उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘सैफई कुनबा’ हमेशा से ही चर्चाओं के केंद्र में रहा है। मुलायम सिंह यादव की विरासत को लेकर अक्सर चाचा-भतीजे और पिता-पुत्र के बीच तल्खियों की खबरें सुर्खियां बनती रहीं, लेकिन इसी परिवार के भीतर एक ऐसा रिश्ता भी था जिसने राजनीति के शोर में कभी अपनी मर्यादा नहीं खोई। यह रिश्ता था समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और उनके सौतेले भाई प्रतीक यादव का। प्रतीक यादव के आकस्मिक निधन ने उस शख्सियत को एक बार फिर याद दिला दिया है, जिसने सत्ता की चकाचौंध से दूर रहकर हमेशा अपने बड़े भाई के प्रति अटूट सम्मान भाव बनाए रखा।
दो अलग आंगन लेकिन एक पिता का अनुशासन
अखिलेश और प्रतीक के रिश्तों की बुनियाद को समझने के लिए यादव परिवार के उस दौर को देखना होगा जब मुलायम सिंह यादव ने अपनी दूसरी पत्नी साधना गुप्ता और पुत्र प्रतीक को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था। मालती देवी के पुत्र अखिलेश और साधना गुप्ता के पुत्र प्रतीक के बीच उम्र का करीब 15 साल का फासला था। एक सौतेले भाई और नई मां की परिवार में एंट्री किसी भी उत्तराधिकारी के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती थी, लेकिन अखिलेश और प्रतीक ने इस जटिलता को बड़ी ही शालीनता से पार किया।
मिलते ही छूते थे पैर: रिश्तों में कभी नहीं आई राजनीति
पारिवारिक सूत्रों और करीबियों की मानें तो प्रतीक यादव ने हमेशा अखिलेश यादव को पिता तुल्य सम्मान दिया। सार्वजनिक मंच हो या निजी समारोह, प्रतीक जब भी अखिलेश से मिलते, उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेना नहीं भूलते थे। साल 2025 में सैफई में हुए पारिवारिक विवाह के दौरान भी सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हुआ था, जिसमें प्रतीक और उनकी पत्नी अपर्णा यादव, अखिलेश यादव के पैर छूते नजर आए थे। प्रतीक के मन में कभी भी ‘सत्ता का समान अधिकार’ पाने की होड़ नहीं दिखी, जो अक्सर राजनीतिक परिवारों को बिखेर देती है।
सत्ता की गलियों से दूर, फिटनेस और कारों का शौक
प्रतीक यादव की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने कभी खुद को अखिलेश के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश नहीं किया। जहां अखिलेश यादव प्रदेश की राजनीति और मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रहे थे, वहीं प्रतीक ने अपना अलग रास्ता चुना। उन्होंने राजनीति के बजाय रियल एस्टेट और फिटनेस बिजनेस में अपनी पहचान बनाई। महंगी कारों (विशेषकर लेम्बोर्गिनी) और जिम के शौकीन प्रतीक ने कभी भी सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मांगी, जिससे दोनों भाइयों के बीच कभी कड़वाहट पैदा नहीं हुई।
घरेलू कलह में भी निभाया ‘मौन व्रत’
साल 2016-17 का वह दौर जब समाजवादी पार्टी में शिवपाल और अखिलेश के बीच आर-पार की जंग छिड़ी थी, पूरा कुनबा दो धड़ों में बंट गया था। उस नाजुक मोड़ पर प्रतीक यादव चाहते तो अपनी मां साधना गुप्ता के पक्ष में खड़े होकर अखिलेश के खिलाफ मोर्चा खोल सकते थे, लेकिन उन्होंने चुप्पी साधे रखी। उन्होंने न तो मीडिया में कोई बयान दिया और न ही राजनीति में कोई दखलअंदाजी की। उनका यह ‘मौन’ ही अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ा समर्थन साबित हुआ।
अपर्णा की भाजपाई राजनीति और प्रतीक का संतुलन
रिश्तों की असली परीक्षा तब हुई जब प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव ने भाजपा का दामन थाम लिया और अखिलेश की नीतियों पर सवाल उठाए। इसके बावजूद प्रतीक ने अपने भाई के साथ निजी रिश्तों को कभी प्रभावित नहीं होने दिया। हालांकि, जनवरी 2026 में प्रतीक ने एक इमोशनल पोस्ट के जरिए परिवार में आई दरार के लिए अपर्णा को जिम्मेदार ठहराते हुए ‘फैमिली डिस्ट्रॉयर’ तक कह दिया था, जिसे बाद में उन्होंने हटा लिया। यह पोस्ट प्रतीक के उस दर्द को बयां करती थी जो वह परिवार को एकजुट रखने के लिए महसूस कर रहे थे।
अखिलेश और प्रतीक यादव का रिश्ता इस बात का प्रमाण है कि यदि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को परे रख दिया जाए, तो सौतेले रिश्तों में भी सगे भाइयों जैसा मान-सम्मान कायम रह सकता है। प्रतीक का जाना उत्तर प्रदेश की राजनीति और यादव परिवार के लिए एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे कभी नहीं भरा जा सकेगा।
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