पाकिस्तान में महिला टिकटॉकर्स पर जानलेवा पहरे: आजादी, शोहरत और इनकार की कीमत क्या सिर्फ मौत है? जानिए रूढ़िवादिता और हिंसा का पूरा सच

डिजिटल क्रांति ने पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति और आत्मनिर्भरता के नए रास्ते खोले हैं, लेकिन पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर सक्रिय महिलाओं के लिए यह मंच अक्सर जानलेवा साबित हो रहा है। हाल ही में 14 अगस्त को तक्षशिला (Taxila) में 13 लाख फॉलोअर्स वाली 28 वर्षीय लोकप्रिय टिकटॉकर शमसो बीबी उर्फ आयशा गिलामाना की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह कोई अकेली घटना नहीं है; पिछले कुछ ही वर्षों में सना यूसुफ, महक शहजादी, सना जावेद और कंदील बलोच जैसी कई युवा महिला कंटेंट क्रिएटर्स को अपनी जान गंवानी पड़ी है। सोशल मीडिया पर मिली शोहरत, वित्तीय आत्मनिर्भरता और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की चाहत के बदले इन महिलाओं को धमकियां, अश्लील गालियां, ब्लैकमेलिंग और अंततः मौत का सामना करना पड़ रहा है। आखिर पाकिस्तान में महिला टिकटॉकर्स की जिंदगी इतनी असुरक्षित और सस्ती क्यों हो गई है?

पितृसत्तात्मक सोच और ‘झूठी गैरत’ का खूनी साया

पाकिस्तान के पारंपरिक और रूढ़िवादी समाज में महिलाओं को परिवार और कबीले की कथित ‘इज्जत’ (Honor) की धुरी माना जाता है। जब कोई महिला टिकटॉक या इंस्टाग्राम जैसे मंचों पर अपनी मर्जी से वीडियो बनाती है, नाचती है, हंसती है या अपनी राय रखती है, तो पितृसत्तात्मक समाज इसे अपनी झूठी मर्यादा पर सीधा हमला मानता है।

तथाकथित ‘ऑनर किलिंग’ (Honor Killing) के तहत कई युवतियों को उनके अपने ही भाइयों, पिताओं या पतियों द्वारा मार दिया जाता है। 16 वर्षीय महक शहजादी की उसके ही पिता द्वारा हत्या और क्वेटा में 14 वर्षीय हिरा अनवर का मामला इस भयावह मानसिकता के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहां सोशल मीडिया प्रोफाइल को “घरेलू इज्जत के खिलाफ” मानकर अपनों ने ही उनका कत्ल कर दिया।

आर्थिक आत्मनिर्भरता और पुरुष वर्चस्व को चुनौती

टिकटॉक और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने पाकिस्तान के मध्यम और निचले तबके की महिलाओं को एक अभूतपूर्व ताकत दी है—आर्थिक आजादी। ब्रांड प्रमोशन, यूट्यूब चैनल्स और लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए कई साधारण पृष्ठभूमि की लड़कियां लाखों रुपये कमाने लगी हैं।

यह आर्थिक स्वावलंबन समाज में पुरुषों के पारंपरिक नियंत्रण को कमजोर करता है। जब एक महिला अपने परिवार के पुरुष सदस्यों पर वित्तीय रूप से निर्भर नहीं रहती, तो समाज का एक बड़ा वर्ग इसे नियंत्रण खोने के डर के रूप में देखता है। नतीजा यह होता है कि इन क्रिएटर्स को डराने, दबाने और उनके पैसे ऐंठने के लिए जबरन वसूली, ब्लैकमेलिंग और हिंसा का सहारा लिया जाता है।

इनकार बर्दाश्त न कर पाने की सनक और ब्लैकमेलिंग

पाकिस्तानी महिला सोशल मीडिया स्टार्स के खिलाफ हिंसा की एक प्रमुख वजह पुरुषों की ‘ना’ न सुनने की आदत है। 17 वर्षीय इन्फ्लुएंसर सना यूसुफ की हत्या इस्लामाबाद में इसलिए कर दी गई क्योंकि उसने एक युवक के प्रेम प्रस्ताव और दोस्ती को ठुकरा दिया था।

कई मामलों में महिला क्रिएटर्स को फेक वीडियो, लीक किए गए निजी पलों या डीपफेक टेक्नोलॉजी के जरिए ब्लैकमेल किया जाता है। जब महिलाएं इन धमकियों के आगे झुकने से इनकार कर देती हैं या पुलिस में शिकायत दर्ज कराती हैं, तो अपराधी प्रतिशोध में उन पर खुलेआम गोलियां बरसा देते हैं। शमसो बीबी के मामले में भी परिजनों ने पुलिस को दी गई शिकायत में पहले से मिल रही वित्तीय धमकियों का उल्लेख किया है।

विक्टिम शेमिंग: जब समाज हत्यारों के पक्ष में खड़ा दिखता है

पाकिस्तान में महिला इन्फ्लुएंसर्स के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने में सोशल मीडिया पर होने वाली संगठित ट्रोलिंग और मोरल पुलिसिंग की बहुत बड़ी भूमिका है। जब भी किसी महिला टिकटॉकर के साथ दुर्व्यवहार, मॉब लिंचिंग (जैसे लाहौर के ग्रेटर इकबाल पार्क में आयशा अकरम के साथ हुई बर्बरता) या हत्या की घटना होती है, तो इंटरनेट पर अपराधियों की निंदा करने के बजाय पीड़िता के कपड़ों, उसके वीडियो और उसके चरित्र पर उंगलियां उठाई जाने लगती हैं।

“अगर वह पर्दा करती और घर पर रहती तो ऐसा न होता”—जैसी विक्टिम-ब्लेमिंग वाली टिप्पणियां हत्यारों और अपराधियों को एक सामाजिक कवच प्रदान करती हैं। यह जहरीला नैरेटिव अपराधियों के हौसले बुलंद करता है कि वे किसी भी महिला की जान लेकर खुद को धर्म या संस्कृति का रक्षक साबित कर सकते हैं।

कानूनी ढिलाई और साइबर कानूनों की विफलता

पाकिस्तान में ‘प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट’ (PECA) जैसे साइबर कानून कागजों पर तो मौजूद हैं, लेकिन उनकी जमीनी प्रभावशीलता बेहद लचर है। फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) का साइबर क्राइम विंग महिलाओं की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करने में अक्सर विफल रहता है।

जब कोई महिला धमकियों की शिकायत लेकर थाने पहुंचती है, तो उसे अक्सर पुलिस द्वारा ही यह सलाह दी जाती है कि वह सोशल मीडिया छोड़ दे या मामले को आपस में सुलझा ले। न्याय प्रणाली में देरी और गवाहों के मुकर जाने के कारण ऑनर किलिंग के मामलों में दोषियों को कड़ी सजा नहीं मिल पाती। कंदील बलोच के हत्यारे भाई का बरी हो जाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत था कि कानून का खौफ अपराधियों के मन से खत्म हो चुका है।

रूढ़िवादी समाज में महिलाओं के अस्तित्व का संघर्ष

पाकिस्तान में महिला टिकटॉकर्स पर हो रहे हमले केवल कुछ डिजिटल क्रिएटर्स की सुरक्षा का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि यह उस व्यापक सामाजिक संघर्ष का प्रतीक हैं जहां आधुनिकता और स्वतंत्र सोच का टकराव कट्टरपंथी व पितृसत्तात्मक संरचना से हो रहा है। जब तक समाज महिलाओं को स्वतंत्र निर्णय लेने वाले नागरिक के रूप में स्वीकार नहीं करेगा, कानून लागू करने वाली एजेंसियां सख्त नहीं होंगी और सोशल मीडिया पर हिंसा को सामान्य ठहराने वाले जहरीले नैरेटिव पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक पाकिस्तान में कैमरे के सामने मुस्कुराने वाली युवतियों की जान इसी तरह सस्ते दामों पर दांव पर लगती रहेगी।

Check Also

होर्मुज जलडमरूमध्य पर ट्रंप का नया पैंतरा: अमेरिकी क्षेत्र घोषित करने के दावे से भड़का ईरान, क्या सच में बदल गया फारस की खाड़ी का शक्ति संतुलन?

पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संघर्ष अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है जहां …