महिलाओं में होने वाली एक सबसे आम हार्मोनल समस्या, जिसे अब तक हम PCOS (Polycystic Ovary Syndrome) के नाम से जानते थे, अब एक नई पहचान के साथ सामने आई है। चिकित्सा विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों ने इस स्थिति का नाम बदलकर अब PMOS (Polycystic Metabolic Ovarian Syndrome) करने का सुझाव दिया है।
यह बदलाव केवल नाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बीमारी को देखने और इसके इलाज के नजरिए में एक बड़े बदलाव का संकेत है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह परिवर्तन क्यों जरूरी था।
आखिर क्यों बदला गया PCOS का नाम?
अब तक ‘PCOS’ नाम में ‘Cyst’ (गांठ) शब्द पर ज्यादा जोर था, जिससे अक्सर यह गलतफहमी पैदा होती थी कि यह बीमारी केवल अंडाशय (Ovaries) में होने वाली गांठों से संबंधित है। हालांकि, शोध से पता चला है कि यह समस्या केवल प्रजनन अंगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका गहरा संबंध शरीर के Metabolism (चयापचय) से है।
‘PMOS’ में ‘M’ का मतलब ‘Metabolic’ है, जो यह स्पष्ट करता है कि यह स्थिति इंसुलिन रेजिस्टेंस, वजन बढ़ने, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोगों के जोखिम से जुड़ी एक मेटाबॉलिक गड़बड़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि नया नाम मरीजों और डॉक्टरों को इसके इलाज के लिए केवल अल्ट्रासाउंड पर निर्भर रहने के बजाय लाइफस्टाइल और मेटाबॉलिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा।
PCOS और PMOS में मुख्य अंतर क्या है?
तकनीकी रूप से बीमारी वही है, लेकिन ‘PMOS’ शब्द इसकी जटिलता को बेहतर ढंग से परिभाषित करता है:
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PCOS (पुराना नाम): यह नाम मुख्य रूप से ‘पॉलीसिस्टिक ओवरी’ यानी अंडाशय में कई छोटी गांठों की उपस्थिति की ओर इशारा करता था। कई महिलाएं ऐसी भी होती हैं जिन्हें PCOS है लेकिन उनके ओवरी में गांठें नहीं हैं, जिससे निदान (Diagnosis) में भ्रम होता था।
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PMOS (नया नाम): यह नाम ‘मेटाबॉलिक’ प्रभाव को प्राथमिकता देता है। यह दर्शाता है कि हार्मोनल असंतुलन का कारण और प्रभाव शरीर की ऊर्जा प्रक्रिया (Metabolism) से जुड़ा है। इसमें अनियमित पीरियड्स और एंड्रोजन (पुरुष हार्मोन) के बढ़ते स्तर के साथ-साथ मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को अनिवार्य रूप से शामिल किया गया है।
क्या इससे इलाज के तरीके बदल जाएंगे?
नाम बदलने का मुख्य उद्देश्य जागरूकता और सटीक उपचार है। PMOS के तहत अब डॉक्टर केवल प्रजनन स्वास्थ्य (Fertility) पर ही नहीं, बल्कि निम्नलिखित पहलुओं पर भी अधिक जोर देंगे:
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इंसुलिन प्रबंधन: ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करना।
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हृदय स्वास्थ्य: कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर की नियमित जांच।
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जीवनशैली: सही आहार और नियमित व्यायाम को उपचार का प्राथमिक हिस्सा बनाना।
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