‘आधा घर किराए पर दिया, भाड़े से चल रहा गुजारा’: कभी देश के सबसे बड़े मीडिया टायकून रहे सुभाष चंद्रा का छलका दर्द; 40,000 करोड़ का कर्ज चुकाने के बाद अब सादगी से काट रहे जिंदगी

नई दिल्ली/मुंबई: भारत में निजी सैटेलाइट टेलीविजन क्रांति के जनक और कभी देश के सबसे धनी उद्योगपतियों में शुमार रहे एस्सेल ग्रुप (Essel Group) व ज़ी एंटरटेनमेंट (ZEEL) के संस्थापक सुभाष चंद्रा ने अपनी वर्तमान निजी व आर्थिक जिंदगी को लेकर बेहद चौंकाने वाला और भावुक खुलासा किया है। 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक का भारी-भरकम संस्थागत कर्ज चुकाने के लिए अपनी जीवन भर की पूंजी, शेयर और संपत्तियां बेचने के बाद अब वे बेहद सादगी भरा जीवन जी रहे हैं। एक हालिया साक्षात्कार में 73 वर्षीय पूर्व राज्यसभा सांसद सुभाष चंद्रा ने खुलासा किया कि उनकी दैनिक आजीविका और घरेलू खर्च अब केवल किराए (भाड़े) के पैसों से चल रहे हैं और इसके लिए उन्होंने अपने दिल्ली स्थित बंगले का आधा हिस्सा किराए पर चढ़ा दिया है। देश के कॉर्पोरेट इतिहास में अरबों डॉलर के साम्राज्य के मालिक रहे किसी बड़े उद्योगपति द्वारा अपनी आर्थिक लाचारी और कर्ज अदायगी की इस जमीनी हकीकत को सार्वजनिक मंच पर स्वीकार करने का यह पहला अनूठा मामला है।

सैटेलाइट टीवी क्रांति के जनक से किराए पर निर्भरता तक: सुभाष चंद्रा का बड़ा खुलासा

वर्ष 1992 में भारत का पहला निजी सैटेलाइट चैनल ‘ज़ी टीवी’ (Zee TV) लॉन्च करके देश के मनोरंजन उद्योग की दिशा बदलने वाले सुभाष चंद्रा की गिनती कभी एशिया के सबसे प्रभावशाली मीडिया मुगलों में होती थी। पैकेजिंग (एस्सेल पैकेजिंग), अम्यूजमेंट पार्क (एस्सेल वर्ल्ड), डायरेक्ट-टू-होम (डिश टीवी) और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विशाल क्षेत्रों में फैले उनके कारोबारी साम्राज्य का सालाना मूल्यांकन हजारों करोड़ रुपये में हुआ करता था।

हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त के साथ एक पॉडकास्ट में अपनी वर्तमान वित्तीय स्थिति पर बात करते हुए सुभाष चंद्रा ने कहा, “आज मेरे पास कोई बड़ा बैंक बैलेंस या ऐशो-आराम के साधन नहीं बचे हैं। मैंने अपने कर्जदाताओं की पाई-पाई चुकाने के लिए अपने अधिकांश शेयर और संपत्तियां बेच दीं। वर्तमान में मेरा गुजारा केवल मेरे पास बची एक-दो संपत्तियों से आने वाले किराए से हो रहा है। अपने घरेलू खर्चों और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए मुझे अपने रहने वाले घर का आधा हिस्सा भी किराए पर देना पड़ा है।” चंद्रा ने बताया कि जहां कभी उनके पास निजी विमानों और लग्जरी गाड़ियों का काफिला होता था, वहीं आज वे एक सामान्य नागरिक की तरह सीमित संसाधनों में संतुष्ट जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

40,000 करोड़ का कर्ज और संपत्तियों की नीलामी: एस्सेल ग्रुप के संकट की पूरी कहानी

सुभाष चंद्रा और उनके एस्सेल ग्रुप के इस वित्तीय पतन की शुरुआत इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजली ट्रांसमिशन, सोलर पावर और टोल रोड्स जैसी पूंजी-गहन (Capital-Intensive) परियोजनाओं में भारी निवेश के बाद हुई। वर्ष 2018-19 के दौरान जब देश का गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र (NBFC Crisis) ऐतिहासिक संकट से घिरा और आईएलएंडएफएस (IL&FS) डिफाल्ट हुआ, तो एस्सेल ग्रुप की बुनियादी ढांचा कंपनियों की नकदी प्रवाह प्रणाली पूरी तरह चरमरा गई।

इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए विभिन्न बैंकों और म्यूचुअल फंडों से लिए गए भारी कर्ज के बदले सुभाष चंद्रा ने अपनी प्रमुख नकदी देने वाली कंपनी ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) के प्रमोटर शेयर गिरवी (Pledge) रखे थे। कर्ज न चुका पाने की स्थिति में वित्तीय संस्थाओं ने गिरवी रखे शेयरों को खुले बाजार में बेचना शुरू कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप ज़ी में चंद्रा परिवार की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से घटकर महज 4 प्रतिशत के आसपास सिमट गई। चंद्रा ने बताया कि उन्होंने बैंकों और कर्जदाताओं का लगभग 40 हजार करोड़ रुपये का मूलधन व ब्याज वापस लौटाया, जिसके लिए उन्हें अपने पावर प्रोजेक्ट्स, ट्रांसमिशन लाइनें और निजी संपत्तियां औने-पौने दामों में बेचनी पड़ीं।

‘आधा घर किराए पर दिया’: सादगी भरी जिंदगी और रोजमर्रा के खर्चों का संघर्ष

अरबपति उद्योगपति से एक सामान्य किरायेदार जैसी स्थिति में आने के अपने सफर पर बात करते हुए सुभाष चंद्रा ने कहा कि इंसान को अपनी वास्तविक परिस्थितियों को स्वीकार करने में कभी हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि उनकी पेंशन, मामूली निवेशों और घर के आधे हिस्से से मिलने वाले किराए से ही उनका मासिक घरेलू बजट चलता है।

चंद्रा ने बताया कि वे अब किसी भी प्रकार के दिखावे या कॉरपोरेट चकाचौंध से दूर रहते हैं। उन्होंने अपने निजी स्टाफ और खर्चों में भारी कटौती की है। विपश्यना और ध्यान साधना का अभ्यास करने वाले चंद्रा का कहना है कि आर्थिक नुकसान ने उन्हें मानसिक रूप से और अधिक मजबूत बनाया है। उन्होंने कहा, “पैसा आता है और जाता है, लेकिन अगर आपका जमीर और नीयत साफ है, तो आप सूखी रोटी खाकर भी चैन की नींद सो सकते हैं। मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने संकट आने पर अपने निवेशकों और बैंकों के पैसे को हड़पने की नीयत कभी नहीं रखी।”

विजय माल्या और नीरव मोदी से तुलना: ‘देश छोड़कर भागा नहीं, पाई-पाई चुकाई’

सुभाष चंद्रा ने भारत के उन भगोड़े कारोबारियों पर भी अप्रत्यक्ष प्रहार किया जो बैंकों का हजारों करोड़ रुपये लेकर विदेशों में ऐश की जिंदगी गुजार रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब उनका कारोबार संकट में आया, तो उनके पास भी कानूनी दांव-पेच खेलने या देश छोड़ने के विकल्प हो सकते थे, लेकिन उन्होंने भारत में ही रहकर हर एक देनदारी का सामना करने का फैसला किया।

चंद्रा ने कहा, “मैं विजय माल्या या नीरव मोदी की तरह लंदन भागने वाला इंसान नहीं था। मैंने सार्वजनिक तौर पर एक खुला पत्र लिखकर अपने कर्जदाताओं से माफी मांगी थी और वादा किया था कि मैं अपनी संपत्तियां बेचकर उनके पैसे लौटाऊंगा। मैंने अपनी सबसे प्रिय कंपनी ज़ी एंटरटेनमेंट का मालिकाना हक खो दिया, लेकिन मैंने भारत के बैंकिंग सिस्टम का पैसा वापस किया। आज भले ही मैं किराए के पैसों पर जी रहा हूं, लेकिन मैं गर्व से कह सकता हूं कि मैंने अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाई है।”

सेबी (SEBI) जांच, ज़ी-सोनी मर्जर का टूटना और कानूनी लड़ाइयों का दौर

कर्ज चुकाने के बावजूद सुभाष चंद्रा और उनके बेटे पुनीत गोयनका की मुश्किलें पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने पिछले वर्षों में ज़ी एंटरटेनमेंट के फंड्स के कथित डायवर्जन को लेकर जांच शुरू की थी और प्रमोटरों पर नियामक प्रतिबंध लगाए थे, जिसके खिलाफ चंद्रा परिवार को सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) का दरवाजा खटखटाना पड़ा था।

इसके साथ ही, ज़ी एंटरटेनमेंट का जापानी दिग्गज कंपनी सोनी पिक्चर्स (Sony) के साथ होने वाला 10 अरब डॉलर का ऐतिहासिक मर्जर भी कानूनी विवादों और नेतृत्व की खींचतान के चलते टूट गया। इस मर्जर के टूटने से ज़ी के शेयरधारकों को भारी नुकसान हुआ और कंपनी के स्वतंत्र अस्तित्व पर सवाल खड़े हो गए। सुभाष चंद्रा ने इन कानूनी मामलों पर कहा कि वे देश की न्यायपालिका और विनियामक संस्थाओं का पूरा सम्मान करते हैं और सभी जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग कर रहे हैं।

नए उद्यमियों के लिए सबक: कॉर्पोरेट कर्ज का जोखिम और नैतिक जिम्मेदारी

सुभाष चंद्रा की यह गाथा भारत के युवा उद्यमियों और स्टार्टअप संस्थापकों के लिए एक बहुत बड़ा केस स्टडी और सबक है। उन्होंने नए कारोबारियों को सलाह दी कि कभी भी अति-उत्साह में आकर अनियंत्रित कर्ज (Over-Leverage) न लें और अपनी मुख्य क्षमता (Core Competence) से बाहर जाकर ऐसे सेक्टर्स में भारी पूंजी न फंसाएं जिनकी गहरी समझ न हो।

चंद्रा का मानना है कि असफलता व्यापार का एक हिस्सा है, लेकिन नैतिक पतन नहीं होना चाहिए। भारत के कॉर्पोरेट जगत में सुभाष चंद्रा का यह साहसिक कबूलनामा इस बात का प्रमाण है कि सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद जब जीवन का पहिया घूमता है, तो इंसान का चरित्र और ईमानदारी ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी बनकर उभरती है।

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