
आकाश में घटने वाली खगोलीय घटनाओं में चंद्र ग्रहण हमेशा से वैज्ञानिकों और आम जनमानस के लिए कौतूहल का केंद्र रहा है। आधुनिक खगोल विज्ञान जहां इसे सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की एक सीधी रेखा में आने और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ने की भौतिक प्रक्रिया बताता है, वहीं सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष में इसका संबंध सीधे सतयुग के सबसे बड़े महामंथन यानी ‘समुद्र मंथन’ की एक रोमांचक घटना से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्र ग्रहण कोई सामान्य खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि यह छाया ग्रह राहु द्वारा चंद्रमा से लिए जाने वाले युगों पुराने प्रतिशोध का दृश्य है। जब भी पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी पूर्ण आभा में चमकता है, तब राहु क्रोधवश उसे निगलने का प्रयास करता है। सदियों से चली आ रही इस पौराणिक कथा के पीछे अमृत, कपट, सुदर्शन चक्र और देवताओं के न्याय की एक अत्यंत मार्मिक गाथा छिपी है।
समुद्र मंथन का महासंग्राम: जब क्षीरसागर से निकला अमृत कलश
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवराज इंद्र के अहंकार के कारण महर्षि दुर्वासा ने देवताओं को श्रीहीन और शक्तिहीन होने का शाप दे दिया था। देवताओं की शक्ति क्षीण होते ही दैत्यों के राजा बलि ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। अपनी खोई हुई शक्ति और स्वर्ग को पुनः प्राप्त करने के लिए देवता भगवान श्रीहरि विष्णु की शरण में पहुंचे। भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने और उसमें से निकलने वाले दिव्य अमृत को प्राप्त करने का सुझाव दिया, जिसके पान से अमरता मिलनी थी।
मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती (रस्सी) बनाकर देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन आरंभ किया। इस महामंथन से हलाहल विष, कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष और स्वयं माता लक्ष्मी सहित 14 दिव्य रत्न प्रकट हुए। अंत में, आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में दिव्य अमृत से भरा कलश लेकर समुद्र से बाहर आए। अमृत कलश को देखते ही असुरों में उसे छीनने की होड़ मच गई और वे अमृत लेकर भागने लगे।
भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार: असुरों से अमृत बचाने की दिव्य लीला
यदि असुर अमृत पी लेते, तो वे अमर होकर पूरी सृष्टि पर अंधकार और अत्याचार का राज स्थापित कर देते। सृष्टि के संतुलन की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने एक अत्यंत रूपवती और मनमोहक अप्सरा ‘मोहिनी’ का रूप धारण किया। मोहिनी के अद्वितीय सौंदर्य और सम्मोहन के प्रभाव में आकर दैत्य अपनी सुध-बुध खो बैठे। मोहिनी ने बड़ी चतुराई से अमृत वितरण का दायित्व अपने हाथों में ले लिया।
मोहिनी रूपी भगवान विष्णु ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बिठा दिया और यह तय किया कि पहले देवताओं को और उसके बाद असुरों को अमृत का पान कराया जाएगा। असुर मोहिनी के मोहपाश में इतने बंधे थे कि वे बिना किसी विरोध के अपनी बारी का इंतजार करने लगे, जबकि मोहिनी चुपचाप एक-एक करके सभी देवताओं को अमर बनाने वाला अमृत पिलाने लगीं।
असुर स्वरभानु का कपट: देव रूप धरकर अमृत पान का दुस्साहस
असुरों की पंक्ति में ‘स्वरभानु’ नाम का एक अत्यंत चतुर, पराक्रमी और मायावी दैत्य बैठा था, जो विप्रचित्ति और सिंहिका का पुत्र था। स्वरभानु को मोहिनी की चाल पर संदेह हो गया। उसने देखा कि अमृत का कलश केवल देवताओं की पंक्ति में ही घूम रहा है और असुरों तक पहुंचते-पहुंचते अमृत समाप्त हो जाएगा।
अपनी मायावी शक्तियों का उपयोग करके स्वरभानु ने तुरंत एक तेजस्वी देवता का रूप धारण कर लिया और चुपके से देवताओं की पंक्ति में जाकर बैठ गया। वह संयोगवश सूर्य देव और चंद्र देव के ठीक बीच में जाकर बैठ गया। जैसे ही मोहिनी अमृत परोसते हुए स्वरभानु के पास पहुंची, उसने अपनी अंजुली आगे कर दी और मोहिनी ने उसे देवता समझकर अमृत की कुछ बूंदें दे दीं। स्वरभानु ने बिना समय गंवाए अमृत को अपने मुंह में डाल लिया।
सूर्य और चंद्रमा ने खोला भेद, चला भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र
जैसे ही अमृत की बूंदें स्वरभानु के मुख से होकर उसके कंठ की ओर बढ़ीं, पास ही बैठे सूर्य देव और चंद्र देव ने उसके चेहरे के हाव-भाव और दैत्य तरंगों को पहचान लिया। उन्हें आभास हो गया कि यह कोई देवता नहीं बल्कि भेष बदलकर आया हुआ मायावी असुर है। सूर्य और चंद्रमा ने तत्काल मोहिनी रूपी भगवान विष्णु को जोर से पुकार कर सतर्क किया—”प्रभु! यह देवता नहीं, असुर स्वरभानु है!”
भेद खुलते ही भगवान विष्णु ने तुरंत अपना वास्तविक चतुर्भुज रूप धारण किया और अपनी उंगली से अत्यंत तेजस्वी और संहारक ‘सुदर्शन चक्र’ छोड़ दिया। सुदर्शन चक्र पलक झपकते ही स्वरभानु की ओर बढ़ा और उसने स्वरभानु की गर्दन को धड़ से अलग कर दिया।
राहु और केतु की उत्पत्ति: अमरता का वरदान और छाया ग्रहों का दर्जा
यद्यपि सुदर्शन चक्र ने स्वरभानु का सिर काट दिया था, लेकिन तब तक अमृत की कुछ बूंदें उसके गले से नीचे उतर चुकी थीं। अमृत के प्रभाव से स्वरभानु के प्राण नहीं निकले और उसका सिर व धड़ दोनों जीवित रहे। सिर वाले भाग को ‘राहु’ और धड़ वाले भाग को ‘केतु’ के नाम से जाना गया।
चूंकि स्वरभानु ने अमृत का स्पर्श कर लिया था, इसलिए भगवान ब्रह्मा और नवग्रह मंडल ने राहु और केतु को ब्रह्मांड में ‘छाया ग्रह’ (शैडो प्लैनेट्स) के रूप में स्थान दिया। ज्योतिषीय दृष्टि से राहु को ज्ञान, भ्रम और तकनीकी गति का कारक माना गया, जबकि केतु को मोक्ष, वैराग्य और सूक्ष्म बुद्धि का प्रतीक बनाया गया।
प्रतिशोध की ज्वाला: राहु क्यों करता है चंद्रमा का ग्रास?
अपनी इस दुर्दशा और शरीर के दो टुकड़ों में बंटने का मुख्य कारण स्वरभानु (राहु) ने सूर्य और चंद्रमा को माना। राहु के मन में चंद्रमा और सूर्य के प्रति भयंकर शत्रुता और प्रतिशोध की भावना भर गई। राहु ने यह प्रण लिया कि वह समय-समय पर इन दोनों ग्रहों को प्रताड़ित करेगा और उन्हें अपनी छाया में ढककर उनके प्रकाश को क्षीण करेगा।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भी पूर्णिमा तिथि पर चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में राहु के प्रभाव क्षेत्र (संपात बिंदु) में आता है, तो राहु अपने पुराने प्रतिशोध के तहत चंद्रमा पर आक्रमण करता है और उसे अपने विशाल मुख में निगल लेता है। इसी घटना को पृथ्वी से ‘चंद्र ग्रहण’ के रूप में देखा जाता है।
अब प्रश्न उठता है कि यदि राहु चंद्रमा को निगल लेता है, तो चंद्रमा वापस कैसे निकलता है? इसका रहस्य यह है कि सुदर्शन चक्र के प्रहार से राहु का केवल सिर (मुख और गला) ही जीवित है, उसके पास धड़ नहीं है। इसलिए जब राहु चंद्रमा को निगलता है, तो चंद्रमा उसके कटे हुए गले से होकर कुछ ही समय बाद बाहर निकल आता है। जैसे ही चंद्रमा राहु के मुख से बाहर निकलता है, ग्रहण समाप्त हो जाता है, जिसे ज्योतिष और धर्मशास्त्र में ‘ग्रहण का मोक्ष’ कहा जाता है।
वैदिक ज्योतिष और खगोल शास्त्र का वैज्ञानिक सामंजस्य
प्राचीन भारतीय ऋषियों ने इस पौराणिक रूपक के माध्यम से एक गहरे खगोलीय सत्य को समाज के सामने रखा था। आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि पृथ्वी की कक्षा (Earth’s Orbit) और चंद्रमा की कक्षा (Moon’s Orbit) एक-दूसरे को 5 डिग्री के कोण पर दो बिंदुओं पर काटती हैं। खगोल विज्ञान में इन दो काल्पनिक प्रतिच्छेदन बिंदुओं को ‘नॉर्थ नोड’ (North Node) और ‘साउथ नोड’ (South Node) कहा जाता है।
वैदिक ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही इन दोनों खगोलीय बिंदुओं को ‘राहु’ (उत्तरी बिंदु) और ‘केतु’ (दक्षिणी बिंदु) का नाम दिया था। जब भी सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा इन बिंदुओं के निकट आते हैं, तभी सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण घटित होता है। इस प्रकार पौराणिक कथा और आधुनिक विज्ञान का निष्कर्ष एक ही सत्य को दो भिन्न शैलियों में प्रकट करता है।
ग्रहण काल का आध्यात्मिक महत्व: आत्मशुद्धि और मंत्र सिद्धि का महापर्व
सनातन परंपरा में ग्रहण काल को अशुभ नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति और मंत्र सिद्धि के लिए अत्यंत शक्तिशाली समय माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण के समय चंद्रमा (जो मन का कारक है) पीड़ित होता है, इसलिए इस दौरान नकारात्मक विचारों से बचकर ध्यान, प्राणायाम और ईश्वर भक्ति में लीन रहना चाहिए।
ग्रहण काल में किए गए मंत्र जप, दान और भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र का पाठ सामान्य दिनों की तुलना में लाख गुना अधिक फल प्रदान करता है। ग्रहण समाप्त होने के उपरांत गंगाजल युक्त पानी से स्नान करने और अन्न, वस्त्र व धन का जरूरतमंदों को दान करने से राहु और केतु के सभी प्रकार के अशुभ प्रभाव शांत होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
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