‘यह हमारे सबसे अच्छे संस्थान का हाल है’: IIT दिल्ली के छात्र की मौत पर भड़के अभिजीत दीपके, प्रीमियर संस्थानों में छात्रों के मानसिक तनाव और बदहाल सिस्टम पर दागे तीखे सवाल

नई दिल्ली: देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली (IIT Delhi) के हॉस्टल परिसर में एक होनहार छात्र की दुखद और असामयिक मौत ने एक बार फिर पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। लाखों छात्रों और अभिभावकों के सपनों के शीर्ष केंद्र माने जाने वाले आईआईटी परिसरों में छात्रों द्वारा जान गंवाने का यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस दर्दनाक घटना के बाद सोशल मीडिया और बौद्धिक जगत में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक अभिजीत दीपके ने इस त्रासदी पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए देश की उच्च शिक्षण व्यवस्था के खोखलेपन पर तीखा प्रहार किया है। दीपके ने अपने बयान में दो टूक कहा कि ‘यह हमारे सबसे अच्छे संस्थान का हाल है’, जहां देश के सबसे तेज दिमाग वाले छात्र अपने सपनों को साकार करने आते हैं, लेकिन सिस्टम के अत्यधिक दबाव, अकेलेपन और प्रशासनिक उपेक्षा की बलि चढ़ जाते हैं।

IIT दिल्ली में छात्र की दुखद मौत और हॉस्टल से मिला शव: क्या है पूरा मामला?

घटना देश की राजधानी स्थित आईआईटी दिल्ली के हॉस्टल की है, जहां एक छात्र का शव उसके कमरे में संदिग्ध परिस्थितियों में पाया गया। कमरे का दरवाजा काफी देर तक न खुलने और दोस्तों द्वारा बुलाए जाने पर कोई प्रतिक्रिया न मिलने के बाद जब संस्थान प्रशासन और पुलिस को सूचना दी गई, तो दरवाजा तोड़ने पर छात्र अचेत अवस्था में मिला। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

मौके पर पहुंची दिल्ली पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने कमरे से आवश्यक साक्ष्य जुटाए हैं और मामले की जांच शुरू कर दी है। यद्यपि प्रारंभिक स्तर पर इसे अत्यधिक मानसिक तनाव और अवसाद से उठाया गया आत्मघाती कदम माना जा रहा है, लेकिन पुलिस हर पहलू से मामले की तफ्तीश कर रही है। छात्र के साथी विद्यार्थियों का कहना है कि वह पिछले कुछ समय से आगामी परीक्षाओं, प्रोजेक्ट सबमिशन और करियर को लेकर गहरे मानसिक दबाव में दिखाई दे रहा था। इस दुखद घटना के बाद आईआईटी दिल्ली के पूरे कैंपस में मातम और गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है।

‘यह हमारे सबसे अच्छे संस्थान का हाल है’: अभिजीत दीपके का व्यवस्था पर करारा प्रहार

आईआईटी दिल्ली की इस दुखद घटना पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों की प्राथमिकताओं और उनकी कार्यशैली को कटघरे में खड़ा किया। दीपके ने लिखा कि जब देश का सर्वोच्च इंजीनियरिंग संस्थान ही अपने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा करने में नाकाम साबित हो रहा है, तो बाकी सामान्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से क्या उम्मीद की जा सकती है।

अभिजीत दीपके ने कहा कि हमारे शीर्ष शिक्षण संस्थान विश्व रैंकिंग, विशालकाय कॉरपोरेट प्लेसमेंट पैकेजों और विदेशी फंडिंग के दावों में तो व्यस्त रहते हैं, लेकिन वे उस बुनियादी मानवीय संवेदना को भूल चुके हैं जो एक शिक्षण संस्थान की आत्मा होती है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर क्यों आईआईटी जैसे शीर्ष संस्थानों के हॉस्टल कमरों में युवा जिंदगियां घुट-घुट कर खत्म हो रही हैं? क्या किसी भी डिग्री, सीजीपीए (CGPA) या नौकरी के पैकेज की कीमत किसी होनहार युवा के जीवन से अधिक हो सकती है? दीपके का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और हजारों छात्रों व अभिभावकों ने व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की।

प्रीमियर संस्थानों में जानलेवा मानसिक तनाव: कोटा से लेकर IITs तक का अंतहीन दबाव

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव किसी अभिशाप की तरह बन चुका है। कक्षा 9वीं और 10वीं से ही लाखों बच्चे कोटा, हैदराबाद और दिल्ली के कोचिंग हब में झोंक दिए जाते हैं, जहां वे दिन-रात एक करके जेईई एडवांस्ड (JEE Advanced) जैसी कठिनतम परीक्षा को पास कर आईआईटी तक पहुंचते हैं।

हालांकि, छात्रों और अभिभावकों का यह भ्रम आईआईटी पहुंचते ही टूट जाता है कि कॉलेज में दाखिला मिलते ही संघर्ष खत्म हो जाएगा। कैंपस के भीतर कदम रखते ही छात्रों का सामना ‘रिलेटिव ग्रेडिंग’ (Relative Grading), कड़े असाइनमेंट डेडलाइंस, लगातार होने वाले सरप्राइज क्विज और लाखों के पैकेज पाने की अंधी कॉरपोरेट होड़ से होता है। वहां हर दूसरा छात्र अपने क्षेत्र का टॉपर होता है, जिसके चलते एक-दूसरे से आगे निकलने का दबाव कई गुना बढ़ जाता है। जो छात्र पहले कभी फेल नहीं हुए, जब वे यहां कम ग्रेड या बैकलाग का सामना करते हैं, तो वे गहरे हीनभावना (Inferiority Complex) और अवसाद के शिकार हो जाते हैं।

मेंटल हेल्थ सपोर्ट और काउंसलिंग सिस्टम की जमीनी हकीकत: सिर्फ कागजी औपचारिकताएं

आईआईटी और एनआईटी जैसे शीर्ष संस्थानों में मेंटल हेल्थ सपोर्ट और साइकोलॉजिकल काउंसलिंग की व्यवस्था को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। कागजों पर हर संस्थान में स्टूडेंट वेलनेस सेंटर, 24 घंटे हेल्पलाइन और काउंसलर नियुक्त होते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट होती है।

छात्रों का आरोप है कि अधिकांश संस्थानों में काउंसलर्स की संख्या छात्रों के अनुपात में बेहद कम होती है। कई बार छात्र इस डर से काउंसलिंग सेंटर जाने से कतराते हैं कि कहीं उनके मानसिक तनाव की बात प्रोफेसरों या साथी छात्रों तक न पहुंच जाए और इसे उनकी कमजोरी न मान लिया जाए। इसके अलावा, संकाय सदस्यों (Faculty) और छात्रों के बीच एक बहुत बड़ी सत्तावादी और औपचारिक खाई होती है। छात्र अपनी अकादमिक समस्याओं या व्यक्तिगत परेशानियों को प्रोफेसर्स के साथ खुलकर साझा करने में हिचकिचाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे खुद को पूरी तरह अकेला पाकर भीतर ही भीतर घुटने लगते हैं।

संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गूंज चुका है मुद्दा: कब रुकेंगी IITs में छात्रों की मौतें?

देश के विभिन्न आईआईटी (जैसे आईआईटी मद्रास, आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी खड़गपुर और आईआईटी कानपुर) में पिछले कुछ वर्षों में दर्जनों छात्रों ने अपनी जान गंवाई है। यह गंभीर मुद्दा संसद के दोनों सदनों में कई बार उठाया जा चुका है और सुप्रीम कोर्ट में भी इसको लेकर जनहित याचिकाएं दाखिल की गई हैं।

संसदीय समितियों और शिक्षा विशेषज्ञों ने बार-बार सिफारिश की है कि आईआईटी की सख्त और दंडात्मक ग्रेडिंग प्रणाली में लचीलापन लाया जाए, ड्रॉप-आउट और ब्रेक लेने के नियमों को उदार बनाया जाए और छात्रों के प्रदर्शन को केवल अंकों और प्लेसमेंट के तराजू पर न तौला जाए। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से इन सिफारिशों को केवल औपचारिक रिपोर्टों तक सीमित रखा गया और ग्राउंड लेवल पर कोई क्रांतिकारी संरचनात्मक सुधार लागू नहीं किए गए।

केवल प्लेसमेंट पैकेज नहीं, जीवन रक्षा बने प्राथमिकता: व्यवस्था में व्यापक बदलाव की दरकार

अभिजीत दीपके और अन्य शिक्षाविदों की यह तीखी प्रतिक्रिया इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब भारतीय समाज और नीति निर्माताओं को अपनी प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करना होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए रोबोटिक कार्यबल तैयार करना नहीं, बल्कि संवेदनशील, खुशहाल और स्वस्थ नागरिकों का निर्माण करना है।

आईआईटी दिल्ली की यह घटना केवल एक छात्र का व्यक्तिगत नुकसान नहीं है, बल्कि यह पूरे राष्ट्र के बौद्धिक संसाधन और एक परिवार के सपनों की निर्मम हत्या है। जब तक हमारे प्रीमियर संस्थान अत्यधिक प्रतिस्पर्धी माहौल को बदलकर एक सहयोगात्मक, मानवीय और मानसिक रूप से सुरक्षित माहौल नहीं बनाएंगे, तब तक ऐसी त्रासदियों को रोका नहीं जा सकेगा। सरकार, यूजीसी, शिक्षा मंत्रालय और आईआईटी काउंसिल को अब आत्ममुग्धता छोड़कर युद्धस्तर पर ऐसे सुधार लागू करने होंगे जिससे किसी भी छात्र को अपनी पढ़ाई की कीमत अपनी जान देकर न चुकानी पड़े।

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