
सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में शिरोमणि और सर्वाधिक पुण्यदायी माना गया है। वर्ष में आने वाली सभी एकादशियों में सावन और पौष मास की ‘पुत्रदा एकादशी’ का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह व्रत योग्य संतान की प्राप्ति, संतान की दीर्घायु और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। एकादशी का व्रत केवल निराहार रहने का नाम नहीं है, बल्कि इसमें शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। अक्सर व्रतियों के मन में यह संशय रहता है कि क्या एकादशी के दिन किसी दूसरे या पराए घर का जल या भोजन ग्रहण किया जा सकता है।
शास्त्रों और पद्म पुराण में एकादशी व्रत के नियमों का अत्यंत सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है। मान्यता है कि नियमों की थोड़ी सी भी अनदेखी से एकादशी व्रत का पूर्ण आध्यात्मिक फल नष्ट हो सकता है।
पुत्रदा एकादशी पर क्या पराए घर का पानी पीना चाहिए?
धार्मिक ग्रंथों और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत के दिन किसी भी अन्य या पराए घर का अन्न, फलाहार अथवा जल (पानी) ग्रहण करने से पूरी तरह बचना चाहिए।
शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के घर का अन्न या जल ग्रहण करता है, तो उसके साथ उस घर के आचरण, विचार और कर्मों की ऊर्जा (संस्कार) भी ग्रहणकर्ता के भीतर प्रवेश कर जाती है। एकादशी के दिन व्रती का शरीर और मन पूर्णतः सात्विक व शुद्ध होना चाहिए। यदि व्रत के दौरान पराए घर का पानी या भोजन ग्रहण किया जाता है, तो इससे व्रत की पवित्रता भंग होने और संचित पुण्यों का क्षय होने की आशंका रहती है।
अतः यदि बहुत अधिक आवश्यकता या आपात स्थिति न हो, तो एकादशी के दिन केवल अपने घर का ही जल या फलाहार ग्रहण करना श्रेष्ठ माना गया है।
एकादशी व्रत से जुड़े अन्य प्रमुख एवं अनिवार्य नियम
पुत्रदा एकादशी का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए व्रती को इन खास नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए:
-
चावल और अन्न का पूर्ण त्याग: एकादशी के दिन चावल खाना शास्त्रों में महापाप के समान माना गया है। इस दिन घर में किसी भी सदस्य के लिए चावल नहीं पकाया जाना चाहिए।
-
दशमी तिथि से संयम: एकादशी व्रत के नियम दशमी तिथि की शाम से ही लागू हो जाते हैं। दशमी की रात को सात्विक और हल्का भोजन करना चाहिए तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
-
तुलसी दल तोड़ने की मनाही: एकादशी के दिन भगवान विष्णु को अर्पित करने के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले (दशमी) ही तोड़कर रख लेने चाहिए। एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को छूना या पत्ते तोड़ना वर्जित माना गया है।
-
क्रोध, झूठ और कलह से दूरी: व्रत के दौरान किसी की बुराई (निंदा), चुगली, झूठ बोलने या क्रोध करने से बचना चाहिए। मन में निरंतर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का मानसिक जप करते रहना चाहिए।
-
झाड़ू लगाने में सावधानी: कई धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन घर में इस तरह झाड़ू या सफाई नहीं करनी चाहिए जिससे अनजाने में सूक्ष्म जीवों की हत्या हो जाए।
-
दातून और बाल कटवाना वर्जित: एकादशी के दिन पेड़-पौधों की टहनियां तोड़कर दातून करना, बाल कटवाना या नाखून काटना पूरी तरह निषेध माना जाता है।
द्वादशी को पारण का सही तरीका
एकादशी व्रत का संपूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण (व्रत खोलना) अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के सूर्योदय के बाद और हरि वासर समाप्त होने पर शुभ मुहूर्त में किया जाए। पारण से पूर्व किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को सीधा (कच्चा अन्न), वस्त्र और दक्षिणा अर्पित करनी चाहिए, तत्पश्चात स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत खोलना चाहिए।
The News 11 – Hindustan Newspaper, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया