
पैन-इंडिया सुपरस्टार यश की आगामी बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक: अ फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ (Toxic: A Fairy Tale for Grown-ups) जब से फ्लोर पर आई है, तब से यह लगातार चर्चा के केंद्र में बनी हुई है। डार्क, इंटेंस और एक्शन से भरपूर इस सिनेमाई दुनिया को लेकर दर्शकों में भारी उत्सुकता है। हालांकि, हाल ही में फिल्म के टीजर और पर्दे के पीछे से लीक हुई कुछ संवेदनशील जानकारियों के सामने आने के बाद फिल्म की लीड एक्ट्रेस को सोशल मीडिया पर भारी ट्रोलिंग और आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। पर्दे पर अब तक अपनी सादगी, संजीदगी और ‘गर्ल नेक्स्ट डोर’ वाली पारिवारिक छवि के लिए पहचानी जाने वाली इस मशहूर अभिनेत्री का अचानक बोल्ड, बेबाक और इंटेंस सीन्स में नजर आना उनके पारंपरिक फैंस के गले नहीं उतर रहा है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स जैसे इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) और रेडिट पर दर्शक अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं और एक्ट्रेस के इस अप्रत्याशित स्क्रीन ट्रांसफॉर्मेशन पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
संस्कारी और सादगी भरी पहचान से सीधे डार्क-बोल्ड अवतार: क्यों आहत हुए फैंस के जज्बात?
भारतीय सिनेमा में जब कोई अभिनेत्री लंबे समय तक पारंपरिक, पारिवारिक या संस्कारी भूमिकाएं निभाकर दर्शकों के दिलों में जगह बनाती है, तो दर्शक अनजाने में उसके वास्तविक व्यक्तित्व को भी उसी ऑन-स्क्रीन छवि के साथ जोड़ लेते हैं। इस अभिनेत्री के साथ भी ठीक ऐसा ही देखने को मिला है। अपने करियर के पिछले प्रोजेक्ट्स में उन्होंने ज्यादातर ऐसी भूमिकाएं निभाई थीं जिन्हें हर उम्र और पूरे परिवार के साथ बैठकर देखा जा सकता था।
लेकिन ‘टॉक्सिक’ की दुनिया पूरी तरह से वयस्कों (Adults) के लिए रची गई एक खुरदरी, हिंसक और ग्रे-शेड्स वाली दुनिया है। फिल्म की पटकथा के अनुसार, एक्ट्रेस का किरदार केवल एक ग्लैमरस गुड़िया का नहीं है, बल्कि वह एक जटिल, विद्रोही और बोल्ड महिला के रूप में सामने आ रही हैं। जब फिल्म के कुछ क्लिप्स और सीन्स में एक्ट्रेस को बोल्ड अंदाज, सिगरेट के कश खींचते और इंटेंस इंटीमेट सीन्स करते देखा गया, तो उनके पारंपरिक प्रशंसक वर्ग को गहरा झटका लगा। फैंस का मानना है कि उन्हें अपनी इस स्थापित पहचान को इतनी जल्दी और इस तरह से नहीं बदलना चाहिए था।
सोशल मीडिया पर खिंचाई: “आपसे ऐसी सस्ती पब्लिसिटी की उम्मीद नहीं थी” जैसे कमेंट्स की बाढ़
एक्ट्रेस के इस नए अवतार की तस्वीरें और वीडियो क्लिप्स वायरल होते ही कमेंट सेक्शन में प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। एक यूजर ने निराशा जताते हुए लिखा, “हमने आपको हमेशा आपकी सादगी और बेहतरीन एक्टिंग के लिए पसंद किया है। क्या बॉक्स ऑफिस पर टिके रहने के लिए अब आपको भी बोल्डनेस का सहारा लेना पड़ेगा? आपसे ऐसी उम्मीद बिल्कुल नहीं थी।” वहीं एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की, “एक बेहतरीन कलाकार को अपनी कला साबित करने के लिए एक्सपोजर की जरूरत नहीं होती। यह बदलाव आपके व्यक्तित्व से बिल्कुल मेल नहीं खाता।”
कुछ प्रशंसकों ने तो यहां तक कह दिया कि साउथ और बॉलीवुड के पैन-इंडिया प्रोजेक्ट्स में अब जबरन बोल्डनेस ठूंसने का ट्रेंड बन गया है और यह एक्ट्रेस भी उसी भेड़चाल का शिकार हो गई हैं। हालांकि, ट्रोल्स की इस भीड़ में कुछ ऐसे सिनेमा प्रेमी भी हैं जो इसे एक कलाकार की बहुमुखी प्रतिभा (Versatility) के रूप में देख रहे हैं और इसे केवल एक किरदार मानकर देखने की वकालत कर रहे हैं।
किरदार की अनिवार्य मांग या पब्लिसिटी स्टंट? सिनेमा में बोल्डनेस की बदलती परिभाषा
इस पूरे विवाद के बीच फिल्म उद्योग के जानकारों और फिल्म क्रिटिक्स का विश्लेषण पूरी तरह अलग है। सिनेमा के जानकारों का कहना है कि आज का दर्शक वर्ग परिपक्व हो चुका है और सिनेमा अब ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नहीं रहा, बल्कि ‘ग्रे कैरेक्टर्स’ का दौर चल रहा है। ‘टॉक्सिक’ का टैगलाइन ही ‘अ फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ यानी वयस्कों के लिए एक डार्क फेयरी टेल है।
फिल्म की निर्देशक गीतू मोहनदास, जो अपने यथार्थवादी और लीक से हटकर सिनेमाई दृष्टिकोण के लिए जानी जाती हैं, उन्होंने इस किरदार को अपराध जगत और गहरे मानसिक द्वंद्व के इर्द-गिर्द बुना है। सूत्रों के अनुसार, फिल्म में दिखाए गए बोल्ड और इंटेंस दृश्य किसी पब्लिसिटी स्टंट या केवल दर्शकों को आकर्षित करने के लिए नहीं जोड़े गए हैं, बल्कि वे कहानी के भावनात्मक उतार-चढ़ाव और चरित्र के पतन व उत्थान को दर्शाने के लिए अनिवार्य हैं। एक कलाकार के रूप में किसी भी जटिल और असहज किरदार को पूरी ईमानदारी से जीना ही उसकी असली परीक्षा होती है।
ट्रोल्स पर पलटवार और मेकर्स का रुख: कला में सीमाओं और दोहरे मापदंडों का सवाल
इस भारी ट्रोलिंग पर जहां एक्ट्रेस की पीआर टीम ने इसे फिल्म के संदर्भ में देखने की अपील की है, वहीं इंडस्ट्री के कई सह-कलाकारों ने एक्ट्रेस के समर्थन में आवाज उठाई है। फिल्म से जुड़े करीबी सूत्रों का कहना है कि जब कोई पुरुष अभिनेता पर्दे पर शराब पीता है, गाली-गलौज करता है या ग्रे शेड के हिंसक किरदार निभाता है, तो उसे ‘मेथड एक्टिंग’ और ‘रॉ परफॉर्मेंस’ कहकर सराहा जाता है। लेकिन जब वही चीज कोई महिला अभिनेत्री कहानी की मांग के तहत करती है, तो समाज तुरंत उसके चरित्र और नैतिकता पर सवाल उठाने लगता है।
मेकर्स का स्पष्ट मानना है कि जब दर्शक पूरी फिल्म सिनेमाघरों में देखेंगे, तो उन्हें समझ आएगा कि यह बोल्डनेस कहानी की आत्मा थी, न कि कोई फूहड़ता। एक्ट्रेस ने भी अपने पिछले साक्षात्कारों में यह संकेत दिया था कि वह खुद को किसी एक खास इमेज में बांधकर नहीं रखना चाहतीं और अपने करियर के इस मोड़ पर वे हर उस किरदार को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं जो उन्हें एक कलाकार के रूप में चुनौती देता हो।
पैन-इंडिया सिनेमा का डार्क यूनिवर्स: क्या भारतीय दर्शक बदलाव के लिए तैयार हैं?
‘एनिमल’, ‘केजीएफ’ और ‘पुष्पा’ जैसी फिल्मों की अभूतपूर्व व्यावसायिक सफलता ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय बॉक्स ऑफिस पर अब डार्क, अनफिल्टर्ड और रॉ सिनेमा को बड़े पैमाने पर स्वीकार किया जा रहा है। ‘टॉक्सिक’ भी इसी श्रेणी की एक महात्वाकांक्षी फिल्म है जो वैश्विक स्तर पर ड्रग्स, माफिया और मानवीय लालच की दास्तान को बयां करती है।
ऐसे प्रोजेक्ट्स में किरदारों की मासूमियत की जगह उनकी विवशता और खुरदरापन ही मुख्य आकर्षण होता है। यह विवाद इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय सिनेमा जहां वैश्विक मानकों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है, वहीं दर्शकों का एक बड़ा वर्ग अभी भी अपनी पसंदीदा अभिनेत्रियों को एक तयशुदा ‘संस्कारी खांचे’ से बाहर देखने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो पा रहा है।
स्टारडम, सोशल मीडिया जजमेंट और परफॉर्मेंस की असली परीक्षा
डिजिटल युग में किसी भी सेलिब्रिटी के लिए हर किसी को खुश रखना असंभव हो चुका है। सोशल मीडिया पर मिलने वाली क्षणिक ट्रोलिंग और जजमेंट किसी कलाकार की मेहनत और अभिनय क्षमता को कम नहीं आंक सकते। इस पूरे विवाद का अंतिम फैसला तब होगा जब फिल्म सिनेमाघरों के बड़े पर्दे पर दस्तक देगी। यदि एक्ट्रेस का यह बोल्ड अवतार कहानी के साथ न्याय करने में सफल रहा, तो यही ट्रोलर्स कल उनकी अदाकारी की तारीफों के पुल बांधते नजर आएंगे। यह विवाद न केवल ‘टॉक्सिक’ के प्रति दर्शकों की उत्सुकता को कई गुना बढ़ा चुका है, बल्कि यह भी तय कर रहा है कि एक अभिनेत्री के लिए अपनी पुरानी सीमाओं को तोड़कर एक नई पहचान गढ़ने का सफर कितना चुनौतीपूर्ण और साहसी होता है।
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