हल्द्वानी में खरगे के मंच के ‘शुद्धिकरण’ पर भड़कीं मायावती, सामंती सोच वालों को तुरंत जेल भेजने की मांग; आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान पर भी बोला तीखा हमला

उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद कार्यक्रम स्थल और मंच के कथित ‘शुद्धिकरण’ का मामला अब एक बड़े राष्ट्रीय सियासी विवाद में तब्दील हो चुका है। संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन उच्च सदन में इस मुद्दे के उठने के बाद देश भर के विपक्षी नेताओं में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के तीखे हमले के बाद अब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने इस घटना पर बेहद सख्त और कड़ा रुख अख्तियार किया है। मायावती ने इसे जातिवादी और सामंती मानसिकता का घिनौना रूप करार देते हुए उत्तराखंड की धामी सरकार से दोषियों के खिलाफ तत्काल कठोर कानूनी धाराओं में मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेजने की मांग की है। इसके साथ ही मायावती ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत को भी सीधे निशाने पर लेते हुए आरक्षण पर उनके हालिया विचारों को जमीनी हकीकत का आईना दिखाया है।

हल्द्वानी का रामलीला मैदान और कथित मंच शुद्धिकरण का पूरा विवाद

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि 8 अगस्त को उत्तराखंड के नैनीताल जिले के हल्द्वानी स्थित ऐतिहासिक रामलीला मैदान में कांग्रेस पार्टी द्वारा आयोजित ‘संविधान और किसान महापंचायत’ से जुड़ी है। इस महारैली को मुख्य वक्ता के तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने संबोधित किया था। खरगे के संबोधन और कार्यक्रम के समापन के कुछ दिनों बाद यह जानकारी सामने आई कि कुछ प्रभुत्ववादी और स्थानीय तत्वों ने उस मंच और मैदान का गंगाजल व धार्मिक अनुष्ठानों के जरिए कथित रूप से ‘शुद्धिकरण’ किया।

यह सूचना जैसे ही सार्वजनिक हुई, राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया। संसद के मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने स्वयं इस अपमानजनक कृत्य को पुरजोर तरीके से उठाया। खरगे ने बेहद भावुक और गंभीर स्वर में सवाल किया कि क्या 21वीं सदी के भारत में किसी व्यक्ति के दलित समाज से होने के कारण उसके सार्वजनिक संबोधन के मंच को अपवित्र मान लिया जाएगा? उन्होंने पूछा कि क्या यही संविधान और लोकतांत्रिक समानता की मर्यादा है? खरगे के इस खुलासे के बाद संसद से लेकर सड़क तक सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाजें तेज हो गईं।

‘जातिवादी और सामंती तत्वों को बिना देरी जेल भेजे सरकार’: मायावती का तीखा आक्रोश

बसपा प्रमुख मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सिलसिलेवार पोस्ट करते हुए इस घटना की कठोर शब्दों में भर्त्सना की। मायावती ने कहा कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के दलित होने की वजह से उनके कार्यक्रम के बाद मंच का शुद्धिकरण किए जाने की जानकारी संसद के जरिए पूरे देश को मिली है, जो अत्यंत निंदनीय, शर्मनाक और गहरी चिंता का विषय है।

मायावती ने उत्तराखंड की भारतीय जनता पार्टी की सरकार को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि शासन-प्रशासन को बिना किसी हीलाहवाली या देरी के इस कृत्य में शामिल जातिवादी और सामंती सोच वाले तत्वों के खिलाफ अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव विरोधी सख्त कानूनों के तहत मुकदमा दर्ज करना चाहिए और उन्हें तुरंत सलाखों के पीछे भेजना चाहिए। मायावती ने कहा कि जब देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और वरिष्ठ सांसद के साथ उनकी जाति के आधार पर ऐसा सार्वजनिक दुर्व्यवहार किया जा सकता है, तो समझा जा सकता है कि दूर-दराज के गांवों और कस्बों में आम दलित और वंचित नागरिकों के साथ किस तरह का अमानवीय भेदभाव होता होगा।

संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी घेरा: आरक्षण पर बहस को दिखाया आईना

मायावती ने अपने बयान में न केवल स्थानीय प्रशासन पर सवाल दागे, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत को भी सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा कर दिया। मायावती ने कहा कि संघ प्रमुख को हल्द्वानी की इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का तुरंत और गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए।

बसपा सुप्रीमो ने संघ प्रमुख पर प्रहार करते हुए कहा कि एक तरफ देश में दलित समाज के शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं के मंच का शुद्धिकरण कर छुआछूत की पराकाष्ठा दिखाई जा रही है, और दूसरी तरफ आरएसएस प्रमुख दलित वर्ग के उन लोगों को आरक्षण के लाभ से वंचित करने या स्वेच्छा से लाभ छोड़ने की नसीहत दे रहे हैं जो आर्थिक रूप से थोड़े मजबूत हुए हैं। मायावती ने साफ शब्दों में रेखांकित किया कि आरक्षण केवल आर्थिक स्थिति सुधारने की कोई सरकारी योजना नहीं है, बल्कि यह सदियों से जातिगत उत्पीड़न और छुआछूत का शिकार रहे बहुजन समाज को बराबरी, सामाजिक आत्मसम्मान और प्रतिनिधित्व दिलाने का संवैधानिक हक है। जब तक समाज के भीतर से यह जातिवादी और छुआछूत वाली सड़ी-गली मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती, तब तक आरक्षण की व्यवस्था पर सवाल उठाना सर्वथा अनुचित और दलित विरोधी मानसिकता का परिचायक है।

अखिलेश यादव का हमला: ‘मंच का नहीं, भाजपा अपने कलुषित मन का करे शुद्धिकरण’

मायावती के बयान से पहले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे पर भाजपा पर तीखा हमला बोला था। अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा के शासनकाल में सामाजिक भेदभाव का यह सबसे निकृष्ट और वीभत्स रूप सामने आया है कि मल्लिकार्जुन खरगे के दलित होने के कारण मंच को गंगाजल से धोया गया।

अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपाइयों और उनके संगी-साथियों को किसी मंच को धोने के बजाय अपने कलुषित और संकीर्ण मन का गंगाजल से शुद्धिकरण करना चाहिए। उन्होंने चेताया कि अब देश का ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समाज पूरी तरह जागरूक हो चुका है और इस तरह के किसी भी सामाजिक दुर्व्यवहार और मानसिक उत्पीड़न को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेगा। वहीं उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने भी इसे संविधान और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों पर सीधा हमला बताते हुए प्रधानमंत्री से देश से माफी मांगने की मांग की।

संसद में उठा मुद्दा और जेपी नड्डा का आश्वासन: कांग्रेस का सत्याग्रह

राज्यसभा के भीतर जब मल्लिकार्जुन खरगे ने इस घटना को उठाया, तो सत्ता पक्ष की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई। सदन के नेता और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने इस कथित घटना पर गहरा खेद व्यक्त किया और इसे अनुचित करार दिया। नड्डा ने सदन को आश्वस्त किया कि वे इस पूरे मामले की तथ्यात्मक जांच करवाएंगे और यदि कोई भी व्यक्ति इस तरह के असंवैधानिक कृत्य में दोषी पाया गया तो उसके खिलाफ उचित कदम उठाए जाएंगे। हालांकि, कांग्रेस पार्टी ने भाजपा के इस आश्वासन को नाकाफी बताते हुए हल्द्वानी और उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में धरना-प्रदर्शन और सत्याग्रह शुरू कर दिया है।

2027 से पहले उत्तर भारत में गर्माया दलित अस्मिता और सामाजिक न्याय का विमर्श

हल्द्वानी की इस घटना और उस पर मायावती, अखिलेश यादव और राहुल गांधी खेमे की तीखी प्रतिक्रियाओं ने उत्तर भारत की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटी बहुजन समाज पार्टी के लिए यह मुद्दा अपने कोर दलित वोटबैंक को फिर से लामबंद करने का एक बड़ा वैचारिक हथियार बन गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती का यह आक्रामक रूप यह साफ संकेत देता है कि बसपा अब भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ किसी भी समझौते के मूड में नहीं है। सामाजिक न्याय, दलित स्वाभिमान और आरक्षण की सुरक्षा के इर्द-गिर्द छिड़ी यह नई सियासी जंग आने वाले दिनों में और अधिक उग्र रूप ले सकती है, जिसमें विपक्षी दल भाजपा को रक्षात्मक मुद्रा में लाने के लिए इस घटना को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की पूरी तैयारी में हैं।

Check Also

‘सत्ता की भूख में कांग्रेस ने देश के टुकड़े किए और लाखों निर्दोषों को मौत के मुंह में धकेला’, विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर सीएम योगी आदित्यनाथ का तीखा हमला

14 अगस्त 1947 की वह काली तारीख भारतीय इतिहास के सीने पर दर्ज एक ऐसा …