नई दिल्ली/मुंबई। पश्चिम एशिया (मिडल-ईस्ट) में अमेरिका और ईरान के बीच गहराते महायुद्ध का सबसे सीधा और बड़ा झटका अब आम हवाई यात्रियों के साथ-साथ भारतीय एयरलाइंस कंपनियों को लगा है। अंतरराष्ट्रीय विमानन रेगुलेटर्स और यूरोपीय संघ विमानन सुरक्षा एजेंसी (EASA) द्वारा ईरान और इराक के एयरस्पेस (आसमान) को कमर्शियल उड़ानों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित किए जाने के बाद भारत से यूरोप, ब्रिटेन और उत्तरी अमेरिका जाने वाले सबसे छोटे और सीधे रूट बंद हो गए हैं। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय हवाई सफर न सिर्फ महंगा हो गया है, बल्कि यात्रा का समय भी काफी बढ़ गया है।
इन 2 लंबे रास्तों से चक्कर काटने को मजबूर हैं विमान
युद्ध क्षेत्र के आसमान से बचने के लिए अब एयरलाइंस कंपनियों के पास केवल दो ही सुरक्षित विकल्प बचे हैं, जो सफर की दूरी को बहुत ज्यादा बढ़ा देते हैं:
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उत्तरी रूट: यूक्रेन के बंद आसमान के ठीक नीचे से होते हुए मध्य एशिया और काकेशस के रास्ते उत्तर की ओर से उड़ान भरना।
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दक्षिणी रूट: अरब सागर, ओमान, सऊदी अरब और मिस्र के ऊपर से लंबा चक्कर लगाकर यूरोप की तरफ जाना।
पूरी दुनिया की फ्लाइट्स अब इन्हीं चुनिंदा सुरक्षित हवाई पट्टियों से गुजर रही हैं, जिससे इन रास्तों पर भारी ‘हवाई ट्रैफिक’ जाम होने लगा है। एयर इंडिया जैसी भारतीय कंपनियों की दिल्ली और मुंबई से लंदन, फ्रैंकफर्ट और पेरिस जाने वाली उड़ानों का समय 90 से 120 मिनट (डेढ़ से दो घंटे) तक बढ़ गया है, जिससे कनेक्टिंग फ्लाइट्स का पूरा गणित बिगड़ चुका है।
हर उड़ान में 6,000 गैलन अतिरिक्त ईंधन का खर्च, भारी घाटे में कंपनियां
हवाई रास्तों के लंबे होने से विमानन कंपनियों पर चौतरफा वित्तीय मार पड़ रही है:
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ईंधन की एक्स्ट्रा खपत: किसी भी एयरलाइंस के कुल ऑपरेटिंग खर्च का करीब 40 फीसदी हिस्सा जेट फ्यूल (ATF) पर खर्च होता है। रूट बदलने से हर एक बड़ी फ्लाइट में लगभग 5,000 से 6,000 गैलन अतिरिक्त ईंधन फुंक रहा है, जिससे एक-एक फेरे पर कंपनियों का खर्च हजारों डॉलर बढ़ गया है।
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वॉर-रिस्क इंश्योरेंस का झटका: तनावग्रस्त इलाकों के पास से गुजरने वाली उड़ानों के लिए अनिवार्य ‘वॉर-रिस्क इंश्योरेंस’ (युद्ध जोखिम बीमा) का प्रीमियम आसमान छूने लगा है, जिसने एयरलाइंस का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है।
यात्रियों की जेब होगी और ढीली: उड़ानों में कटौती और शेड्यूल फेल
बढ़े हुए खर्च और ईंधन संकट से निपटने के लिए भारतीय विमानन कंपनियों ने अपने किराए और नेटवर्क में बड़े बदलाव किए हैं, जिसका सीधा खामियाजा मुसाफिरों को भुगतना पड़ रहा है:
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30% तक बढ़े टिकट के दाम: भारत और यूरोप के बीच हवाई टिकटों की कीमतें 5 से लेकर 30 फीसदी तक महंगी हो चुकी हैं।
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उड़ानों में भारी कटौती: संसाधनों को मैनेज करने के लिए एयरलाइंस ने चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय रूटों पर अपनी उड़ानों की संख्या (फ्रीक्वेंसी) कम कर दी है।
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लंबे ले-ओवर और देरी: उड़ानों का समय बढ़ने के कारण एयरपोर्ट पर लंबी देरी और कनेक्टिंग फ्लाइट छूटने जैसी समस्याओं से यात्रियों को जूझना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा से जुड़े ये कड़े नियम फिलहाल लंबे समय तक लागू रहने वाले हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सफर करने वाले मुसाफिरों को आने वाले दिनों में महंगे टिकटों और लंबे थकाऊ सफर के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा।
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