
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला कजरी तीज (सातुड़ी तीज) का महापर्व सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याओं के लिए मनचाहे वर की प्राप्ति का पावन अवसर लेकर आया है। इस वर्ष कजरी तीज का व्रत सोमवार के दिन पड़ रहा है। सोमवार का दिन स्वयं देवाधिदेव महादेव को समर्पित होता है, ऐसे में सोमवार और तीज का यह दुर्लभ संयोग इस व्रत के फल को कई गुना बढ़ा देता है। इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव की संयुक्त आराधना करने से दांपत्य जीवन के समस्त कष्ट दूर होते हैं, वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है और अविवाहित कन्याओं के विवाह में आ रही समस्त बाधाएं समाप्त होती हैं।
शास्त्रों के अनुसार इस वर्ष कजरी तीज पर चंद्रमा मीन राशि में संचरण करेंगे। ज्योतिषीय गणना के अनुसार जब चंद्रमा मीन राशि में होते हैं, तो भद्रा का वास पाताल अथवा पृथ्वी लोक पर माना जाता है। पृथ्वी लोक की भद्रा के समय मांगलिक एवं विशेष पूजन कार्यों को वर्जित माना जाता है। ऐसे में कजरी तीज की पूजा के लिए भद्रा की समाप्ति के बाद का शुभ मुहूर्त चुनना ही शास्त्रसम्मत और सर्वाधिक फलदायी रहेगा।
कजरी तीज पर सुबह भद्रा का साया: जानें कब तक रहेगा प्रभाव और कब करें पूजा
पंचांग के अनुसार कजरी तीज के दिन प्रातःकाल से ही भद्रा का प्रभाव देखने को मिलेगा। भद्रा काल की कुल अवधि लगभग 2 घंटे 52 मिनट की रहेगी:
-
भद्रा प्रारंभ समय: प्रातः 05:58 बजे से
-
भद्रा समाप्ति समय: प्रातः 08:50 बजे तक
भद्रा के दौरान किसी भी प्रकार का प्रधान पूजन, संकल्प या विशेष अनुष्ठान करने से बचना चाहिए। प्रातः 08:50 बजे भद्रा समाप्त होने के बाद 09:10 बजे से अमृत व शुभ चौघड़िया मुहूर्त प्रारंभ होगा, जो कजरी तीज की मुख्य पूजा के लिए सबसे श्रेष्ठ समय है। जो महिलाएं प्रातःकाल पूजा करना चाहती हैं, वे भद्रा काल समाप्त होने के बाद 09:10 बजे से पूरे विधि-विधान से शिव परिवार का पूजन संपन्न कर सकती हैं।
कजरी तीज 2026: सुबह से लेकर रात तक के सभी शुभ चौघड़िया एवं पूजन मुहूर्त
यदि आप सुबह के समय पूजा नहीं कर पाती हैं, तो पूरे दिन में कई अत्यंत शुभ योग और चौघड़िया मुहूर्त उपलब्ध हैं, जिनमें पूजा-अर्चना संपन्न की जा सकती है:
प्रातःकाल के शुभ मुहूर्त:
-
ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:29 बजे से 05:14 बजे तक
-
प्रातः सन्ध्या: प्रातः 04:51 बजे से 05:58 बजे तक
-
शुभ – उत्तम मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ पूजन समय): प्रातः 09:10 बजे से 10:46 बजे तक
दोपहर के शुभ मुहूर्त:
-
अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:56 बजे से दोपहर 12:47 बजे तक
-
चर – सामान्य मुहूर्त: दोपहर 01:57 बजे से 03:33 बजे तक
-
विजय मुहूर्त: दोपहर 02:29 बजे से दोपहर 03:20 बजे तक
शाम (गोधूलि व प्रदोष) के शुभ मुहूर्त:
-
अमृत – सर्वोत्तम मुहूर्त: शाम 05:08 बजे से शाम 06:44 बजे तक
-
गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:44 बजे से शाम 07:06 बजे तक
-
सायाह्न सन्ध्या मुहूर्त: शाम 06:44 बजे से शाम 07:51 बजे तक
-
चर – सामान्य मुहूर्त: शाम 06:44 बजे से रात 08:08 बजे तक
रात्रिकालीन शुभ मुहूर्त:
-
निशिता मुहूर्त: रात 11:59 बजे से देर रात 12:44 बजे तक (1 सितंबर)
-
अमृत काल: देर रात 01:01 बजे से 02:36 बजे तक (1 सितंबर)
कजरी तीज की संपूर्ण पूजन विधि: मिट्टी के शिव-गौरी और गौ माता की आराधना
कजरी तीज के दिन व्रती महिलाएं सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ या नए वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर निर्जला व्रत का संकल्प लिया जाता है।
घर के पूजा स्थल या ईशान कोण में एक साफ लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। कजरी तीज पर शुद्ध मिट्टी या बालू से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बनाने की प्राचीन परंपरा है। यदि मिट्टी की प्रतिमा संभव न हो तो शिव परिवार की सुंदर तस्वीर स्थापित करें।
माता गौरी को सिंदूर, कुमकुम, महावर, मेंहदी, बिंदी, चूड़ी और चुनरी सहित सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। भगवान भोलेनाथ को गंगाजल, कच्चा गाय का दूध, चंदन, अक्षत, बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और सफेद पुष्प अर्पित करें। इसके बाद धूप, दीप और अगरबत्ती प्रज्वलित कर कजरी तीज की पौराणिक व्रत कथा का श्रवण करें। कथा पूर्ण होने के पश्चात कपूर से भगवान शिव और माता पार्वती की आरती उतारें और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
शास्त्रों में कजरी तीज के दिन गौ माता की पूजा का विशेष महात्म्य बताया गया है। पूजा संपन्न करने के बाद आटे की लोई अथवा ताजी रोटी में थोड़ा सा गुड़ और भीगे हुए चने रखकर गाय को श्रद्धापूर्वक खिलाएं। मान्यता है कि गाय को ग्रास देने से तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का आशीर्वाद स्वतः ही प्राप्त हो जाता है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
कजरी तीज व्रत पारण विधि: चंद्र दर्शन, अर्घ्य और सत्तू का भोग
कजरी तीज का निर्जला व्रत चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। रात्रि में जब आकाश में चंद्र देव का उदय हो, तब चांदी के लोटे या तांबे के पात्र में शुद्ध जल, कच्चा दूध, रोली, अक्षत और दूर्वा डालकर चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करें। चंद्र देव को अर्घ्य देते समय अपनी दृष्टि नीचे रखें और लोटे की धार से गिरते जल में चंद्रमा की छाया के दर्शन करें।
अर्घ्य देने के बाद सुहागिन महिलाएं अपने पति के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें और पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें। कजरी तीज के पारण में सत्तू का विशेष महत्व होता है। इस दिन जौ, गेहूं, चना और चावल के सत्तू में देसी घी, बूरा या खांड और बारीक कटे मेवे मिलाकर स्वादिष्ट सत्तू के पिंडे (लड्डू) बनाए जाते हैं। सबसे पहले इस सत्तू का भोग तीज माता को लगाया जाता है, उसके बाद स्वयं इसका सेवन कर 24 घंटे का निर्जला व्रत खोला जाता है।
The News 11 – Hindustan Newspaper, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया