दिल्ली पुलिस और प्रशासन ने तय की नई जगह, अब रामलीला मैदान में ही मिल सकेगी धरने की इजाजत; जानिए क्या हैं नए नियम

देश की लोकतांत्रिक आवाज और जन-आंदोलनों का ऐतिहासिक केंद्र रहे नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों को लेकर दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने बेहद सख्त दिशा-निर्देश लागू कर दिए हैं। राजधानी के सबसे संवेदनशील लुटियंस जोन (Lutyens’ Delhi) में स्थित जंतर-मंतर पर बार-बार लगने वाले लंबे जाम, अति-विशिष्ट (VVIP) मार्गों की सुरक्षा व्यवस्था, ध्वनि प्रदूषण और स्थानीय निवासियों की परेशानियों को देखते हुए बड़े जमावड़ों, अनिश्चितकालीन धरनों और रैलियों पर प्रभावी रूप से रोक लगाने का फैसला किया गया है। प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि अब बड़ी संख्या में जुटने वाले प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक दलों, किसान यूनियनों और सामाजिक संगठनों को अपनी बात रखने के लिए मध्य दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान (Ramlila Maidan) का रुख करना होगा। इस कदम के बाद दिल्ली के सियासी और सामाजिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है।

जंतर-मंतर संसद भवन, केंद्रीय सचिवालय, राष्ट्रपति भवन और कनॉट प्लेस जैसे व्यस्ततम व्यापारिक व प्रशासनिक केंद्रों के बिल्कुल करीब स्थित है। इस जगह पर प्रदर्शनों को सीमित करने के पीछे कई ठोस प्रशासनिक और सुरक्षा कारण बताए गए हैं:

  • भीषण ट्रैफिक जाम और जनजीवन प्रभावित: संसद सत्र के दौरान या बड़े राजनीतिक आयोजनों पर जब हजारों लोग जंतर-मंतर पहुंचते हैं, तो संसद मार्ग, अशोक रोड, जनपथ, बाराखंभा रोड और टॉल्स्टॉय मार्ग पूरी तरह ठप हो जाते हैं। इससे आपातकालीन एम्बुलेंस सेवाओं, दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों और आम यात्रियों को घंटों जूझना पड़ता है।

  • ध्वनि प्रदूषण और स्थानीय निवासियों की शिकायतें: जंतर-मंतर के आसपास कई रिहायशी कॉलोनियां, सरकारी आवास और व्यापारिक प्रतिष्ठान हैं। दिन-रात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल से उच्चतम न्यायालय और एनजीटी (NGT) के ध्वनि प्रदूषण मानकों का खुला उल्लंघन होता रहा है।

  • संसद भवन व केंद्रीय कार्यालयों की सुरक्षा: नई संसद भवन और आसपास के क्षेत्रों की त्रि-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर सुरक्षा एजेंसियों ने सिफारिश की थी कि संसद के 1 से 2 किलोमीटर के दायरे में किसी भी अनियंत्रित भीड़ को लंबे समय तक बैठने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

  • अनुमति की शर्तों का उल्लंघन: कई संगठन केवल 100 से 200 लोगों की सांकेतिक अनुमति लेकर आते थे, लेकिन मौके पर हजारों की भीड़ जुटाकर बैरिकेड तोड़ने और संसद कूच करने की कोशिश करते थे, जिससे कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति पैदा हो जाती थी।

प्रशासन द्वारा तय की गई नई व्यवस्था के अनुसार, दिल्ली में धरना-प्रदर्शनों का ढांचा इस प्रकार निर्धारित किया गया है:

  1. रामलीला मैदान (मुख्य प्रदर्शन स्थल): किसी भी बड़े आंदोलन, रैली, विशाल सभा या एक हजार से अधिक लोगों के जमावड़े के लिए केवल रामलीला मैदान को ही अधिकृत स्थल बनाया गया है। यहां पर्याप्त जगह, सुरक्षित बैरिकेडिंग, पार्किंग और बड़ी भीड़ को नियंत्रित करने की व्यवस्था है।

  2. जंतर-मंतर पर केवल सीमित व सांकेतिक अनुमति: जंतर-मंतर को पूरी तरह बंद करने के बजाय वहां केवल छोटे प्रतिनिधिमंडलों (अधिकतम 50 से 100 लोग) को दिन के समय (सुबह 10:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक) सांकेतिक धरने की बहुत सख्त शर्तों के साथ ही अनुमति मिल सकेगी।

  3. रात में रुकने पर पूर्ण प्रतिबंध: जंतर-मंतर पर रात भर तंबू गाड़कर रुकने, खाना बनाने या अनिश्चितकालीन डेरा डालने की अनुमति अब किसी भी सूरत में नहीं दी जाएगी। शाम 5 बजे के बाद स्थल को पूरी तरह खाली कराना अनिवार्य होगा।

प्रशासन के इस कड़े रुख के बाद अब अपनी मांगों को लेकर दिल्ली आने वाले संगठनों को एक नई और सख्त प्रक्रिया से गुजरना होगा:

  • ऑनलाइन पोर्टल और एडवांस परमिशन: अब प्रदर्शनकारियों को कम से कम 10 दिन पहले दिल्ली पुलिस के लाइसेंसिंग विभाग को लिखित या ऑनलाइन आवेदन देना होगा, जिसमें प्रदर्शनकारियों की संभावित संख्या, नेताओं के नाम और समयसीमा का स्पष्ट शपथ-पत्र देना होगा।

  • सुरक्षा अनापत्ति और शर्तों का पालन: आयोजकों को यह हलफनामा देना होगा कि यदि सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुकसान पहुंचता है, तो उसकी वित्तीय भरपाई आयोजकों से की जाएगी।

  • विपक्ष और नागरिक संगठनों की प्रतिक्रिया: कई सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने इस फैसले को लोकतांत्रिक असहमति के अधिकार को दबाने का प्रयास बताया है। उनका तर्क है कि रामलीला मैदान जैसे बंद मैदान में जाने से सत्ता के गलियारों तक सीधे जनता की आवाज नहीं पहुंच पाती। कुछ संगठनों ने इस प्रशासनिक आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी भी शुरू कर दी है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ बनाम भारत संघ मामले में यह स्पष्ट किया था कि नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार अन्य नागरिकों के निर्बाध आवागमन और सार्वजनिक व्यवस्था के अधिकार के साथ संतुलित होना चाहिए। दिल्ली पुलिस के इस नए कदम का उद्देश्य सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच इसी संतुलन को साधना है, हालांकि आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि बड़े आंदोलन इस नई व्यवस्था के तहत किस तरह आगे बढ़ते हैं।

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