
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी बवंडर खड़ा हो गया है। नरेंद्र मोदी सरकार के पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता कौशल किशोर के एक रहस्यमयी और तल्ख सोशल मीडिया पोस्ट ने सत्ता के गलियारों से लेकर संगठन के शीर्ष नेतृत्व तक हड़कंप मचा दिया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने बिना किसी का नाम लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि आज मेरे एक मित्र से बात हो रही थी, तो उन्होंने कहा कि गेंद जितनी ऊपर जानी थी चली गई, अब नीचे आ रही है। नीचे आने की स्पीड भी बढ़ती जाती है और गेंद के गिरने की स्पीड को कोई कम नहीं कर सकता है। इस अप्रत्याशित और सांकेतिक बयान के सामने आते ही राजधानी लखनऊ से लेकर दिल्ली के राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई है। राजनीतिक विश्लेषक और पार्टी कार्यकर्ता इस बयान को उत्तर प्रदेश में भाजपा के मौजूदा राजनीतिक ग्राफ और आंतरिक असंतोष से जोड़कर देख रहे हैं।
‘उसूलों से भटका संगठन वहीं पहुंच जाता है’: लगातार दो पोस्ट में छिपे गहरे राजनीतिक संकेत
कौशल किशोर का यह हमला केवल ‘गेंद’ वाले रूपक तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके तुरंत बाद उन्होंने एक और बेहद विचारोत्तेजक और तीखा पोस्ट साझा किया। अपने दूसरे बयान में उन्होंने लिखा कि कोई भी संगठन या आंदोलन जब अपने उसूलों से भटक जाता है, तो वह जहां से अपनी यात्रा शुरू करता है, वहीं वापस आकर खड़ा हो जाता है। इसलिए उसूलों से कभी भटकना नहीं चाहिए। हालांकि, पूर्व मंत्री ने अपने इस बयान में स्पष्ट रूप से किसी दल, सरकार या व्यक्ति विशेष का उल्लेख नहीं किया है, लेकिन उत्तर प्रदेश में आगामी राजनीतिक गतिविधियों और चुनावी माहौल के बीच उनकी यह टिप्पणी सीधे तौर पर भाजपा संगठन और सत्ता तंत्र की मौजूदा कार्यप्रणाली पर गहरा कटाक्ष मानी जा रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यह बयान अनायास नहीं है, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से सुलग रहा असंतोष और उपेक्षा की भावना छिपी हुई है।
लोकसभा चुनाव में पराजय और यूपी भाजपा में दलित प्रतिनिधित्व को लेकर उपजा असंतोष
इस तीखे बयान की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर डालना जरूरी है। कौशल किशोर लखनऊ की मोहनलालगंज लोकसभा सीट से दो बार सांसद रहे और केंद्र सरकार में आवास एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आरके चौधरी के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा था। चुनाव नतीजों के बाद से ही उत्तर प्रदेश में पार्टी संगठन, सरकार के रवैये और कार्यकर्ताओं की अनदेखी को लेकर अंदरखाने लगातार सवाल उठते रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि केंद्र में दोबारा मंत्री पद न मिलने और संगठन में अपेक्षित तवज्जो न दिए जाने के कारण पूर्व मंत्री का दर्द अब सार्वजनिक मंचों पर छलक रहा है। कौशल किशोर का यह कहना कि ‘संगठन उसूलों से भटक रहा है’, पार्टी के भीतर कैडर की अनदेखी और केवल सत्ता-केंद्रित राजनीति पर एक गंभीर आत्ममंथन की मांग करता दिख रहा है।
अवध क्षेत्र और पासी समाज के कद्दावर चेहरे हैं कौशल किशोर: बयान की अनदेखी करना मुश्किल
कौशल किशोर कोई साधारण नेता नहीं हैं, बल्कि वे उत्तर प्रदेश, विशेषकर अवध क्षेत्र में दलितों के सबसे प्रभावशाली पासी समाज के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। वे ‘पारक महासंघ’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और दशकों से सामाजिक आंदोलनों व नशामुक्ति अभियानों के जरिए जमीनी स्तर पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं। इसके साथ ही उनकी पत्नी जय देवी लखनऊ की मलिहाबाद विधानसभा सीट से भाजपा की मौजूदा विधायक हैं। जब पार्टी का इतना वरिष्ठ और जनाधार वाला दलित नेता सार्वजनिक मंच पर संगठन के पतन और गति की दिशा उलटने की चेतावनी देता है, तो इसे सामान्य बयान मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को अपने पाले में बनाए रखने की भाजपा की रणनीति के बीच इस तरह की बयानबाजी पार्टी के भीतर सामाजिक समीकरणों और प्रतिनिधित्व को लेकर उठ रहे अंदरूनी सवालों को और गहरा कर देती है।
विपक्ष को मिला बड़ा सियासी हथियार: सपा और कांग्रेस ने भाजपा पर साधा जोरदार निशाना
पूर्व केंद्रीय मंत्री के इस पोस्ट के बाद विपक्षी दलों ने भाजपा को चौतरफा घेरना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने कौशल किशोर के बयानों को री-ट्वीट करते हुए भाजपा की कार्यसंस्कृति और उसके गिरते जनाधार पर करारा हमला बोला है। विपक्ष का कहना है कि जो बात विपक्षी दल लंबे समय से कह रहे थे, आज वही कड़वा सच भाजपा के अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री स्वीकार कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा का अहंकार और जनविरोधी नीतियां अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी हैं, जहां से पार्टी का नीचे गिरना तय है और अब उनके अपने नेता भी मान रहे हैं कि इस पतन की गति को कोई रोक नहीं सकता। वहीं, कांग्रेस ने कहा कि भाजपा में दलित और वंचित समाज के नेताओं को केवल दिखावे के लिए इस्तेमाल किया जाता है और समय आने पर हाशिए पर धकेल दिया जाता है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए आत्ममंथन या नए विद्रोह की शुरुआत?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा के लिए यह स्थिति किसी बड़ी असहजता से कम नहीं है। पहले से ही सरकार और संगठन के बीच समन्वय, नौकरशाही के हावी होने और कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान को लेकर समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में कौशल किशोर का यह खुला संदेश पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा जोरों पर है कि क्या पूर्व मंत्री आने वाले समय में कोई बड़ा राजनीतिक फैसला ले सकते हैं या फिर यह केवल पार्टी आलाकमान पर दबाव बनाने की सुनियोजित रणनीति है। फिलहाल भाजपा के प्रदेश या केंद्रीय संगठन की ओर से इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन अंदरखाने डैमेज कंट्रोल और फीडबैक जुटाने की कवायद तेज हो चुकी है।
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