
कैंसर अनुसंधान और वैश्विक चिकित्सा जगत के इतिहास में एक अत्यंत युगांतरकारी मोड़ आ गया है। त्वचा के सबसे आक्रामक, घातक और तेजी से फैलने वाले कैंसर ‘मेलेनोमा’ (Melanoma) को हमेशा के लिए मात देने के लिए दुनिया की पहली ‘पर्सनलाइज्ड mRNA कैंसर वैक्सीन’ क्लिनिकल ट्रायल्स के अंतिम चरण को पार कर मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण बन चुकी है। बायोफार्मास्युटिकल दिग्गज मॉडर्ना (Moderna) और मर्क (Merck/MSD) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई इस प्रायोगिक वैक्सीन का कोडनेम ‘mRNA-4157 / V940’ है।
यह कोई पारंपरिक वैक्सीन नहीं है जो बचपन में पोलियो या चेचक की तरह सभी को एक जैसी लगाई जाती है, बल्कि यह एक अत्याधुनिक ‘ट्रीटमेंट वैक्सीन’ (Therapeutic Vaccine) है, जिसे हर मरीज के ट्यूमर के जेनेटिक कोड का विश्लेषण करके उसी के लिए खास तौर पर तैयार (Tailor-made) किया जाता है। वैश्विक स्वास्थ्य नियामक संस्थाओं द्वारा इसे ‘ब्रेकथ्रू थेरेपी’ का दर्जा दिया गया है, जो सर्जरी के बाद दोबारा कैंसर के लौटने (Recurrence) और शरीर के अन्य अंगों में इसके फैलाव (Metastasis) को रोकने में मील का पत्थर साबित हो रही है।
हर मरीज के लिए बनेगी अलग वैक्सीन: जानिए क्या है ‘पर्सनलाइज्ड नियोएंटीजन’ तकनीक
कैंसर का इलाज अब तक इसलिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहा है क्योंकि हर इंसान का कैंसर और उसके ट्यूमर का जेनेटिक म्यूटेशन दूसरे मरीज से बिल्कुल अलग होता है। एक मरीज पर जो दवा असर करती है, वह दूसरे पर निष्प्रभावी हो सकती है। इस नई mRNA तकनीक ने इस बाधा को जड़ से समाप्त कर दिया है:
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ट्यूमर की बायोप्सी और जेनेटिक सीक्वेंसिंग: सबसे पहले मरीज की सर्जरी के दौरान निकाले गए ट्यूमर का एक नमूना (Biopsy) और उसका स्वस्थ ब्लड सैंपल लिया जाता है। इसके बाद अत्याधुनिक नेक्स्ट-जेनरेशन डीएनए व आरएनए सीक्वेंसिंग (Next-Generation Sequencing) के जरिए कैंसर कोशिकाओं के पूरे जेनेटिक कोड को पढ़ा जाता है।
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म्यूटेशन और नियोएंटीजन की पहचान: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपरकंप्यूटिंग एल्गोरिदम की मदद से ट्यूमर के उन विशिष्ट प्रोटीन्स या म्यूटेशन्स की पहचान की जाती है जो स्वस्थ कोशिकाओं में नहीं होते। इन्हें ‘नियोएंटीजन’ (Neoantigens) कहा जाता है।
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कस्टम mRNA ब्लूप्रिंट का निर्माण: वैज्ञानिक एक मरीज के ट्यूमर से 34 सबसे आक्रामक और विशिष्ट नियोएंटीजन को चुनते हैं। इन 34 म्यूटेशन्स के खिलाफ शरीर को लड़ने का निर्देश देने वाला एक सिंथेटिक ‘मैसेंजर आरएनए’ (mRNA) कोड प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है।
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व्यक्तिगत वैक्सीन का निर्माण: इस सिंथेटिक mRNA को लिपिड नैनोपार्टिकल्स (वसा के सूक्ष्म कणों) में पैक करके इंजेक्शन के रूप में मरीज के लिए तैयार किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया मरीज के सैंपल लेने से लेकर वैक्सीन बनने तक लगभग 6 से 8 हफ्तों के भीतर पूरी कर ली जाती है।
शरीर के अंदर कैसे काम करती है यह कैंसर वैक्सीन? समझिए इम्यून सिस्टम की ट्रेनिंग का पूरा विज्ञान
जब यह कस्टमाइज्ड mRNA वैक्सीन मरीज के शरीर में इंजेक्ट की जाती है, तो यह कैंसर कोशिकाओं पर सीधे हमला नहीं करती, बल्कि शरीर के अपने ही इम्यून सिस्टम को एक ‘स्नाइपर’ की तरह प्रशिक्षित करती है:
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टी-कोशिकाओं (T-Cells) को प्रशिक्षण: वैक्सीन में मौजूद mRNA निर्देश शरीर की एंटीजन-प्रेजेंटिंग कोशिकाओं (Dendritic Cells) में जाते हैं। ये कोशिकाएं वैक्सीन के निर्देशों को पढ़कर ट्यूमर के उन 34 विशिष्ट प्रोटीन्स की हूबहू नकल तैयार करती हैं और उन्हें शरीर की रक्षक टी-कोशिकाओं (Killer T-Cells) के सामने पेश करती हैं।
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कैंसर की पहचान और मेमोरी का निर्माण: टी-कोशिकाएं इन प्रोटीन्स को ‘दुश्मन’ के रूप में पहचानना सीख जाती हैं। इम्यून सिस्टम में एक स्थायी मेमोरी बन जाती है कि कैंसर कोशिकाएं कैसी दिखती हैं।
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माइक्रोस्कोपिक ट्यूमर का खात्मा: सर्जरी के बाद यदि शरीर में या रक्तप्रवाह में कैंसर की कोई भी अदृश्य या सूक्ष्म कोशिका (Micrometastasis) बची रह जाती है, तो ये प्रशिक्षित टी-कोशिकाएं पूरे शरीर में घूम-घूमकर उन्हें ढूंढती हैं और स्वस्थ ऊतकों को नुकसान पहुंचाए बिना केवल कैंसर कोशिकाओं को नष्ट कर देती हैं।
इम्यूनोथेरेपी ‘कीट्रूडा’ (Keytruda) के साथ महासंयोग: दोतरफा वार से कैंसर का चक्रव्यूह ध्वस्त
इस वैक्सीन की सबसे बड़ी ताकत इसका ‘कीट्रूडा’ (पेम्ब्रोलिज़ुमाब – Pembrolizumab) नामक प्रसिद्ध इम्यूनोथेरेपी दवा के साथ कॉम्बिनेशन है।
कैंसर कोशिकाएं अक्सर बहुत चालाक होती हैं; वे अपनी सतह पर ‘PD-L1’ नामक एक प्रोटीन का ढाल बना लेती हैं, जो शरीर की टी-कोशिकाओं के ‘PD-1’ रिसेप्टर से जुड़कर उन्हें सुस्त (स्विच ऑफ) कर देता है। इसे कैंसर का ‘इनविजिबिलिटी क्लोक’ (अदृश्य होने की क्षमता) कहा जाता है।
जब मरीज को कीट्रूडा दी जाती है, तो वह कैंसर की इस सुरक्षा ढाल को तोड़ देती है, जिससे कैंसर कोशिकाएं इम्यून सिस्टम को दिखने लगती हैं। उसी समय दी जाने वाली mRNA वैक्सीन इम्यून सिस्टम की टी-कोशिकाओं की संख्या और उनकी मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा देती है। यह दोहरा हमला कैंसर कोशिकाओं को बचने का कोई मौका नहीं देता।
क्लिनिकल ट्रायल्स में ऐतिहासिक नतीजे: दोबारा कैंसर लौटने का खतरा 49% तक घटा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए तीसरे चरण (Phase 2b/Phase 3) के ‘KEYNOTE-942’ क्लिनिकल ट्रायल के परिणामों ने ऑन्कोलॉजिस्ट्स को चकित कर दिया है। इस ट्रायल में स्टेज III और स्टेज IV के उन हाई-रिस्क मेलेनोमा मरीजों को शामिल किया गया था, जिनकी सर्जरी हो चुकी थी:
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पुनरावृत्ति के जोखिम में भारी गिरावट: जिन मरीजों को केवल मानक इम्यूनोथेरेपी (Keytruda) दी गई, उनकी तुलना में जिन मरीजों को mRNA-4157 वैक्सीन + Keytruda का कॉम्बिनेशन दिया गया, उनमें कैंसर के दोबारा लौटने या मृत्यु के जोखिम में 44 से 49 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई।
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दूर के अंगों में फैलाव रुका: वैक्सीन कॉम्बिनेशन ने कैंसर के लिवर, फेफड़ों या मस्तिष्क जैसे दूर के अंगों में फैलने (Distant Metastasis) के खतरे को 62 प्रतिशत तक कम कर दिया।
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दीर्घकालिक सुरक्षा: लगभग 3 वर्षों के फॉलो-अप डेटा में यह देखा गया कि वैक्सीन लेने वाले अधिकांश मरीज पूरी तरह कैंसर-मुक्त और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
पारंपरिक कीमोथेरेपी से कितनी अलग है यह mRNA वैक्सीन? साइड इफेक्ट्स और फायदे
पारंपरिक कैंसर उपचारों (जैसे कीमोथेरेपी और रेडिएशन) की सबसे बड़ी खामी यह रही है कि वे कैंसर कोशिकाओं के साथ-साथ शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं (जैसे बालों की जड़ें, आंतों की परत और बोन मैरो) को भी नष्ट कर देते हैं। इसके कारण मरीजों को अत्यधिक कमजोरी, बालों का झड़ना, उल्टी, संक्रमण और अंगों के डैमेज का सामना करना पड़ता है।
इसके विपरीत, mRNA कैंसर वैक्सीन अत्यंत सटीक और लक्षित (Targeted) होती है:
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यह केवल उन म्यूटेटेड प्रोटीन्स को निशाना बनाती है जो ट्यूमर पर मौजूद होते हैं, जिससे स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं पहुंचता।
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इसके साइड इफेक्ट्स बहुत हल्के और अस्थायी होते हैं, जैसे इंजेक्शन लगने वाली जगह पर हल्का दर्द, हल्का बुखार, सिरदर्द या एक-दो दिन की थकान, जो सामान्य फ्लू वैक्सीन जैसी ही होती है।
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मरीज को अस्पताल में लंबे समय तक भर्ती होने की आवश्यकता नहीं होती; वह अपनी सामान्य दिनचर्या के साथ हर 3 हफ्ते में इसका इंजेक्शन ले सकता है।
मेलेनोमा और स्किन कैंसर के शुरुआती लक्षण: इन 5 वार्निंग संकेतों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज
स्किन कैंसर का समय पर पता चलना इलाज की सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक है। मेलेनोमा अक्सर त्वचा पर पहले से मौजूद किसी तिल (Mole) में बदलाव या नए असामान्य धब्बे के रूप में शुरू होता है। इसके लिए डॉक्टरों द्वारा सुझाए गए ‘ABCDE’ नियम को समझना जरूरी है:
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A – Asymmetry (असममिति): यदि किसी तिल या मस्से को बीच से दो भागों में बांटा जाए और दोनों हिस्से एक जैसे न दिखें।
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B – Border (किनारे): तिल के किनारे चिकने होने के बजाय कटे-फटे, खुरदुरे या टेढ़े-मेढ़े दिखाई दें।
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C – Color (रंग में बदलाव): तिल का रंग एक समान न होकर उसमें काला, भूरा, लाल, सफेद या नीला रंग एक साथ दिखाई देने लगे।
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D – Diameter (आकार): यदि तिल का आकार पेंसिल के पीछे लगे रबर (लगभग 6 मिलीमीटर) से बड़ा हो जाए या तेजी से बढ़ रहा हो।
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E – Evolving (लगातार बदलाव): तिल के आकार, रंग, मोटाई में लगातार बदलाव हो, या उसमें अचानक खुजली, दर्द, पपड़ी जमना या खून निकलना शुरू हो जाए।
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अन्य लक्षण: त्वचा पर कोई ऐसा घाव या छाला जो कई हफ्तों तक मलहम लगाने के बाद भी ठीक न हो रहा हो।
स्किन कैंसर के मुख्य जोखिम कारक और बचाव के सरल उपाय
स्किन कैंसर का सबसे बड़ा कारण सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणें (Ultraviolet – UV Radiation) हैं। गोरी त्वचा वाले लोग, जिनके शरीर में मेलेनिन कम होता है, वे इसके प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, हालांकि यह किसी भी त्वचा टोन वाले व्यक्ति को हो सकता है।
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सनस्क्रीन का नियमित उपयोग: घर से बाहर निकलते समय हमेशा ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन (SPF 30 या उससे अधिक) लगाएं जो UVA और UVB दोनों किरणों से सुरक्षा दे।
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चरम धूप से बचाव: सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे के बीच जब धूप सबसे तेज होती है, सीधे धूप के संपर्क में आने से बचें। पूरी बांह के कपड़े, चौड़ी टोपी और यूवी-प्रोटेक्टेड सनग्लासेस का उपयोग करें।
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टैनिंग बेड्स और आर्टिफिशियल यूवी लाइट्स से दूरी: कॉस्मेटिक टैनिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले टैनिंग बेड्स त्वचा की कोशिकाओं के डीएनए को तेजी से डैमेज करते हैं, इनसे पूरी तरह दूर रहें।
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नियमित सेल्फ-एग्जामिनेशन: महीने में एक बार पूरे शरीर की त्वचा की जांच करें और किसी भी नए या बदलते हुए तिल के दिखते ही तुरंत डर्मेटोलॉजिस्ट से संपर्क करें।
भारतीय मरीजों और वैश्विक उपलब्धता के लिए क्या हैं संभावनाएं? अन्य कैंसरों पर भी ट्रायल जारी
यद्यपि गोरे देशों (जैसे ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूरोप) की तुलना में भारत में मेलानोमा के मामले कम देखे जाते हैं, लेकिन भारत में धूप के अत्यधिक संपर्क और देर से डायग्नोसिस के कारण ‘एक्रल लेंटिगिनस मेलेनोमा’ (हथेलियों, तलवों और नाखूनों के नीचे होने वाला स्किन कैंसर) के मामले तेजी से सामने आते हैं। भारतीय कैंसर संस्थान और शीर्ष ऑन्कोलॉजिस्ट्स इस mRNA तकनीक पर कड़ी नजर रखे हुए हैं।
इस सफलता के बाद, वैज्ञानिक केवल स्किन कैंसर तक ही सीमित नहीं हैं। इसी पर्सनलाइज्ड mRNA प्लेटफॉर्म का उपयोग करके अब नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (फेफड़ों का कैंसर), ब्लैडर कैंसर (मूत्राशय का कैंसर), कोलोरेक्टल कैंसर (आंतों का कैंसर) और पैनक्रिएटिक कैंसर के खिलाफ भी बड़े पैमाने पर क्लिनिकल ट्रायल्स शुरू कर दिए गए हैं। यह तकनीक आने वाले वर्षों में कैंसर के संपूर्ण उपचार की परिभाषा को बदलने जा रही है, जहां कैंसर लाइलाज बीमारी न रहकर एक प्रबंधनीय और पूरी तरह ठीक होने योग्य स्थिति बन सकेगा।
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