नई दिल्ली/हेल्थ डेस्क: लंबे समय तक दुनिया में यह माना जाता था कि ऑटिज्म (Autism) सिर्फ बच्चों से जुड़ी एक मानसिक स्थिति है. लेकिन हाल के दिनों में एक नया और चौंकाने वाला ट्रेंड देखने को मिल रहा है— अब बड़ी उम्र के लोगों यानी वयस्कों (Adults) में भी ऑटिज्म की पहचान (Diagnosis) तेजी से हो रही है. कई लोग जीवन के 30 या 40 साल एक अजीब से खालीपन, सामाजिक तालमेल न बिठा पाने की कशमकश और अकेलेपन में गुजार देते हैं, और फिर अचानक उन्हें अहसास होता है कि वे ‘ऑटिस्टिक’ हैं.
यह ऑटिज्म के मामलों में कोई अचानक आई बाढ़ नहीं है, बल्कि मेडिकल साइंस, सोशल मीडिया और समाज में मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) को लेकर बढ़ी जागरूकता का नतीजा है. अरीते हॉस्पिटल्स की कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. सोनाली चतुर्वेदी के अनुसार, पहले ऑटिज्म को लेकर समाज और डॉक्टरों में एक बेहद सीमित नजरिया था, जो अब बदल रहा है.
पहले क्यों छूट जाते थे वयस्कों में ऑटिज्म के लक्षण?
अतीत में ऑटिज्म की एक तय छवि (Stereotype) बनी हुई थी कि यह एक ऐसा छोटा बच्चा है जो बिल्कुल बात नहीं करता, लगातार अपना सिर हिलाता है या जिसका सामाजिक व्यवहार पूरी तरह असामान्य है.
-
सामान्य व्यवहार मान लेना: जो लोग इस गंभीर दायरे में फिट नहीं बैठते थे, उन्हें समाज ‘अकेले रहने वाला’, ‘अति-संवेदनशील’, ‘कम बोलने वाला’ या ‘शांत स्वभाव’ का कहकर छोड़ देता था.
-
गलत इलाज (Misdiagnosis): सही पहचान न होने के कारण कई वयस्क जीवनभर डिप्रेशन (अवसाद), एंग्जायटी (चिंता) या पर्सनालिटी डिसऑर्डर का इलाज कराते रहते हैं. उन्हें दवाइयों से थोड़ी राहत तो मिलती है, लेकिन अंदरूनी बेचैनी कभी खत्म नहीं होती क्योंकि समस्या की असली जड़ (ऑटिज्म) छिपी रह जाती है.
क्या है ‘मास्किंग’ (Masking), जो पहचान में बनती है रोड़ा?
वयस्कों में ऑटिज्म देर से पता चलने का सबसे बड़ा कारण ‘मास्किंग’ को माना जाता है. डॉ. सोनाली चतुर्वेदी के अनुसार, कई ऑटिस्टिक लोग बचपन से ही समाज में खुद को फिट दिखाने के लिए एक ‘मुखौटा’ पहनना सीख लेते हैं:
-
वे दूसरों को देखकर उनके हंसने, बात करने और आई-कॉन्टैक्ट (आंखें मिलाने) के तरीकों की नकल करते हैं.
-
वे बातचीत के नियमों को रट लेते हैं ताकि कोई उन्हें ‘अजीब’ न समझे.
बाहर से तो वे बिल्कुल सामान्य और सफल दिखते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर इस मास्किंग के कारण वे मानसिक रूप से बेहद थक जाते हैं और गंभीर तनाव का शिकार हो जाते हैं. खुद व्यक्ति को भी समझ नहीं आता कि उसे इतनी थकावट क्यों हो रही है.
महिलाओं में और भी ज्यादा देरी से होती है पहचान
मेडिकल इतिहास में ऑटिज्म पर की गई शुरुआती रिसर्च ज्यादातर पुरुषों और लड़कों पर केंद्रित थी. यही वजह है कि महिलाओं में ऑटिज्म के लक्षण अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं. महिलाओं को बचपन से ही समाज में ज्यादा सहनशील, शांत और सामाजिक रूप से एक्टिव रहने की ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे वे पुरुषों की तुलना में ‘मास्किंग’ करने में ज्यादा माहिर हो जाती हैं. समाज अक्सर उनकी समस्याओं को ‘ज्यादा भावुक होना’ या ‘ओवरथिंकिंग’ कहकर टाल देता है.
वयस्कों में ऑटिज्म के 5 मुख्य लक्षण (Symptoms of Autism in Adults)
यदि आप या आपके आसपास कोई व्यक्ति बड़े होने पर इन स्थितियों का लगातार सामना कर रहा है, तो यह एडल्ट ऑटिज्म स्पेक्ट्रम का संकेत हो सकता है:
-
सामाजिक बातचीत में कठिनाई: बातचीत के दौरान बॉडी लैंग्वेज या लोगों के दोहरे अर्थ वाले चुटकुलों/व्यंग्य (Sarcasm) को समझने में भारी मुश्किल होना.
-
आई-कॉन्टैक्ट से बचना: किसी से बात करते समय लगातार आंखें मिलाने में अत्यधिक असहजता या घबराहट महसूस होना.
-
बदलाव पसंद न आना: रोजमर्रा की दिनचर्या (Routine) में जरा सा भी अचानक बदलाव होने पर अत्यधिक विचलित या परेशान हो जाना.
-
सेंसरी ओवरलोड (Sensory Overload): तेज रोशनी, ऊंची आवाज, भीड़भाड़ या किसी खास तरह के कपड़े के टच (स्पर्श) से बहुत ज्यादा चिड़चिड़ाहट होना.
-
स्पेशल इंटरेस्ट: किसी एक खास विषय, शौक या चीज के बारे में घंटों तक गहराई से डूबे रहना और उसी के बारे में बात करना.
पहचान बदलना नहीं, बल्कि एक ‘राहत’ है यह डायग्नोसिस
सोशल मीडिया पर लोगों के खुलते अनुभवों और वीडियोज के कारण आज कई लोग दूसरों की कहानियों में खुद को देख पा रहे हैं. डॉ. चतुर्वेदी कहती हैं कि वयस्कों के लिए ऑटिज्म का पता चलना कोई डर या बीमारी का ठप्पा नहीं, बल्कि एक गहरी राहत लेकर आता है.
इससे उनकी पहचान नहीं बदलती, बल्कि उन्हें अपने अतीत, अपने बचपन के संघर्षों, असफल रहे रिश्तों और कामकाजी जीवन की दिक्कतों का एक स्पष्ट जवाब मिल जाता है. उन्हें यह समझ आता है कि वे गलत या बीमार नहीं थे, बल्कि उनका दिमाग दुनिया को एक अलग और अनोखे नजरिए से देखता है (Neurodivergent).
The News 11 – ताज़ा हिंदी समाचार, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया