हिंदू धर्मग्रंथों में अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) की एकादशी को बेहद दुर्लभ और चमत्कारी माना गया है। पद्मपुराण में अधिकमास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को ‘परमा एकादशी’, ‘कामदा एकादशी’ और ‘कमला एकादशी’ जैसे पवित्र नामों से पुकारा गया है। यह व्रत हर तीन साल में सिर्फ एक बार आता है, इसलिए इसका महत्व आम एकादशियों से कहीं अधिक है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा बताते हुए कहा था कि जो भी मनुष्य कलयुग में इस व्रत को विधि-विधान से करता है, उसके समस्त पापों का नाश होता है और वह साक्षात विष्णुरूप होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। आइए जानते हैं इस व्रत की दो सबसे पौराणिक और प्रामाणिक कथाएं, जिन्होंने राजाओं से लेकर देवताओं तक का भाग्य बदल दिया।
सुमेधा और पवित्रा की कथा: कौण्डिन्य ऋषि ने दूर की थी घोर दरिद्रता
प्राचीन काल में काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम के एक अत्यंत परमार्थी ब्राह्मण अपनी पत्नी पवित्रा के साथ रहते थे। पवित्रा नाम के अनुरूप ही बेहद सती और धार्मिक महिला थीं। दोनों ब्राह्मण दंपति स्वभाव से बेहद दयालु थे और खुद भूखे रहकर भी द्वार पर आए अतिथि की सेवा करते थे। लेकिन घोर दरिद्रता के कारण उनका जीवन कष्टों से भरा था।
एक दिन अपनी गरीबी से तंग आकर सुमेधा ने अपनी पत्नी से धन कमाने के लिए परदेश जाने की इच्छा जताई। तब उनकी पत्नी पवित्रा ने बड़े प्रेम से कहा, “स्वामी! पूर्व जन्म के कर्मों के कारण ही हमें इस जन्म में यह दरिद्रता मिली है। परदेश जाने से भाग्य नहीं बदलेगा, बल्कि यहीं रहकर धर्म-कर्म करने से स्थितियां सुधरेंगी।” पत्नी की बात मानकर सुमेधा वहीं रुक गए।
कुछ समय बाद उनके भाग्य से उनके आश्रम में महान कौण्डिन्य ऋषि का आगमन हुआ। ब्राह्मण दंपति ने ऋषिवर की भाव से सेवा की और हाथ जोड़कर अपनी गरीबी का कारण और उससे मुक्ति का उपाय पूछा। तब कौण्डिन्य ऋषि ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे सुमेधा! तुम दोनों अधिकमास के शुक्ल पक्ष में आने वाली ‘परमा एकादशी’ का व्रत करो। इस दिन भगवान विष्णु (श्री पुरुषोत्तम) की पूजा, दीपदान और रात्रि जागरण करने से साक्षात लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं और जीवन की भयानक से भयानक दरिद्रता भी कपूर की तरह उड़ जाती है।” ऋषि के कहे अनुसार सुमेधा और पवित्रा ने पूरी निष्ठा के साथ इस व्रत को किया। व्रत पूरा होते ही भगवान विष्णु की कृपा से उनके घर में धन-धान्य के भंडार भर गए और वे अंत में विष्णुलोक को सिधारे।
महादेव की सलाह पर कुबेर देव ने रखा था यह व्रत, ऐसे बने ‘धनपति’
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं के कोषाध्यक्ष यक्षराज कुबेर हमेशा से इतने धनवान और वैभवशाली नहीं थे। एक समय ऐसा था जब कुबेर भी भारी आर्थिक संकट और कंगाली के दौर से गुजर रहे थे। वे भगवान भोलेनाथ के अनन्य भक्त थे। अपनी दयनीय स्थिति से परेशान होकर उन्होंने महादेव से अपनी गरीबी दूर करने की गुहार लगाई।
तब दयालु शिवजी ने कुबेर को सांत्वना देते हुए कहा, “हे कुबेर! तुम अधिकमास की इस पावन एकादशी का व्रत करो।” महादेव ने कुबेर को एकादशी से लेकर अमावस्या तक पूरे पांच दिनों का विशेष उपवास और श्रीहरि विष्णु की आराधना करने की सलाह दी। कुबेर देव ने बिना किसी संशय के पूरी श्रद्धा और कठोर नियमों का पालन करते हुए यह व्रत किया। उनकी इस अटूट निष्ठा और तपस्या से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हुए। महादेव की कृपा और इस व्रत के पुण्य प्रभाव से कुबेर देव को अथाह संपत्ति मिली और उन्हें देवताओं का ‘धनाध्यक्ष’ (धन का स्वामी) बना दिया गया।
एकादशी व्रत के दौरान क्या करें और किन चीजों से दूरी बनाएं?
पद्मपुराण के अनुसार, परमा एकादशी के व्रत का पुण्य फल तभी मिलता है जब साधक दशमी, एकादशी और द्वादशी के नियमों का कड़ाई से पालन करे:
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दशमी के नियम (व्रत से एक दिन पहले): इस दिन कांसे के बर्तन में भोजन न करें। उड़द, मसूर, चना, कोदो, साग, शहद और दूसरे का अन्न खाने से बचें। दिन में केवल एक बार ही भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
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एकादशी के नियम (व्रत वाले दिन): इस दिन पूरी तरह निराहार या फलाहार रहें। जुआ खेलना, दिन में सोना, पान खाना, दातून करना, परनिंदा (चुगली), चोरी, हिंसा, क्रोध और झूठ बोलने जैसी 11 बुराइयों से पूरी तरह दूर रहें। रात में सोएं नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के भजनों के साथ जागरण करें।
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द्वादशी के नियम (पारण वाले दिन): व्रत खोलने के दिन भी कांसे के बर्तन, तेल, मसूर की दाल, व्यायाम, परदेश यात्रा और दो बार भोजन करने से बचना चाहिए।
शास्त्रों में वर्णित है कि जो मनुष्य इस परम कल्याणकारी कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे कई हजार गोदान (गायों के दान) के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
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