
सावन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी मानी जाती है। इस पावन अवसर पर समूचा देश ‘हर-हर महादेव’, ‘जय शिव शंभू’ और ‘बम-बम भोले’ के तारों से गूंज उठता है। विशेषकर कांवड़ यात्रा पर निकले लाखों श्रद्धालु हरिद्वार, ऋषिकेश, गोमुख और अन्य पवित्र नदियों व तीर्थों से पवित्र गंगाजल लेकर अपने-अपने क्षेत्रों के प्रसिद्ध शिवालयों की ओर प्रस्थान करते हैं। सावन शिवरात्रि के इस पावन पर्व पर शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए श्रद्धालुओं में एक अद्भुत उत्साह और भक्ति भावना देखने को मिलती है। हालांकि, हर वर्ष की तरह इस बार भी कई श्रद्धालुओं और कांवड़ियों के मन में भद्रा काल को लेकर एक बड़ा संशय बना हुआ है। लोग यह जानने के लिए आतुर हैं कि क्या भद्रा काल के दौरान महादेव का जलाभिषेक करना शुभ रहेगा अथवा अशुभ, और कावड़ जल चढ़ाने का सबसे उत्तम मुहूर्त कौन सा होगा।
भद्रा काल का ज्योतिषीय गणित और भगवान शिव की पूजा पर इसका प्रभाव
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भद्रा को सूर्य देव की पुत्री और शनिदेव की बहन माना गया है। भद्रा का स्वभाव उग्र और विनाशकारी माना गया है, यही कारण है कि किसी भी शुभ या मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुंडन संस्कार, गृह प्रवेश, नामकरण या नए व्यवसाय के शुभारंभ में भद्रा काल का विशेष रूप से त्याग किया जाता है। माना जाता है कि भद्रा काल में शुरू किए गए मांगलिक कार्यों में विघ्न-बाधाएं आती हैं। परंतु, जब बात भगवान शिव की पूजा, रुद्राभिषेक या सावन शिवरात्रि के जलाभिषेक की आती है, तो इसके धार्मिक और ज्योतिषीय नियम पूरी तरह से बदल जाते हैं।
वैदिक पंचांग और पौराणिक शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव को ‘कालेश्वर’, ‘महाकाल’ और ‘त्रिपुरारी’ कहा गया है। महादेव काल, समय और ब्रह्मांड के सभी ग्रहों व नक्षत्रों के स्वामी हैं। शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव की भक्ति और उपासना पर भद्रा दोष का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। इसके अतिरिक्त, भद्रा का वास स्थान भी ज्योतिष में अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। भद्रा तीनों लोकों—स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी—में भ्रमण करती है। जब भद्रा का वास स्वर्ग या पाताल लोक में होता है, तो उसका प्रभाव पृथ्वी वासियों के लिए शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। सावन शिवरात्रि के दिन बनने वाली भद्रा की स्थिति का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि यह भद्रा पृथ्वी लोक को दुष्प्रभावित नहीं करेगी। इसलिए, कांवड़ियों और आम श्रद्धालुओं को भद्रा काल के विचार से भयभीत होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। आप पूरे भक्ति भाव और निष्ठा के साथ महादेव का जलाभिषेक कर सकते हैं।
कावड़ जल और शिव जलाभिषेक के लिए सबसे शुभ और सटीक मुहूर्त
सावन शिवरात्रि पर कावड़ जल अर्पित करने के लिए शास्त्रों में कुछ विशेष समय और चौघड़िया मुहूर्त बताए गए हैं, जिनमें पूजा-अर्चना करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। वैसे तो भगवान शिव भाव के भूखे हैं और वे सदैव अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं, लेकिन यदि शास्त्र सम्मत शुभ मुहूर्त में जलाभिषेक किया जाए तो उसका फल कई गुना बढ़ जाता है।
प्रातः काल का ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 04:15 बजे से 05:05 बजे तक) साधना और जलाभिषेक के लिए सर्वोत्कृष्ट माना गया है। इस समय वातावरण में सात्विक ऊर्जा का संचार होता है। इसके बाद, सुबह के समय अमृत और शुभ का चौघड़िया मुहूर्त (प्रातः 06:00 बजे से 09:30 बजे तक) कावड़ जल चढ़ाने के लिए बेहद उत्तम है। जो कांवड़िए या श्रद्धालु दोपहर में मंदिर पहुंच रहे हैं, वे मध्याह्न काल के अभिजीत मुहूर्त (दोपहर 12:00 बजे से 12:55 बजे तक) में जल अर्पित कर सकते हैं।
संध्या काल में प्रदोष काल के दौरान पूजा का विशेष महत्व होता है। शाम 06:45 बजे से रात 08:15 बजे तक का समय प्रदोष काल का होता है, जब भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में होते हैं। इसके अतिरिक्त, सावन शिवरात्रि की मुख्य पूजा मध्यरात्रि में निशिता काल में की जाती है। निशिता काल का समय मध्यरात्रि 12:05 बजे से 12:48 बजे तक रहेगा। इस दौरान जलाभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से असाध्य रोगों और कष्टों से मुक्ति मिलती है।
जलाभिषेक की सही विधि, नियम और किन बातों का रखें विशेष ध्यान
सावन शिवरात्रि के दिन जलाभिषेक करते समय श्रद्धालुओं को शास्त्रों में बताए गए कुछ बुनियादी नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए, ताकि पूजा का संपूर्ण लाभ प्राप्त हो सके:
दिशा का चयन: शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय हमेशा उत्तर दिशा की ओर मुख करके खड़े हों या बैठें। उत्तर दिशा को भगवान शिव और माता पार्वती का निवास स्थान (कैलाश पर्वत) माना जाता है। पूर्व दिशा की ओर मुख करके जल चढ़ाने से बचना चाहिए।
पात्र का चुनाव: तांबे, पीतल या चांदी के बर्तन से जलाभिषेक करना अत्यंत शुभ माना जाता है। तांबे के पात्र में कभी भी दूध नहीं डालना चाहिए, तांबे के बर्तन से केवल शुद्ध जल या गंगाजल ही अर्पित करें। दूध चढ़ाने के लिए पीतल या चांदी के पात्र का प्रयोग करें।
जल अर्पित करने की शैली: जल चढ़ाते समय जल की धारा पतली और निरंतर होनी चाहिए। बहुत तेजी से या एक साथ जल न उंडेलें। जल अर्पित करते समय ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का शांत चित्त से निरंतर जाप करते रहें।
पूजन सामग्री का क्रम: सबसे पहले शुद्ध जल या गंगाजल से जलाभिषेक करें। इसके बाद पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान कराएं और पुन: शुद्ध जल अर्पित करें। इसके पश्चात बाबा को भस्म, चंदन, अक्षत (अखंडित चावल), त्रिदल बेलपत्र (जिसका चिकना भाग शिवलिंग को स्पर्श करे), धतूरा, भांग, शमी के पत्ते और आक के फूल अर्पित करें।
अवंतिका से लेकर काशी तक शिवालयों में उमड़ेगी अपार जनमेदिनी
सावन शिवरात्रि के अवसर पर उज्जैन के विश्वप्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकालेश्वर, काशी विश्वनाथ, केदारनाथ, सोमनाथ और देवघर के वैद्यनाथ धाम सहित देश के कोने-कोने में स्थित छोटे-बड़े शिवालयों में भव्य तैयारियां की गई हैं। मध्य रात्रि से ही मंदिरों के कपाट खुल जाएंगे और बाबा की भस्म आरती व विशेष श्रृंगार किया जाएगा। पुलिस प्रशासन और स्थानीय नगर निगम द्वारा श्रद्धालुओं की सुरक्षा, पेयजल, छाया और कतारबद्ध दर्शन हेतु विशेष इंतजाम किए गए हैं। धार्मिक विद्वानों का मानना है कि सावन शिवरात्रि पर यदि कोई निष्काम भाव से केवल एक लोटा शुद्ध जल और एक बेलपत्र भी महादेव को समर्पित कर देता है, तो भगवान भोलेनाथ उसके जीवन के समस्त संकटों को हर लेते हैं और उसे सुख, समृद्धि तथा शांति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
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