
Adhik maas katha in hindi: सनातन धर्म में अधिकमास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, का विशेष महत्व है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, यह महीना साक्षात् भगवान विष्णु को समर्पित है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पवित्र मास का अनादर करने पर एक ऋषि कन्या को भीषण कष्टों का सामना करना पड़ा था? अधिकमास की कथा के नौवें और दसवें अध्याय में इस घटना का विस्तार से वर्णन मिलता है, जो हमें धर्म के मर्म को समझने की सीख देता है।
आश्रम में दुर्वासा मुनि का आगमन और ऋषि कन्या की व्यथा
कथा के अनुसार, मेधावी ऋषि की कन्या अपने पिता के वियोग और एकाकी जीवन के कारण गहरे शोक में डूबी हुई थी। वह वन में अपने आश्रम में रह रही थी कि तभी अचानक वहां क्रोधी स्वभाव वाले दुर्वासा मुनि का आगमन हुआ। कन्या ने मुनि का उचित आदर-सत्कार किया, उनके चरणों को धोया और उन्हें फल-फूल अर्पित किए। मुनि के सामने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कन्या ने पूछा कि आखिर वह इस घोर दुख से कैसे मुक्ति पाए। वह अपनी स्थिति को अंधकारमय बताकर मुनि से सहायता की याचना करने लगी।
क्या है अधिकमास का असली महत्व?
कन्या की दयनीय स्थिति को देखकर दुर्वासा मुनि ने उसे पुरुषोत्तम मास (अधिकमास) का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि यह महीना समस्त पापों का नाश करने वाला है। कार्तिकादि मासों की तुलना में भी इसका फल अत्यंत श्रेष्ठ है। मुनि ने कन्या को बताया कि जो पुण्य बारह हजार वर्ष तक गंगा स्नान या सिंह राशि के बृहस्पति के समय गोदावरी में स्नान से प्राप्त होता है, वही फल पुरुषोत्तम मास में केवल एक बार स्नान और जप-तप करने से मिल जाता है। उन्होंने कन्या को इस मास की सेवा करने का परामर्श दिया।
जब ऋषि कन्या ने कर दिया पुरुषोत्तम मास का अपमान
दुर्वासा मुनि के वचनों को सुनकर वह कन्या अपनी अज्ञानता वश क्रोधित हो उठी। उसने अत्यंत अहंकार में भरकर मुनि से कहा कि उसे उनके वचन उचित नहीं लगे। उसने अधिकमास को ‘मलमास’ कहकर उसकी निंदा की और उसे निंदित कर्मों वाला मास बताकर उसका अपमान किया। कन्या का यह दुस्साहस देखकर दुर्वासा मुनि का शरीर क्रोध से जलने लगा, उनके नेत्र लाल हो गए, लेकिन उन्होंने कन्या को श्राप नहीं दिया। उन्होंने उसे नादान समझकर माफ कर दिया, परंतु यह चेतावनी जरूर दी कि अधिकमास का अनादर करने का फल उसे इस या अगले जन्म में अवश्य भुगतना पड़ेगा।
भगवान शंकर की भक्ति और कठिन तप का मार्ग
मुनि के जाने के बाद, अधिकमास के अपमान के प्रभाव से वह कन्या तुरंत कांतिहीन हो गई। अपनी भूल का अहसास होने पर उसने भगवान शिव की आराधना करने का निश्चय किया। उसने विष्णु और ब्रह्मा जी की उपासना को छोड़कर अपने आश्रम में ही भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या करने का संकल्प लिया। यह कथा हमें सिखाती है कि धर्म और पवित्र महीनों का अनादर करना कभी भी सुखद परिणाम नहीं देता, और विनम्रता ही ज्ञान का पहला द्वार है।
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