
अक्सर माता-पिता की यह सबसे बड़ी शिकायत होती है कि उनके बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लगता, वह किताबें देखकर भागता है या फिर एकाग्रता (Focus) नहीं बना पाता। ऐसे में पेरेंट्स आमतौर पर बच्चे को डांटते हैं, सजा देते हैं या फिर बार-बार समझाने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कहीं आपकी ही कोई आदत या व्यवहार तो बच्चे को पढ़ाई से दूर नहीं कर रहा?
बच्चे कोरे कागज की तरह होते हैं, जिन पर घर के माहौल और माता-पिता के व्यवहार का सबसे गहरा असर पड़ता है। कई बार पेरेंट्स अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे बच्चा पढ़ाई को एक मजेदार सीख मानने के बजाय ‘बोझ’ समझने लगता है। आइए जानते हैं पेरेंट्स की उन 5 आदतों के बारे में, जो बच्चों का पढ़ाई से मन हटा देती हैं:
1. सिर्फ नंबरों (Marks) को महत्व देना
कई पेरेंट्स बच्चे के सीखने की प्रक्रिया या उसकी मेहनत से ज्यादा इस बात पर ध्यान देते हैं कि रिपोर्ट कार्ड में नंबर कितने आए हैं।
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नुकसान: मार्क्स कम आने पर बच्चे को डांटना, दूसरों के सामने उसकी कमियां गिनाना या हर वक्त पढ़ाई का मानसिक दबाव बनाना बच्चे में स्ट्रेस (तनाव) पैदा करता है।
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बदलाव: बच्चे के कम नंबर आने पर उसे हतोत्साहित करने के बजाय उसकी कोशिशों की तारीफ करें। जब बच्चा खुद को सुरक्षित और सपोर्टेड महसूस करता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और वह अगली बार बेहतर करने की कोशिश करता है।
2. दूसरों के बच्चों से लगातार तुलना करना (Comparison)
“शर्मा जी के बेटे के नंबर देखो” या “अपनी क्लास के टॉपर से कुछ सीखो”— जैसे वाक्य लगभग हर घर में सुनने को मिल जाते हैं।
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नुकसान: बार-बार किसी और से तुलना किए जाने पर बच्चे के कोमल मन में यह भावना बैठ जाती है कि वह कभी दूसरों जितना अच्छा नहीं बन सकता। इससे उसका सेल्फ-कॉन्फिडेंस पूरी तरह टूट जाता है।
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बदलाव: यह बात स्वीकार करें कि हर बच्चे की मानसिक क्षमता और रुचि अलग होती है। कोई पढ़ाई में अव्वल होता है, तो कोई खेल या आर्ट्स में। बच्चे की तुलना किसी और से करने के बजाय, उसके कल के प्रदर्शन की तुलना उसके आज के प्रदर्शन से करें।
3. घर का अव्यवस्थित रूटीन और खराब दिनचर्या
एक तय रूटीन का न होना बच्चों के मानसिक विकास और उनके फोकस को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
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नुकसान: अगर बच्चे के सोने, जागने, खेलने या स्क्रीन देखने का कोई निश्चित समय नहीं है, तो उसका दिमाग कभी भी एक जगह एकाग्र नहीं हो पाएगा। बिना रूटीन के बच्चे में अनुशासन की कमी हो जाती है।
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बदलाव: बच्चे के लिए एक बैलेंस टाइम-टेबल बनाएं, जिसमें पढ़ाई के साथ-साथ खेलने, रचनात्मक काम करने और पर्याप्त आराम (नींद) के लिए भी बराबर समय तय हो।
4. खुद स्क्रीन में बिजी रहना और बच्चे को पढ़ने के लिए कहना
बच्चे वो नहीं करते जो हम उन्हें ‘कहते’ हैं, बल्कि बच्चे वो सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को ‘करते हुए’ देखते हैं।
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नुकसान: यदि आप खुद हर समय हाथ में मोबाइल लिए सोशल मीडिया स्क्रॉल कर रहे हैं या टीवी देख रहे हैं और उसी वक्त बच्चे को पढ़ने के लिए डांट रहे हैं, तो बच्चा इसे एक सजा के रूप में लेगा। उसके मन में भी स्क्रीन देखने की जिज्ञासा बढ़ेगी।
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बदलाव: घर में पढ़ाई का माहौल तैयार करें। जब बच्चा पढ़ रहा हो, तब आप भी फोन साइड रखकर कोई किताब, अखबार या मैगजीन पढ़ सकते हैं। घर में ‘नो स्क्रीन टाइम’ का नियम बनाएं।
5. बच्चे की हर समस्या या होमवर्क खुद हल कर देना
कुछ पेरेंट्स प्यार और मदद के चक्कर में बच्चे का स्कूल प्रोजेक्ट, होमवर्क खुद पूरा कर देते हैं या उसकी हर छोटी गलती को खुद ही तुरंत ठीक कर देते हैं।
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नुकसान: शुरुआत में यह मदद लग सकती है, लेकिन लंबे समय में यह बच्चे को ‘परनिर्भर’ (दूसरों पर निर्भर) बना देती है। बच्चा खुद से सोचना और कोशिश करना छोड़ देता है, जिससे उसकी प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स खत्म हो जाती हैं।
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बदलाव: बच्चे को गाइड करें, लेकिन उसका काम खुद न करें। उसे अपनी गलतियों से सीखने दें। जब बच्चा खुद मेहनत करके किसी सवाल का जवाब ढूंढेगा, तो उसमें जिम्मेदारी की भावना और खुद पर भरोसा मजबूत होगा।
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