
खगोल विज्ञान और ज्योतिषीय गणना के दृष्टिकोण से वर्ष का अंतिम चंद्र ग्रहण एक अत्यंत दुर्लभ और कौतूहलपूर्ण घटना बनने जा रहा है। इस खगोलीय घटना के दौरान चंद्रमा का लगभग 96.3 प्रतिशत हिस्सा पृथ्वी की गहरी छाया (अंब्रा) में समा जाएगा, जिससे चंद्रमा का अधिकांश भाग तांबई और गहरे लाल रंग की आभा में नजर आएगा। वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक अत्यंत गहरा आंशिक चंद्र ग्रहण है, जो लगभग पूर्ण चंद्र ग्रहण जैसी स्थिति उत्पन्न करेगा। इस अद्भुत खगोलीय घटना को लेकर दुनिया भर के खगोल प्रेमियों और आम नागरिकों में भारी उत्साह देखा जा रहा है। वहीं भारत में इस ग्रहण के प्रभाव, सूतक काल के नियमों और धार्मिक मान्यताओं को लेकर लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं।
खगोलीय घटना का अद्भुत नजारा: 96.3% चांद पर पृथ्वी का साया
खगोल विज्ञान के अनुसार चंद्र ग्रहण तब घटित होता है जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीधी रेखा में आ जाते हैं। इस स्थिति में पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच में आ जाती है, जिससे सूर्य का प्रकाश सीधे चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाता और पृथ्वी की छाया चंद्रमा की सतह पर पड़ती है।
इस बार लगने वाले ग्रहण की सबसे बड़ी विशेषता इसका 96.3 प्रतिशत कवरेज है। जब पृथ्वी की प्रच्छाया यानी मुख्य छाया (Umbra) चंद्रमा के 96.3 फीसदी भाग को ढक लेगी, तो मात्र 3.7 प्रतिशत हिस्सा ही छाया से बाहर रहेगा। खगोलविदों के अनुसार, जब छाया का अनुपात 95 प्रतिशत से अधिक हो जाता है, तब चंद्रमा पर सूर्य की कुछ किरणें पृथ्वी के वायुमंडल से छनकर पहुंचती हैं। वायुमंडल में नीली रोशनी बिखर जाती है और केवल लाल तरंग दैर्ध्य वाली रोशनी ही चंद्रमा तक पहुंच पाती है। इसके परिणामस्वरूप चंद्रमा आकाश में रक्त वर्ण यानी ‘ब्लड मून’ जैसा प्रतीत होता है। यह नजारा खगोलीय शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का एक बड़ा अवसर लेकर आ रहा है।
भारत में दृश्यता और सूतक काल के शास्त्रीय नियम
भारतीय जनमानस में किसी भी ग्रहण के साथ धार्मिक शुद्धता, पूजा-पाठ और सूतक काल के नियम गहराई से जुड़े होते हैं। पंचांग और खगोलीय वेधशालाओं की सटीक गणना के अनुसार यह चंद्र ग्रहण भारत के भौगोलिक क्षेत्र में दिखाई नहीं देगा।
सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु और वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ में ग्रहण और सूतक काल को लेकर स्पष्ट सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं: यस्य दर्शने तस्य फलं, यत्र न दृश्यते तत्र न मन्यते।
इस शास्त्रीय नियम का सीधा अर्थ है कि ग्रहण का सूतक काल, धार्मिक प्रतिबंध, मंदिरों के कपाट बंद होने के नियम और खान-पान संबंधी परहेज केवल उन्हीं भौगोलिक क्षेत्रों में लागू होते हैं जहाँ वह ग्रहण खुली आंखों से प्रत्यक्ष दिखाई देता है। चूँकि यह चंद्र ग्रहण भारत के किसी भी राज्य या शहर में दृश्यमान नहीं होगा, इसलिए भारत में इसका कोई सूतक काल मान्य नहीं होगा। देश के सभी मंदिरों में नित्य पूजा-अर्चना, आरती और दर्शन सामान्य रूप से जारी रहेंगे। श्रद्धालुओं, बुजुर्गों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं को सूतक संबंधी किसी भी कठोर नियम का पालन करने या दैनिक दिनचर्या में बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है।
दुनिया के किन देशों में दिखाई देगा यह दुर्लभ ग्रहण?
यद्यपि भारत में इस ग्रहण का दर्शन नहीं होगा, परंतु विश्व के कई महाद्वीपों में यह अत्यंत स्पष्ट और मनोहारी रूप में देखा जा सकेगा।
यह चंद्र ग्रहण मुख्य रूप से निम्नलिखित वैश्विक क्षेत्रों में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देगा:
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उत्तरी अमेरिका: संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको के लगभग सभी प्रमुख शहरों में यह नजारा साफ दिखेगा।
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दक्षिणी अमेरिका: ब्राजील, अर्जेंटीना, चिली, कोलंबिया और पेरू जैसे देशों में ग्रहण की विभिन्न अवस्थाएं स्पष्ट नजर आएंगी।
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यूरोप के पश्चिमी भाग: ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल के तटीय इलाकों में चंद्रमा के अस्त होते समय या शुरुआती अवस्था में इसका प्रभाव दिखेगा।
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प्रशांत और अटलांटिक महासागरीय क्षेत्र: प्रशांत महासागर के द्वीपीय देशों, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तटों पर आंशिक रूप से यह दृश्य देखा जा सकेगा।
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आर्कटिक और अंटार्कटिका: दोनों ध्रुवीय क्षेत्रों में भी यह खगोलीय परिघटना रिकॉर्ड की जाएगी।
इन देशों की अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसियां और वेधशालाएं इस ग्रहण का सजीव प्रसारण (लाइव स्ट्रीमिंग) करेंगी, जिसके माध्यम से भारत सहित दुनिया भर के खगोल प्रेमी घर बैठे डिजिटल माध्यमों से इसका लाइव दीदार कर सकेंगे।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण बनाम ज्योतिषीय मान्यताएं
विज्ञान और ज्योतिष दोनों ही ग्रहण को महत्वपूर्ण मानते हैं, परंतु दोनों के दृष्टिकोण में भिन्नता है। आधुनिक खगोल विज्ञान इसे पूरी तरह से एक प्राकृतिक और नियमित ज्यामितीय घटना मानता है। वैज्ञानिकों के अनुसार चंद्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता, वह केवल सूर्य के प्रकाश से चमकता है। जब पृथ्वी बीच में आकर इस प्रकाश को रोकती है, तो छाया बनती है।
इसके विपरीत, वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन, जल, भावना और माता का कारक माना गया है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ग्रहण काल में राहु और केतु की छाया के कारण चंद्रमा की सकारात्मक ऊर्जा में अस्थायी उतार-चढ़ाव आता है। भले ही ग्रहण प्रत्यक्ष रूप से भारत में न दिखे, परंतु वैश्विक स्तर पर ग्रहों के इस गोचर का सूक्ष्म प्रभाव प्रकृति, मौसम और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अवश्य पड़ता है। समुद्र में उच्च ज्वार-भाटा आने की संभावना बढ़ जाती है और भू-गर्भीय हलचलों में तेजी देखी जा सकती है।
राशियों पर प्रभाव और ध्यान रखने योग्य बातें
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहण का प्रभाव विभिन्न राशियों के जातकों पर मानसिक और भावनात्मक रूप से पड़ सकता है। चूंकि चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए संवेदनशील मनःस्थिति वाले लोगों को आत्म-संयम बनाए रखने की सलाह दी जाती है।
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मेष, सिंह, धनु और कुंभ राशि के जातकों के लिए यह समय नए विचारों और आध्यात्मिक चिंतन के लिए उत्तम रहेगा।
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वृषभ, कर्क, वृश्चिक और मीन राशि के जातकों को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने और अनिद्रा या मानसिक तनाव से बचने के लिए ध्यान (मेडिटेशन) का सहारा लेना चाहिए।
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मिथुन, कन्या, तुला और मकर राशि वालों के लिए आर्थिक लेन-देन में सामान्य सतर्कता बरतना लाभकारी रहेगा।
गर्भवती महिलाओं को लेकर समाज में कई भ्रांतियां रहती हैं। चूंकि भारत में ग्रहण दृश्य नहीं है, इसलिए गर्भवती महिलाओं को किसी भी प्रकार की चिंता या शारीरिक असुविधा झेलने की जरूरत नहीं है। वे सामान्य रूप से खान-पान, आराम और दैनिक गतिविधियां कर सकती हैं।
ग्रहण काल के दौरान आध्यात्मिक साधना का महत्व
भले ही भारत में सूतक के नियम प्रभावी न हों, परंतु सनातन परंपरा में चंद्र ग्रहण के वैश्विक कालखंड को मंत्र सिद्धि, ध्यान और आत्मशुद्धि के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना गया है।
आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिए श्रद्धालु निम्नलिखित सरल उपाय कर सकते हैं:
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भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय या महामृत्युंजय मंत्र का मानसिक जप करें, क्योंकि चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित हैं।
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मानसिक शांति और एकाग्रता के लिए चंद्र देव के बीज मंत्र ॐ सों सोमाय नमः का 108 बार पाठ करें।
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ग्रहण समाप्त होने के उपरांत अपनी सामर्थ्य अनुसार श्वेत वस्तुओं जैसे दूध, दही, चावल, चांदी, चीनी अथवा सफेद वस्त्रों का दान किसी जरूरतमंद को करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।
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पक्षियों को दाना डालना और जल का संरक्षण करना चंद्र दोषों के निवारण में सहायक सिद्ध होता है।
वर्ष का यह अंतिम चंद्र ग्रहण खगोल प्रेमियों के लिए जहां प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को निहारने का अद्भुत अवसर है, वहीं आम नागरिकों के लिए बिना किसी धार्मिक संकोच और सूतक के भय के सामान्य जीवन व्यतीत करने का दिन है।
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