिनों में मूर्ति बनाएंगे और इस दौरान कोई भी दरवाजा नहीं खोलेगा।
परंतु, उत्सुकतावश राजा ने समय से पहले ही दरवाजा खोल दिया, जिससे विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां हाथ-पैर के बिना वैसी ही अधूरी रह गईं, जैसी आज हम देखते हैं। भगवान ने इसे ही अपना मूल स्वरूप स्वीकार किया।
रथ की रस्सी खींचने मात्र से मिलता है सीधे बैकुंठ का टिकट
सनातन परंपरा में मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु रथ यात्रा के दौरान भगवान के मुख्य रथ की रस्सी को छूता या खींचता है, उसके जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। जो भक्त रथ के आगे चलकर महाप्रभु के मुखारविंद के दर्शन करते हैं और रास्ते की धूल व कीचड़ में लेटकर उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हैं, उन्हें मरणोपरांत सीधे श्रीविष्णु के परम धाम ‘बैकुंठ’ में स्थान मिलता है। यही कारण है कि इस दिव्य क्षण का साक्षी बनने के लिए हर साल देश-दुनिया से लाखों भक्त पुरी की पावन धरती पर उमड़ते हैं।
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