हेरंब संकष्टी चतुर्थी 2026: विघ्नहर्ता गणेश दूर करेंगे हर विपदा और अलौकिक व्रत कथा

सनातन धर्म में भगवान श्रीगणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता का स्थान प्राप्त है। किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत गणेश जी के स्मरण के बिना अधूरी मानी जाती है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ने वाली ‘हेरंब संकष्टी चतुर्थी’ का आध्यात्मिक और पौराणिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व है। इस पावन तिथि पर भगवान गणेश के विशेष और अत्यंत दुर्लभ ‘हेरंब’ (पंचमुखी) स्वरूप की उपासना की जाती है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जो भी भक्त इस दिन सच्चे मन से उपवास रखकर भगवान हेरंब की पूजा और व्रत कथा का श्रवण करता है, उसके जीवन की समस्त आर्थिक, मानसिक और पारिवारिक बाधाएं क्षण भर में नष्ट हो जाती हैं।

शास्त्रों के अनुसार ‘हेरंब’ का अर्थ है दुर्बलों और असहायों की रक्षा करने वाले दयानिधि देवता। सिंह की सवारी करने वाले और पांच मुखों वाले हेरंब गणपति समस्त दिशाओं से आने वाले संकटों को भस्म करने की शक्ति रखते हैं। संकष्टी चतुर्थी का यह पावन व्रत जीवन में खोई हुई प्रतिष्ठा, धन-संपदा और सुख-शांति को पुनः प्राप्त करने के लिए अचूक माना गया है।

हेरंब संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व: पंचमुखी गणेश जी दूर करते हैं जीवन के सभी संकट

भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी को हेरंब संकष्टी चतुर्थी या बहुला चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त से लेकर चंद्रोदय तक उपवास रखने का विधान है। भगवान हेरंब की उपासना से कुंडली के सभी अशुभ ग्रह शांत होते हैं, विशेषकर राहु, केतु और शनि जनित पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है।

  • पंचमुखी स्वरूप का रहस्य: भगवान हेरंब के पांच मुख पंच तत्वों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) और पंच ज्ञानेंद्रियों के नियंत्रण का प्रतीक हैं। इनकी उपासना से साधक के आत्मबल और निर्णय क्षमता में अप्रत्याशित वृद्धि होती है।

  • सिंह की सवारी: सामान्यतः गणेश जी का वाहन मूषक माना जाता है, परंतु हेरंब स्वरूप में वे पराक्रम और शौर्य के प्रतीक सिंह (शेर) पर आरूढ़ होते हैं, जो यह दर्शाता है कि यह स्वरूप बड़े से बड़े शत्रुओं और विकट परिस्थितियों पर विजय दिलाने वाला है।

  • संकटों से मुक्ति: इस दिन किए गए व्रत और मंत्र जप से परिवार पर आने वाली आकस्मिक विपत्तियां टल जाती हैं और कर्ज के जाल से मुक्ति मिलती है।

राजा नल और दमयंती से जुड़ी हेरंब संकष्टी चतुर्थी की संपूर्ण प्रामाणिक व्रत कथा

पौराणिक काल की बात है, निषध देश में राजा नल नाम के एक अत्यंत धर्मात्मा, न्यायप्रिय और प्रतापी चक्रवर्ती राजा राज्य करते थे। उनकी पत्नी विदर्भ देश की राजकुमारी दमयंती थीं, जो अपनी सुंदरता, विवेक और पातिव्रत्य धर्म के लिए तीनों लोकों में विख्यात थीं। राजा नल के राज्य में प्रजा अत्यंत सुखी और संपन्न थी तथा चारों तरफ धर्म और न्याय का वास था।

एक बार समय के चक्र और प्रारब्ध के प्रभाव से राजा नल पर शनि देव और कलयुग का कुप्रभाव पड़ा। राजा नल का अपने भाई पुष्कर के साथ चौपड़ (द्यूत) का खेल हुआ। दुर्भाग्यवश राजा नल उस खेल में अपना संपूर्ण राजपाट, हाथी-घोड़े, धन-धान्य, राजमहल और समस्त राजसी वैभव हार गए। पराजित होने के बाद राजा नल को अपने वस्त्रों के अलावा सब कुछ छोड़कर रानी दमयंती के साथ राज्य से निर्वासित होना पड़ा।

राजा नल और दमयंती घने जंगलों में भटकने लगे। उनके पास न तो खाने के लिए अन्न का दाना था और न ही सिर छुपाने के लिए कोई छत। एक समय जो राजा हजारों लोगों को अन्न दान करता था, आज वह स्वयं भूख और प्यास से तड़प रहा था। कष्टों की पराकाष्ठा तब हुई जब जंगल में दोनों एक-दूसरे से बिछड़ गए। राजा नल को एक सर्पदंश के कारण अपना वास्तविक रूप खोना पड़ा और वे राजा ऋतुपर्ण के यहां अश्वपालक (सारथी) का कार्य करने लगे। वहीं रानी दमयंती अनेक दुखों और कष्टों को झेलती हुई चेदि नरेश के राजमहल में एक साधारण दासी बनकर रहने लगीं।

कई वर्षों तक यह दारुण दुख भोगने के बाद, एक दिन रानी दमयंती के समक्ष महर्षि मार्कंडेय पधारे। रानी दमयंती ने रोते हुए महर्षि के चरणों में गिरकर अपने जीवन के समस्त दुखों की गाथा सुनाई और हाथ जोड़कर पूछा, “हे मुनिवर! हमने कभी किसी का अहित नहीं किया, फिर भी हमारे ऊपर यह भयंकर विपत्ति क्यों आई? कृपया मुझे कोई ऐसा उपाय अथवा व्रत बताएं जिससे मेरे पति का कष्ट दूर हो, हम दोनों का पुनर्मिलन हो सके और हमारा खोया हुआ राजपाट पुनः प्राप्त हो जाए।”

महर्षि मार्कंडेय ने अत्यंत स्नेह और करुणा भाव से कहा, “हे कल्याणी! पूर्व जन्मों के संचित कर्मों और वर्तमान ग्रह दोष के कारण राजा नल को यह कष्ट भोगना पड़ रहा है। इस कष्ट से मुक्ति का केवल एक ही अमोघ उपाय है। तुम भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को ‘हेरंब संकष्टी चतुर्थी’ का निर्जला व्रत रखो। भगवान श्रीगणेश के पंचमुखी हेरंब स्वरूप का विधिपूर्वक पूजन करो और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर उनसे अपने कष्टों के निवारण की प्रार्थना करो। भगवान गणपति के इस व्रत के प्रभाव से बड़े से बड़े संकट नष्ट हो जाते हैं।”

महर्षि के बताए अनुसार रानी दमयंती ने भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी के दिन पूरी निष्ठा, भक्ति और नियमों के साथ हेरंब संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा। उन्होंने दिनभर उपवास रखकर मिट्टी से भगवान गणेश की प्रतिमा बनाई, उन्हें दूर्वा, शमी पत्र, लाल पुष्प, मोदक और ऋतु फल अर्पित किए। रात्रि में चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को विधिवत अर्घ्य दिया और गणेश जी से अपने पति की रक्षा व संकट निवारण की विनती की।

व्रत के प्रभाव से भगवान हेरंब प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा नल तथा दमयंती के सभी संकटों का हरण कर लिया। कुछ ही समय के भीतर राजा नल को अपने मूल स्वरूप की पुनः प्राप्ति हुई, उनका रानी दमयंती से सुखद मिलन हुआ और उन्होंने द्यूत क्रीड़ा में अपने भाई पुष्कर को पराजित कर अपना खोया हुआ संपूर्ण राज्य, कोष और मान-सम्मान पुनः हासिल कर लिया। इसके बाद राजा नल और दमयंती आजीवन हर मास की संकष्टी चतुर्थी का व्रत करते रहे और अंत में परम गति को प्राप्त हुए।

हेरंब संकष्टी चतुर्थी की संपूर्ण पूजन विधि: दूर्वा, मोदक और चंद्र अर्घ्य का विधान

हेरंब संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और हाथ में जल व अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें।

  • चौकी स्थापना व प्रतिमा पूजन: घर के पूजा स्थल में एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि संभव हो तो पंचमुखी गणेश जी की प्रतिमा रखें।

  • अभिषेक और श्रृंगार: गणेश जी को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें सिंदूर, लाल चंदन, कुमकुम, अक्षत और जनेऊ अर्पित करें।

  • प्रिय भोग व दूर्वा अर्पण: भगवान गणेश को 21 दूर्वा की गांठें ‘ॐ गं गणपतये नमः’ या ‘ॐ हेरम्बाय नमः’ मंत्र का उच्चारण करते हुए अर्पित करें। भोग में 21 बेसन या बूंदी के मोदक, मोतीचूर के लड्डू, केला और ऋतु फल अर्पित करें।

  • कथा और आरती: धूप-दीप जलाकर राजा नल और दमयंती से जुड़ी हेरंब संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण करें। अंत में कपूर से गणेश जी की आरती उतारें।

  • चंद्र अर्घ्य और पारण नियम: संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन और अर्घ्य के बिना अधूरा रहता है। रात्रि में जब आकाश में चंद्र देव उदित हों, तब तांबे या चांदी के लोटे में जल, कच्चा दूध, रोली, अक्षत और पुष्प मिलाकर तीन बार चंद्रमा को अर्घ्य दें। इसके बाद गणेश जी के प्रसाद (मोदक) से व्रत का पारण करें।

जीवन के बड़े संकटों और आर्थिक तंगी से मुक्ति के लिए इस दिन करें ये अचूक उपाय

यदि आप लंबे समय से कर्ज, व्यापार में घाटे या पारिवारिक कलह से जूझ रहे हैं, तो हेरंब संकष्टी चतुर्थी के दिन ये उपाय अत्यंत फलदायी माने जाते हैं:

  • ऋणमुक्ति गणेश स्तोत्र का पाठ: संकष्टी चतुर्थी के दिन शाम के समय शुद्ध घी का दीपक जलाकर ‘ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र’ का तीन बार पाठ करें। इससे पुराने से पुराना कर्ज उतरने के मार्ग प्रशस्त होते हैं।

  • गुड़ और दूर्वा का उपाय: गणेश जी को 21 गुड़ की छोटी डलियां और 21 दूर्वा अर्पित करने से नौकरी और व्यापार में आ रही रुकावटें तुरंत दूर होती हैं।

  • सिंदूर अर्पण: भगवान हेरंब को चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर तिलक लगाएं और वही तिलक अपने माथे पर धारण करें। इससे आत्मबल मजबूत होता है और शत्रुओं का भय समाप्त होता है।

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