
सनातन परंपरा में संतानों के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, उज्ज्वल भविष्य और संतान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ति के लिए रखे जाने वाले व्रतों में ‘संतान सप्तमी’ का स्थान सर्वोपरि माना गया है। यह पावन व्रत प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ रखा जाता है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में इसे ‘मुक्ताभरण सप्तमी’ या ‘ललिता सप्तमी’ के नाम से भी जाना जाता है।
यह व्रत मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपने बच्चों की सुरक्षा, उनके जीवन से समस्त संकटों, अकाल मृत्यु के भय और असाध्य रोगों के निवारण के लिए रखा जाता है। वहीं, जिन दंपत्तियों को विवाह के लंबे समय बाद भी संतान सुख की प्राप्ति नहीं हुई है या जिनकी संतान के जीवन में बार-बार बाधाएं आ रही हैं, उनके लिए यह व्रत साक्षात वरदान के समान माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश के साथ-साथ भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप (लड्डू गोपाल) की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।
सितंबर में संतान सप्तमी व्रत की सही तारीख और शुभ मुहूर्त
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को लेकर पंचांग गणना के अनुसार व्रत का निर्धारण उदयातिथि और दोपहर (मध्याह्न) व्यापिनी तिथि के आधार पर किया जाता है। संतान सप्तमी की पूजा मुख्य रूप से दोपहर के समय संपन्न करने का विधान है।
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भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि का प्रारंभ: 17 सितंबर की दोपहर से
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भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि का समापन: 18 सितंबर की दोपहर तक
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उदयातिथि अनुसार मुख्य व्रत दिवस: 18 सितंबर
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प्रातःकाल पूजा का शुभ मुहूर्त: सुबह 06:10 बजे से सुबह 08:30 बजे तक
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मध्याह्न (दोपहर) पूजा का श्रेष्ठ अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक
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विजय मुहूर्त: दोपहर 02:15 बजे से दोपहर 03:05 बजे तक
जो व्रती दोपहर के समय पूजा करते हैं, उनके लिए मध्याह्न और अभिजित मुहूर्त में पूजन करना सर्वश्रेष्ठ और अभीष्ट फल देने वाला रहेगा।
संतान सप्तमी की पौराणिक कथा और भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश
संतान सप्तमी व्रत का उल्लेख ‘भविष्य पुराण’ में मिलता है। महाभारत काल में जब पांडव वनवास के दौरान अपने कष्टों से व्यथित थे और माता कुंती अपनी संतानों के कल्याण को लेकर चिंतित थीं, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें संतान सप्तमी व्रत का महात्म्य सुनाया था।
श्री कृष्ण ने बताया कि प्राचीन काल में मथुरा में राजा नहुष का शासन था। उनकी पत्नी चंद्रमुखी और उनकी सहेली रूपमती (जो राजपुरोहित की पत्नी थीं) ने एक बार सरयू नदी के तट पर कई महिलाओं को संतान सप्तमी का व्रत करते देखा। दोनों ने भी संतान की रक्षा के लिए यह व्रत रखने का संकल्प लिया। किंतु समय बीतने के साथ रानी चंद्रमुखी अपने राजसी वैभव में इस व्रत को भूल गईं, जबकि उनकी सहेली रूपमती ने पूरी निष्ठा से आजीवन यह व्रत किया।
परिणामस्वरूप, अगले जन्मों में रानी चंद्रमुखी को संतान वियोग का असहनीय दुख भोगना पड़ा, जबकि रूपमती को गुणवान और दीर्घायु पुत्रों की प्राप्ति हुई। जब चंद्रमुखी को अपने पूर्व जन्म की भूल का अहसास हुआ, तो उन्होंने प्रायश्चित करते हुए पुनः संतान सप्तमी का व्रत धारण किया, जिसके प्रभाव से उन्हें सुंदर और यशस्वी संतान का सुख प्राप्त हुआ। स्वयं माता देवकी ने भी कंस द्वारा अपने संतानों के वध के बाद भगवान श्री कृष्ण और बलराम की दीर्घायु के लिए महर्षि लोमश के निर्देश पर इसी पावन व्रत का अनुष्ठान किया था।
7 मीठी पूड़ी (खीर-पुआ) के विशेष नैवेद्य का शास्त्रीय विधान
संतान सप्तमी की पूजा में ‘सात’ (7) की संख्या का अत्यंत गहरा प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक महत्व है। इस दिन माताएं अपने हाथों से शुद्ध गाय के घी या रिफाइंड तेल में सात मीठी पूरियां अथवा आटे और गुड़ के सात पुए (गुलगुले) तैयार करती हैं।
नैवेद्य अर्पण के नियम:
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इन सात मीठी पूरियों को केले के पत्ते या किसी साफ कांसे/पीतल की थाली में सजाया जाता है।
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पूजा के समय यह भोग भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित किया जाता है।
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पूजा संपन्न होने के बाद इनमें से सात पूरियां दान के निमित्त निकाली जाती हैं और शेष सात पूरियों को व्रती माताएं स्वयं व्रत खोलते समय प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं।
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ध्यान रहे कि इस प्रसाद में किसी भी प्रकार के नमक का प्रयोग वर्जित होता है।
7 गांठों वाला रक्षा सूत्र और चांदी की चूड़ी का चमत्कारी रहस्य
संतान सप्तमी व्रत का सबसे प्रमुख और अनिवार्य अंग ‘संतान रक्षा सूत्र’ (डोरा) अथवा चांदी का कड़ा/चूड़ी (मुक्ताभरण) माना जाता है:
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सूती या रेशमी धागा: कच्चे सूत या रेशमी कलावा में हल्दी लगाकर उसमें 7 गांठें लगाई जाती हैं। प्रत्येक गांठ लगाते समय ‘ॐ नमः शिवाय’ अथवा भगवान कृष्ण के संतान गोपाल मंत्र का उच्चारण किया जाता है।
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चांदी का कड़ा/छल्ला: कई परंपराओं में चांदी का एक कड़ा या छल्ला पूजा में रखा जाता है, जिस पर भगवान शिव का ध्यान करते हुए दूध और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है।
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धारण करने की विधि: पूजा के दौरान इस धागे या चांदी के कड़े को भगवान शिव और माता पार्वती के चरणों में अर्पित कर अभिमंत्रित किया जाता है। पूजा समाप्त होने के बाद माताएं इस पवित्र रक्षा सूत्र को अपने दाहिने हाथ में बांधती हैं अथवा संतान के गले/हाथ में पहना देती हैं। यह रक्षा सूत्र पूरे वर्ष संतान को हर प्रकार की बुरी नजर, तंत्र-मंत्र और दुर्घटनाओं से सुरक्षित रखने वाला सुरक्षा कवच माना जाता है।
घर पर संतान सप्तमी पूजा की संपूर्ण और प्रामाणिक विधि
संतान सप्तमी के दिन पूजा को सात्विक और व्यवस्थित रूप से संपन्न करने के लिए इन चरणों का पालन करें:
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1. प्रातः स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (पीले, लाल या सफेद) धारण करें। पूजा स्थल पर बैठकर हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संतान की लंबी उम्र और आरोग्य का संकल्प लें।
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2. चौकी और प्रतिमा स्थापना: उत्तर या पूर्व दिशा में एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर शिव-पार्वती की प्रतिमा, शिवलिंग और भगवान श्री कृष्ण (लड्डू गोपाल) की मूर्ति स्थापित करें।
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3. पंचामृत अभिषेक: शिवलिंग और बाल गोपाल को तांबे या चांदी की थाली में रखकर कच्चे दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (पंचामृत) से स्नान कराएं। उसके बाद शुद्ध गंगाजल से अभिषेक करें।
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4. श्रृंगार और पत्र-पुष्प अर्पण: शिवलिंग पर सफेद चंदन, भस्म और 21 बेलपत्र अर्पित करें। माता पार्वती को कुमकुम, लाल चुनरी और श्रृंगार सामग्री चढ़ाएं। भगवान गणेश को दूर्वा और लड्डू गोपाल को पीले चंदन का तिलक लगाएं।
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5. रक्षा सूत्र और नैवेद्य समर्पण: 7 गांठों वाला डोरा और चांदी का कड़ा भगवान के समक्ष रखें। इसके बाद सात मीठी पूरियों, खीर, केला, सेब और सूखे मेवों का भोग लगाएं।
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6. व्रत कथा और आरती: हाथ में सात दाने गेहूं या अक्षत लेकर श्रद्धापूर्वक संतान सप्तमी की संपूर्ण व्रत कथा पढ़ें या सुनें। कथा समाप्ति पर वे दाने भगवान के चरणों में अर्पित करें और कर्पूर से विधिवत आरती उतारें।
संतान सप्तमी व्रत के कड़े नियम: पारण और सावधानियां
व्रत की सफलता के लिए कुछ विशिष्ट नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक माना गया है:
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नमक का पूर्ण त्याग: संतान सप्तमी के व्रत में पूरे दिन किसी भी प्रकार के नमक (सेंधा नमक भी) का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है।
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एक समय मीठा भोजन: पूजा संपन्न होने के बाद शाम के समय या दोपहर के बाद केवल मीठा भोजन (भोग में चढ़ाई गई मीठी पूड़ी, खीर या हलवा) ग्रहण करके ही व्रत का पारण किया जाता है।
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ब्राह्मण भोजन और दान: पूजा के बाद किसी सुयोग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद महिला को सात मीठी पूरियों का दान, वस्त्र और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा जरूर दें।
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मन की शुद्धि: व्रत के दिन क्रोध, कलह, कटु वाणी और बच्चों पर गुस्सा करने से बचें। पूरे दिन मन में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘ॐ नमः शिवाय’ का स्मरण करते रहें।
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