सावन के दूसरे सोमवार पर उज्जैन में बाबा महाकाल का अलौकिक श्रृंगार, दूल्हे के रूप में दर्शन देकर भक्तों को किया निहाल; जानें तड़के भस्म आरती से लेकर शाही नगर भ्रमण की पूरी गाथा

मध्य प्रदेश की धार्मिक एवं सांस्कृतिक राजधानी उज्जैन में स्थित विश्वप्रसिद्ध बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक भगवान महाकालेश्वर के दरबार में सावन मास के दूसरे सोमवार को भक्ति, श्रद्धा और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला। तड़के से ही संपूर्ण अवंतिका नगरी ‘जय महाकाल’, ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के गूंजते जयघोषों से शिवमय हो गई। सावन के इस पावन अवसर पर देवाधिदेव महादेव का ऐसा अलौकिक और मनमोहक स्वरूप प्रकट हुआ, जिसे निहारकर देश-विदेश से पहुंचे लाखों श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। सनातन धर्म में सावन का महीना भगवान शिव की विशेष आराधना के लिए समर्पित माना जाता है, और जब इस महीने में सोमवार का योग बनता है, तो महाकालेश्वर मंदिर की छटा देखने लायक होती है। मध्यरात्रि के बाद से ही श्रद्धालुओं की कई किलोमीटर लंबी कतारें मंदिर परिसर के बाहर लग चुकी थीं। हर कोई अपने आराध्य महाकाल के इस विशेष रूप के दर्शन करने के लिए आतुर दिखाई दे रहा था। स्थानीय प्रशासन और पुलिस बल द्वारा सुगम दर्शन व्यवस्था हेतु व्यापक इंतजाम किए गए थे, जिससे श्रद्धालुओं को बिना किसी बाधा के बाबा के दिव्य रूप के दर्शन हो सके।

भस्म आरती में भांग, चंदन और सूखे मेवों से सजा बाबा का दिव्य दूल्हा रूप

सावन के दूसरे सोमवार की दिव्य शुरुआत तड़के ढाई बजे मंदिर के कपाट खुलने के साथ हुई। सबसे पहले भगवान महाकाल को पंचामृत से स्नान कराया गया, जिसमें शुद्ध दूध, दही, देसी घी, शहद और शक्कर का उपयोग किया गया। इसके उपरांत देश की पवित्र नदियों के जल से बाबा का महा-अभिषेक संपन्न हुआ। जलाभिषेक के तुरंत बाद पुजारियों द्वारा वह क्षण निर्मित किया गया, जिसकी प्रतीक्षा हर शिव भक्त वर्षभर करता है। पुजारियों और भूदेवों ने मिलकर बाबा महाकाल का एक अत्यंत भव्य दूल्हे के रूप में श्रृंगार किया। विशेष रूप से तैयार की गई भांग, शीतल चंदन, केसर, अष्टगंध, गुलाल और काजू, बादाम, पिस्ता जैसे सूखे मेवों के अद्भुत संयोजन से बाबा के मुखारविंद पर एक तेजस्वी राजा और दूल्हे जैसा भाव उकेरा गया। बाबा के शीश पर सुंदर मुकुट, गले में सुगंधित ताजे पुष्पों की विशाल मालाएं और जरीदार दिव्य वस्त्र धारण कराए गए। इसके पश्चात महानिर्वाणी अखाड़े के प्रतिनिधियों द्वारा पारंपारिक रीति-रिवाज से भस्म आरती की गई। ताजी भस्म जैसे ही बाबा के दूल्हा स्वरूप पर अर्पित हुई, पूरा गर्भगृह एक अलौकिक ऊर्जा और अलौकिक प्रकाश से जगमगा उठा।

वेद मंत्रों की गूंज से गुंजायमान हुआ मंदिर परिसर, श्रद्धालुओं का लगा तांता

भस्म आरती के उपरांत सुबह से ही सामान्य एवं विशिष्ट श्रद्धालुओं के लिए बाबा महाकाल के दर्शन का सिलसिला अनवरत रूप से आरंभ हो गया। उज्जैन के प्रकांड विद्वानों द्वारा गर्भगृह और नंदी मंडपम में सतत वेद मंत्रों एवं शिव तांडव स्तोत्र का सस्वर पाठ किया जा रहा था। मंदिर परिसर में शंखध्वनि, विशाल डमरुओं की गड़गड़ाहट और झालर-मंजीरों की गूंज से संपूर्ण वातावरण में सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाहित हो रही थी। दूर-दराज़ के राज्यों से आए श्रद्धालुओं ने कतारबद्ध होकर अनुशासित तरीके से बाबा के दर्शन किए और अपने परिवार की सुख-समृद्धि एवं शांति की कामना की। भीषण जनसमूह को ध्यान में रखते हुए मंदिर समिति द्वारा जगह-जगह एलईडी स्क्रीन, छाया की व्यवस्था और शीतल पेयजल के इंतजाम किए गए थे। नव-निर्मित ‘श्री महाकाल लोक’ गलियारे ने श्रद्धालुओं के दर्शन अनुभव को और अधिक सुलभ और भव्य बना दिया। श्रद्धालुओं ने बाबा के दर्शनों के साथ-साथ महाकाल लोक में स्थापित भगवान शिव की विभिन्न लीलाओं को दर्शाती कलात्मक मूर्तियों और भित्तिचित्रों का भी अवलोकन किया।

शाही ठाठ-बाठ से निकली बाबा महाकाल की दूसरी सवारी, प्रजा का हाल जानने निकले चंद्रमौलेश्वर

सावन के प्रत्येक सोमवार की परंपरा का निर्वहन करते हुए संध्या काल में भगवान महाकाल की भव्य और पारंपरिक सवारी निकाली गई। मान्यता है कि सावन के सोमवार पर बाबा महाकाल अपनी प्रजा का कुशलक्षेम जानने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं। मुख्य मंदिर परिसर के सभा मंडप में सर्वप्रथम बाबा की पालकी का विधि-विधान और शासकीय परंपराओं के अनुसार पूजन-अर्चन किया गया। इसके बाद सशस्त्र पुलिस बल द्वारा पालकी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और पुलिस बैंड की मधुर धुनों के साथ सवारी मुख्य द्वार से बाहर आई। जैसे ही बाबा महाकाल चंद्रमौलेश्वर रूप में पालकी में विराजमान होकर बाहर निकले, समूची महाकाल नगरी जयकारों से गूंज उठी। यह भव्य सवारी अपने तय पारंपरिक मार्गों से होती हुई पवित्र शिप्रा नदी के तट यानी ऐतिहासिक रामघाट पहुंची। रामघाट पर शिप्रा नदी के पावन जल से बाबा का अभिषेक किया गया और महाआरती उतारी गई। सवारी के पूरे मार्ग में मार्ग के दोनों ओर, छतों और बालकोनियों में खड़े श्रद्धालुओं ने पालकी पर लगातार पुष्प वर्षा की। जगह-जगह रंग-बिरंगी आतिशबाजी और ढोल-नगाड़ों के साथ सवारी का अभूतपूर्व स्वागत किया गया।

उज्जैन की भौगोलिक महत्ता और सावन में महाकाल दर्शन का आध्यात्मिक रहस्य

भौगोलिक और खगोलीय दृष्टि से मध्य प्रदेश के मालवा अंचल में स्थित उज्जैन (प्राचीन अवंतिका नगरी) सनातन संस्कृति की सात मोक्षदायिनी पुरियों में अग्रगण्य है। शिप्रा नदी के पावन तट पर बसा यह नगर अनादि काल से कालगणना, ज्योतिष और तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र रहा है। संपूर्ण भारतवर्ष में स्थापित बारह ज्योतिर्लिंगों में केवल महाकालेश्वर ही एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो पूर्णतः दक्षिणमुखी है। धार्मिक शास्त्रों और तंत्र ग्रंथों के अनुसार, दक्षिण दिशा के स्वामी यमराज हैं, इसलिए दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग का दर्शन एवं पूजन करने से साधक को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और वह कालचक्र के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। सावन मास में जब संपूर्ण सृष्टि का संचालन भगवान शिव के हाथों में होता है, तब उज्जैन में महाकाल का पूजन करने का फल बहुगुणित हो जाता है। वर्तमान समय में उज्जैन देश के सभी प्रमुख रेल, मार्ग और निकटतम इंदौर स्थित देवी अहिल्याबाई होल्कर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से सुगमता से जुड़ा हुआ है। सावन के दौरान यहाँ उमड़ने वाला विशाल जनसैलाब न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह स्थानीय पर्यटन, व्यापार और अवंतिका की सांस्कृतिक विरासत को भी विश्व स्तर पर एक नई पहचान प्रदान करता है।

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